भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

चतुर्थ उच्छ्वासः २०१ मयीव परचित्तज्ञानेषु, परमात्ममयीव व्याप्तिषु, स्मृतिमयीव पुण्यवृत्तिषु, मधुमयीव संभाषणेषु, अमृतमयीव तृप्यत्सु, वृष्टिमयीव भृत्येषु, निर्वृति- मयीव सखीषु, वेतसमयीव गुरुषु, गोत्रवृद्धिरिव विलासानाम्, प्रायश्चि- त्तशुद्धिरिव स्त्रीत्वस्य, आज्ञासिद्धिरिव मकरध्वजस्य, व्युत्थानबुद्धिरिव रूप- स्य, दिष्टवृद्धिरिव रतेः, मनोरथसिद्धिरिव रामणीयकस्य, दैवसंपत्तिरिव लावण्यस्य, वंशोत्पत्तिरिवानुरागस्य, वरप्राप्तिरिव सौभाग्यस्य, उत्पत्ति- भूमिरिव कान्तेः, सर्गसमाप्तिरिव सौन्दर्यस्य, आयतिरिव यौवनस्य, अनभ्रवृष्टिरिव वैदग्ध्यस्य, अयशःप्रमृष्टिरिव लक्ष्म्याः, यशःपुष्टिरिव चारित्रस्य, हृदयतुष्टिरिव धर्मस्य, सौहार्दस्य भाग्यरूपपरमाणुसृष्टिरिव प्रजापतेः, शमस्यापि शान्तिरिव, विनयस्यापि विनीतिरिव, आभिजा- त्यस्याप्यभिजातिरिव, संयमस्यापि संयतिरिव, धैर्यस्यापि धृतिरिव, विभ्र- मस्यापि विश्रान्तिरिव, यशोमती नाम महादेवी प्राणानां प्रणयस्य भावो ज्ञायते। परमात्मनि व्याप्तिः सर्वगतत्वमनुष्ठेयकार्यम्, ज्ञानं चान्यत्र। अमृतं सुधा, तोयं च। वेतसमयीवेति नम्रत्वात्। प्रायश्चित्तशुद्धिरिति। स्त्रीत्वं तयोज्ज्वलितं पवित्रितं वेत्यर्थः। व्युत्थानं समाधेश्चालनम्। आयतिः प्रतापः। अनभ्रवृष्टिरेवेति। यथा ह्यनभ्रवृष्टिश्चार्यहेतुस्तथा वैदग्ध्यं तस्यामाश्चर्यम्। शमस्यापीति। शमे हि कश्चाशान्तो भवति। शमं संप्राप्य लब्धात्मलाभो जायते। इत्येवमुत्तरत्रापि पुण्यकर्मों के अनुष्ठान में स्मृतिशास्त्र के समान, बातचीत करने में मधु के समान, सबको तृप्त करने में अमृत के समान, भृत्यों के लिये धन की वर्षा के समान, सखियों के लिये सुख का ही रूप धारण करने वाली, सारे विलासों की वंशवृद्धि के समान, स्त्रीत्व के समस्त प्रायश्चित्तों की शुद्धि के समान, कामदेव की आज्ञा की सिद्धि के समान, रूप के अभ्युदय की वृद्धि के समान, रति की भाग्यवृद्धि के समान, सौन्दर्य की मनोरथसिद्धि के समान, लावण्य की दैवी सम्पदा के समान, अनुराग की वंशोत्पत्ति के समान, कान्ति की वरप्राप्ति के समान, सौन्दर्य की अध्यायसमाप्ति के समान, यौवन की परिपूर्णता के समान, विदग्धता की मेघशून्य वर्षा के समान, लक्ष्मी के चञ्चलता रूप अयश के मार्जन के समान, चारित्र्य के यश की पुष्टि के समान, धर्म की हृदयतुष्टि के समान, प्रजापति द्वारा की हुई सौभाग्य के परमाणुओं की सृष्टि के समान, शम की भी शान्ति, विनय की भी विनम्रता, कुलीनता की भी कुलीनता, संयम की भी संयति, धैर्य की भी धृति और विभ्रम की भी विश्रान्ति के समान थी। वह राजा के प्राण, प्रेम, विश्वास, धर्म और