हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 248, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थे उच्छ्वासः २०३ लिलम्बिषमाणे सीदत्तेजसि तारकेश्वरे, कराग्रस्पृष्टकुमुदिनीप्रमोदजन्मनि शशधरस्वेद इव गलत्यतिशीतलेऽवश्यायपयसि, मधुमदमत्तप्रसुप्तसीम- न्तिनीनिःश्वासाहतेषु संक्रान्तमदेष्विव घूर्णमानेष्वन्तःपुरप्रदीपेपु, राजनि च विमलनखप्रतिबिम्बिताभिः संवाह्यमानचरण इव तारकाभिः, विस्रब्धप्रसारितैर्दिगङ्गनानामिवार्पितैरङ्गैरमधुसुगन्धिभिः स्वहस्तकमलता- लव्रन्तवातैरिव श्वसितैर्मुखश्रिया वीज्यमाने विमलकपोलस्थलस्थितेन सितकुसुमशेखरेणेव रतिकेलिकचग्रहलम्बितेन प्रतिमाशशिबिम्बेन विरा- जिते स्वपति देवी यशोमती सहसैव 'आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रा- यस्व' इति भाषमाणा भूषणरवेण व्याहरन्तीव परिजनमुत्कम्पमानाङ्गय- ष्टिरुदतिष्ठत् । अथ तेन सर्वस्यामपि पृथिव्यामश्रुतपूर्वेण किमुत देवीमुखे परित्रा- यस्वेति ध्वनिना दग्ध इव श्रवणयोरेकपद् एव निद्रां तत्याज राजा । शिरो- संबन्धः । तारकेश्वरे । करा रश्मयः, हस्तश्च करः । सीमन्तिनी ललना । सवाह्यमा- नानुपपद्यमाना । अङ्गैरितीत्थंभूतलक्षणे तृतीया । मधु मद्यम् । तद्वत् । मधु मकरन्दः । तालवृन्तमुत्प्रेपकः । सितग्रहणेन चन्द्रसादृश्यमाह । एकपदे तत्क्षणम् । शिरोभागाच्चेत्यादौ राजा वेगेनोत्पपातेति संबन्धः । रात प्रायः ढल चुकी थी । प्रभात के निकट होने से चन्द्रमा की चमक प्रायः कम पड़ती जा रही थी और वह धीरे धीरे लटकता जा रहा था । कुमुदिनी को कराग्र से छूने के आनन्द में चन्द्रमा के पसीने के रूप में अत्यन्त ठंढी ओस पड़ने लगी । अन्तःपुर के दीपक मधुपान के नशे में सोई हुई सुन्दरियों की सांसों के सम्पर्क से स्वयं मतवाले होकर जैसे घूर्णित होने लगे । तारिकायें राजा के निर्मल नखों में प्रतिबिम्बित होकर मानों उनके पैर दाबने लगीं, मानों राजा की मुखश्री दिगङ्गनाओं द्वारा विश्वास के साथ फैलाकर अर्पित किए गए अङ्गों के समान अपने हस्तकमल के पंखे की मधु से सुगन्धित साँसों की हवा से धीरे-धीरे उन्हें झल रही थी, मानों रतिकेलि के समय किए गये कचग्रह से लटका हुआ चन्द्रबिम्ब उनके निर्मल कपोल पर सफेद पुष्प की माला की भाँति झलक रहा था । राजा सो रहे थे कि रानी यशोवती एकाएक चौंककर 'आर्यपुत्र; बचाओ' यह कहते कहते अपने गहनों की आवाज से अन्तःपुर के परिजनों को जगाती और कांपती हुई उठ गई । सारी पृथिवी में कहीं भी पहले जो 'बचाओ' यह आवाज न सुन पड़ी थी उसे देवी के मुख से सुनकर कानों में जले हुये की भाँति राजा की नींद टूट गई । अपने सिरहाने, से कोप से काँपते हुए दाहिने हाथ से कर्णोत्पल के समान उसने अपनी तलवार खींच ली