हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें. १६४ हर्षचरितम् प्रक्षाल्याङ्गानि नगरं विवेश । अन्यस्मिन्नहनि तेषामात्मशरीरानन्तरं स्नानभोजनाच्छादनादिना प्रीतिमकरोत् । कतिपयदिबसापगमे च परिव्राड् भूभुजा वार्यमाणोऽपि वनं ययौ । पातालस्वामिकर्णतालौ तु शौर्यानुरक्तौ तमेव सिषेवाते । संपादितमनो- रथातिरिक्तविभवौ च सुभटमण्डलमष्ये निष्कृष्टमण्डलाग्रौ समरमुखेषु प्रथममुपयुज्यमानौ कथान्तरेषु चान्तरान्तरा समादिष्टौ विचित्राणि भैरवाचार्यचरितानि शैशववृत्तान्तांश्च कथयन्तौ तेनैव सार्धं जरामा- जग्मतुरिति । इति महाकविश्रीबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम तृतीय उच्छ्वासः । प्रियङ्गुलतिका मकरिका। तारामयो मृगशीर्षस्त्रितारोऽङ्कुशाकारः । आत्मशरीरानन्तरं स्नानेति । आत्मशरीरमनन्तरं यस्य तादृशेन स्नानभोजनाच्छादिना । तेषु कृत्वा पश्चादात्मनः करोतीत्यर्थः । शौर्यानुरक्ताविति न भोगलोलुभौ । अतिरिक्तोऽधिकः । मण्डलाग्रः खङ्गः । अन्तरान्तरा मध्ये मध्ये । कथयन्ताविति स्थिरप्रीतिसिद्धये ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते तृतीय उच्छ्वासः । टीटिभ आदि तीनों को साथ लेकर नाग से युद्ध करने के कारण मलिन अङ्गों को वन की बावली के पवित्र जल में साफ कर नगर में प्रवेश किया । दूसरे दिन अपने से पहले उन्हें स्नान, भोजन और वस्त्र आदि से प्रसन्न किया । कुछ दिनों के बाद राजा के रोकने पर भी परिव्राजक टीटिभ वन में चला गया । उसकी वीरता में अनुराग करने वाले पातालस्वामी और कर्णताल दोनों राजा के पास ही रह गए । राजा ने उन दोनों के लिए इच्छा से ज्यादा धन दिया । सुभट मण्डल के बीच में उत्कृष्ट खड्ग धारण करने वाले और सेना के प्रधान नियुक्त हो गए। बातचीत के अवसर पर बीच बीच में राजा के पूछने पर भैरवाचार्य के विचित्र कार्य और बाल्यकाल के वृत्तान्त कहते रहते थे । क्रम से राजा के साथ वे दोनों भी बूढ़े हो गए । हर्षचरित तृतीय उच्छ्वास समाप्त ।