हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० हर्षचरितम् लक्ष्मीरिव लोकगुरोः, स्फुरत्तरलतारका रोहिणीव कलावतः, सर्वजन- जननी बुद्धिरिव प्रजापतेः, महाभूभृत्कुलोद्गता गङ्गेव वाहिनीनायकस्य, मानसानुवर्तनचतुरा हंसीव राजहंसस्य, सकललोकार्चितचरणा त्रयीव धर्मस्य, दिवानिशममुक्तपार्श्वस्थितिररुन्धतीव महामुनेः, हंसमयीव गतिषु, परपुष्टमयीवालापेषु, चक्रवाकमयीव पतिप्रेम्णि, प्रावृएमयीव पयो- धरोन्नतौ, मदिरामयीव विलासेषु, निधिमयीवार्थसंचयेषु, वसुधारामयीव प्रसादेषु, कमलमयीव कोशसंग्रहेषु, कुसुममयीव फलदानेषु, संध्यायमीव वन्द्यत्वे, चन्द्रमयीव निरूष्मत्वे, दर्पणमयीव प्रतिप्राणिग्रहणेषु, सामुद्र- दीनि महामुनिशब्दान्तानि राज्ञि योज्यानि । गृहीतमावर्तितम् । परहृदयं चेतः, वक्षश्च । लोकगुरोर्हरेश्च । तारका कनीनिका, नक्षत्राणि च तारकाः । जननी माता, जन्यतेऽनयेति जननी च। भूभृद्भिरिरपि। कुलं समूहोऽपि। वाहिनी सेना, नदी च । मानसं चेतः, सरश्च। चरणौ पादौ, कण्वादिशाखाश्च चरणाः। धर्मोऽस्ति यस्य स धर्मः। अर्शाआदित्वादच् । यद्वा,-साक्षादेव धर्मः। महामुनी राजर्षिः, वसिष्ठश्च । प्रावृट् वर्षा पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । वसुधारा धनवृष्टिः। कोषो गञ्जः कर्णिका च । ऊष्मा गर्वः, औष्ण्यं च । प्राणिनि प्राणिनि प्रतिप्राणि सर्वजन्तुविषये ग्रहणेष्वावर्जनेषु, प्रतिबिम्बोत्पादनेषु च। सामुद्रं समुद्रकृतं शास्त्रम् । येनान्यस्व- निवास करने वाली लक्ष्मी के समान, चन्द्र की चमकते हुए चञ्चल तारों वाली रोहिणी के समान, ब्रह्मा की सब लोगों को उत्पन्न करने वाली बुद्धि के समान, वाहिनीपति अर्थात् समुद्र की हिमालय के कुल में उत्पन्न गङ्गा के समान (वाहिनीपति अर्थात् सेनापति राजा की विशाल राजकुल में उत्पन्न पत्नी यशोवती ), राजहंस को मानस ( मानसरोवर या चित्त ) में निवास करने में चतुर हंसी के समान, धर्म की सारे संसार से पूजित चरणों (वैदिक शाखाओं अथवा पैरों) वाली वेदविद्या के समान, महामुनि वशिष्ठ की दिनरात पास में रहने वाली अरुन्धती के समान, मन्द चाल चलने में हंस के समान, बोलने में कोयल के समान, पति के प्रति प्रेमभाव में चक्रवाकी के समान, पयोधरों (दोनों स्तनों अथवा मेघों) की ऊँचाई में वर्षाकाल के समान, विलासों में मदिरा के समान, धन के सञ्चय करने में निधि के समान, प्रसन्नता के अवसर पर धन की वृष्टि के समान, कोष अर्थात् भण्डारों की रक्षा करने में कमल के समान (कमल भी अपने कोष या बीजकोश का संग्रह करता है), फल देने में फूल के समान (फूलों के बाद फल ही उत्पन्न होते हैं), वन्दनीय होने में संध्या के समान, स्वभाव की शीतलता में चन्द्र के समान, सब लोगों को अपने में धारण करने में दर्पण के समान, दूसरों के चित्त की अवस्था परख लेने में सामुद्रिक शास्त्र के समान, सब जगह अपने प्रभाव से व्याप्त हो जाने में ईश्वर के समान,