भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

२०२ हर्षचरितम् विश्रम्भस्य धर्मस्य सुखस्य च भूमिरभूत् । यास्य वक्षसि नरकजितो लक्ष्मीरिव ललास । निसर्गत एव च स नृपतिरादित्यभक्तो बभूव । प्रतिदिनमुदये दिन- कृतः स्नातः सितदुकूलधारी धवलकर्पटप्रावृतशिराः प्राङ्मुखः क्षितौ जानुभ्यां स्थित्वा कुङ्कुमपङ्कानुलिप्ते मण्डलके पवित्रपद्मरागपात्रीनिहितेन स्वहृदयेनेव सूर्यानुरक्तेन रक्तकमलषण्डेनार्घं ददौ । अजपच्च जप्यं सुच- रितः प्रत्यूषसि मध्यंदिने दिनान्ते चापत्यहेतोः प्राध्वं प्रयतेन मनसा जह्वपूको मन्त्रमादित्यहृदयम् । भक्तजनानुरोधविधेयानि तु भवन्ति देवतानां मनांसि । यतः स राजा कदाचिद्ग्रीष्मसमये यदृच्छयासितकरकरसितसुधाधवलस्य हर्म्यस्य पृष्ठे सुष्वाप । वामपार्श्वे चास्य द्वितीयशयने देवी यशोमती शिश्ये । परिणतप्रायायां तु श्यामायाम्, आसन्नप्रभातवेलाविलुप्यमानलावण्ये व्याख्याक्रमः । आभिजात्यस्य कुलोचितत्वस्य । नरको नामासुरः, यातनास्था- नानि च नरकाः । स्वहृदयेनेवेति । स्वहृदयमपि सूर्यानुरक्तम् । प्राध्वं प्रह्वः । जह्वपूकशब्दो जपा- सक्तां लक्षयति । द्वितीयेत्यादिनास्य सदाचारनिष्ठोक्ता । उक्तं हि—'नाश्नीयाद्भार्यया साकं न च सुप्यात्तया समम्' इति । परिणतेत्यादावस्मिन्सति देवी यशोमत्युदतिष्ठदिति सुख की भूमि थी। जैसे विष्णु के वक्ष पर लक्ष्मी निवास करती है उसी प्रकार वह भी उसके हृदय में निवास करती थी । वह राजा स्वभाव से ही भगवान् सूर्य का भक्त था । प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नान करके, श्वेत दुकूल पहनकर, सिर पर सफेद वस्त्र ढककर, पूर्व की ओर घुटनों के बल बैठकर रक्तकमल से जो पद्मराग मणि के पवित्र थाल में सूर्य के प्रति अनुरक्त उसके हृदय के रूप में रखा हुआ था, कुङ्कुम के पंक से बनाए हुए सूर्यमण्डल में अर्घ देता था । शोभन चरित वाला वह प्रातःकाल, दोपहर और सायंकाल पुत्र के लिये पवित्र और विनत होकर शुद्ध मन से जप के योग्य आदित्य-हृदय मन्त्र का बारबार जप करता था । देवताओं के मन निरन्तर अपने भक्तों के अनुरोध के वश में होते हैं। बात यह है कि किसी समय वह राजा अपनी इच्छा से चन्द्रमा की चाँदनी से धुले हुए अपने कोठे पर सो रहा था। उसी के बगल में दूसरी शय्या पर रानी यशोवती भी सो रही थी।