हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ हर्षचरितम् भागाच्च कोपकम्पमानदक्षिणकराकृष्टेन कर्णोत्पलेनेव निर्गच्छताच्छधारेण धौतासिना सीमन्तयन्निव निशाम्, अन्तरालव्यवधायकमाकाशमिवोत्तरी- यांशुकं विक्षिपन्वामकरपल्लवेन, करविक्षेपवेगगलितेन हृदयेनेव भयनिमि- त्तान्वेषिणा भ्रमता दिक्षु कनकवलयेन विराजमानः, सत्वरावतारितवा- मचरणाक्रान्तिकम्पितप्रासादः, पुरःपतितेनासिधारागोचरगतेन शशिम- यूखखण्डेनेव खण्डितेन हारेण राजमानः, लक्ष्मीचुम्बनलग्नताम्बूलरसर- ञ्जिताभ्यामिव निद्रया कोपेन चातिलोहिताभ्यां लोचनाभ्यां पाटलयन्प- र्यन्तानाशानाम् , बद्धान्धकारया त्रिपताकया भ्रुकुट्या पुनरिव त्रियामां परिवर्तयन् 'देवि ! न भेतव्यं न भेतव्यम्' इत्यभिदधानो वेगेनोत्पपात । सर्वासु च दिक्षु विक्षिप्सचक्षुर्यदा नाद्राक्षीत्किंचिदपि तदा पप्रच्छ तां भयकारणम् । अथ गृहदेवतास्विव प्रधावितासु यामिकिनीषु, प्रबुद्धे च समीपशा- यिनि परिजने, शान्ते च हृद्योत्कम्पकारिणि साध्वसे सा समभाषत- सीमन्तयन्द्बिधाकुर्वन् । त्रिपताकया त्रिरैखया । यामकिनीषु जागरिकासु । जिसकी निकलती हुई स्वच्छ धारा से रात मानो दो भागों में बट गई। बीच में व्यवधान बनते हुए आकाश के समान उत्तरीय अंशुक को उसने अपने बांये हाथ से फेंक दिया । झटके से हाथ फेंकने के कारण उसका कनकवलय निकलकर दूर उड़ गया मानों उसका हृदय ही रानी के डर के कारण को ढूँढ़ने के लिए दिशाओं में चक्कर काटने लगा हो । उसने शय्या से अपने बायें पैर को ज्यों ही नीचे रखा त्यों ही भवन का प्रासाद जैसे हिल गया । उसका हार टूटकर आगे बिखर गया, मानों उसकी तलवार के सामने पड़कर चन्द्रमा की किरणें टूक-टूक हो गई । मानों लक्ष्मी द्वारा चुम्बन किए जाने पर पान से भरे उसके मुख की लाली उनकी आँखों में संक्रान्त हो गई हो ऐसी क्रोध और निद्रा के कारण टहाका लाल अपनी आँखों से क्षितिज को प्रभा से लाल बना रहा था। क्रोध की अंधेरा लिए हुए तीन रेखाओं से भरी अपनी भौंह के द्वारा वह रात को फिर से आरम्भ कर रहा था। 'देवी, डरो मत, डरो मत' यह कहता हुआ झट से उठकर खड़ा हो गया । उसने चारों ओर दिशाओं में अपनी आँखें फैलायीं, लेकिन कहीं कुछ नहीं देखा, तब उससे डरने का कारण पूछा । उसी समय गृहदेवताओं के समान रात को अन्तःपुर में पहरा देने वाली स्त्रियाँ दौड़ीं । समीप के सोने वाले परिजन भी जग गए । जब हृदय को कम्पित कर देने वाला