भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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चतुर्थ उच्छ्वासः १६६ बाहुल्यमभ्युदयमाह्वानं वरप्रदानमवस्कन्दपातं दिष्टवृद्धिं शस्त्रप्रहार- पतनं वसुधारारसममन्यत । यस्मिंश्च राजनि निरन्तरैर्यूपनिकरैरङ्कुरि- तमिव कृतयुगेन, दिङ्मुखविसर्पिभिरध्वरधूमैः पलायितमिव कलिना, ससुधैः सुरालयैरवतीर्णमिव स्वर्गेण, सुरालयशिखरोद्धूयमानैर्धवलध्वजैः पल्लवितमिव धर्मेण, बहिरुपरचितविकटसभासत्रप्रपाप्राग्वंशमण्डपैः प्रसू- तमिव ग्रामैः, काञ्चनमयसर्वोपकरणैर्विभवैर्विशीर्णमिव मेरुणा, द्विजदीय- मानैरर्थकलशैः फलितमिव भाग्यसंपदा । तस्य च जन्मान्तरेऽपि सती पार्वतीव शंकरस्य, गृहीतपरहृदया वस्कन्दः । दिष्टवृद्धिरानन्दवर्धनम् । धूमेनोत्प्रेक्षा कार्ष्ण्यात् । सुधा मक्कोलम् , अमृतं च । सभासदः । उक्तं च—‘समज्या परिषदङ्गोष्ठीसभासमितिसंसदः । आस्थानी क्लीबमास्थानं स्त्रीनपुंसकयोः सदः ॥’ सत्रं सदादानम् । ‘सत्रमाच्छादने यज्ञे सदा- दाने वनेऽपि च’ इत्युक्तम् । प्रपा यत्र तोयदानम् । प्राग्वंशः पत्नीशाला । उक्तं च ‘प्राग्वंशः प्राग्हविर्गेहात्’ इति । बहिरुपपादिता विकटाः सभासत्रप्रपाप्राग्वंश- रूपा यैस्तैः । तस्येत्यादौ । तस्य च महादेवी यशोमती नामाभूत्सा यस्य वक्षसि ललासेति सम्बन्धः । सती साध्वी, शोभना वा । जन्मान्तरे श्यामायाः संज्ञैषा । शंकरस्येत्या- खजाने देख लेने की प्रसन्नता होती, शत्रु के बाहुल्य को अपना अभ्युदय मानता, युद्ध के लिए गुहार को आशीर्वाद समझना, आकस्मिक आक्रमण को अपनी भाग्यवृद्धि मानता और शस्त्र के प्रहार से शत्रु के गिरने पर धन की वर्षा का आनन्द अनुभव करता। उस राजा के शासनकाल में निरन्तर यज्ञों में यूप (यज्ञ की विशेष लकड़ी) के गाड़े जाने पर मानों सतयुग अंकुरित हो गया था। दिशाओं में फैलते हुए यज्ञधूम से ऊबकर मानों कलि भाग पड़ा था। चूने से पुते हुए मन्दिरों से मानों स्वर्ग उतर आया था। देवमन्दिरों के शिखरों पर फहराती हुई उज्ज्वल पताकाओं से मानों धर्म पल्लवित हो गया था। नगर के बाहर बड़े-बड़े सभाभवन, दानगृह, पानशाला, होमगृह और मण्डप आदि से मानों गाँव के गाँव बस गए थे। सोने की बनी हुई सामग्री के भरे रहने से ऐसा लगता कि मेरु ही वहां ला दिया गया हो। ब्राह्मणों के लिये दान में समर्पित होने वाले धन से भरे कलशों से मानों सौभाग्य की सम्पत्ति फली-फूली नजर आती थी। यशोवती नाम की उस राजा की पटरानी थी। जन्मान्तर में मिली हुई पतिव्रता धर्मपत्नी वह भगवान् शंकर की पत्नी पार्वती के समान, विष्णु की दूसरों के हृदय में