भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 506 में से

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पृष्ठ 240

चतुर्थ उच्छ्वासः योगं स्वप्नेऽपि नेच्छन्ति कुर्वते न करग्रहम्। महान्तो नाममात्रेण भवन्ति पतयो भुवः ॥ १ ॥ सकलमहीभृत्कम्पकृदुत्पद्यत एक एव नृपवंशे । विपुलेऽपि पृथुप्रतिमो दन्त इव गणाधिपस्य मुखे ॥ २ ॥ अथ तस्मात्पुष्यभूतेर्द्विजवरस्वेच्छागृहीतकोषो नाभिद्म इव पुण्ड- रीकेक्षणात्, लक्ष्मीपुरःसरो रत्नसंचय इव रत्नाकरात्, गुरुबुधकविक- योगमित्यादिना प्रसिद्धाप्रस्तुतवैलक्षण्यमुच्यते । भूपतीनां योगो युक्तिः । गूढप्रत्याहाररसादनादिच्छेत्यर्थः, संबन्धश्च । करग्रहो दण्डग्रहणम्, विवाहश्च । नाममात्रेणेति । नामैव तेषां श्रुत्वा भुवनं कम्पत इत्यर्थः । अर्थशून्येन सकलेनेत्या- दिना भाविनी हर्षोत्पत्तिः सूचिता ॥ १ ॥ महीभृद्भिरपि कम्पो वेपथुः, चलनं च । पृथुरादिराजः विस्तीर्णश्च । प्रतिमा सादृश्यम्, दन्तकोशश्च । दन्त इवेति । दन्तोऽप्यंको गणाधिपस्य मुखे, समूहाधि- पत्यप्रदाने च ॥ २ ॥ अथेत्यादौ । राजवंशो निर्जगामेति संबन्धः । द्विजवरा विप्रोत्तमाः । ब्रह्मा च द्विजोत्तमः । कोशो गञ्जः, कर्णिका च । पुण्डरीकेक्षणः कमलोचनः, विष्णुश्च । लक्ष्मीः पुरःसरा यस्य लक्ष्मीपुरःसरः । ‘जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद्रत्नमभिधीयते’ । मणयश्च रत्नानि । गुरव उपदेष्टारः । बुधाः पण्डिताः । कवयः काव्यकृतः । कला- महान् लोग स्वप्न में भो योग अर्थात् शत्रु से छल-कपट की युक्ति नहीं सोचते और कर अर्थात् दण्ड भी नहीं देते । इस प्रकार वे नाममात्र ही पृथ्वी के पति हो जाते हैं । ( पति होकर स्वप्न में भो योग अर्थात् मिलन नहीं चाहते और करग्रहण अर्थात् विवाह नहीं करते । इस प्रकार केवल नाम से पति बन जाते हैं ) ॥ १ ॥ बहुत बड़े राजवंश में पृथु सदृश एक ही कोई उत्पन्न हो जाता है जो समस्त राजाओं को भय से कम्पित कर देता है। जैसे गणेशजी का एक ही विशाल दाँत सारे पर्वतों को उखाड़ फेंकता है ॥ २ ॥ जैसे विष्णु से ब्रह्मा जी द्वारा स्वेच्छा से अधिष्ठित मध्य भाग वाला नाभि-कमल ( ब्राह्मणश्रेष्ठों द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार ग्रहण की गई धन-सम्पत्ति वाला राजवंश ) निकला। जैसे समुद्र से लक्ष्मी को आगे करके रत्नसमूह ( लक्ष्मी से युक्त राजवंश ) निकला। जैसे उदयाचल से गुरु ( बृहस्पति ), बुध, कवि ( शुक्र ), कलाभृत् ( चन्द्र