हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उच्छ्वासः २०५
'आर्यपुत्र ! जानामि स्वप्ने भगवतः सवितुर्मण्डलाद्भिर्गत्य द्वौ कुमारकौ, तेजोमयौ, बालातपेनेवापूरयन्तौ दिग्भागान्, वैद्युतमिव जीवलोकं कुर्वाणौ, मुकुटिनौ, कुण्डलिनौ, अङ्गदिनौ, कवचिनौ, गृहीतशस्त्रौ, इन्द्र- गोपकरुचा रुधिरेण स्नातौ, उन्मुखेनोत्तमाङ्गघटमानाञ्जलिना जगता निखिलेन प्रणम्यमानौ, कन्ययैकया च चन्द्रमूर्त्येव सुषुम्णारश्मिनिर्गतया- नुगम्यमानौ, क्षितितलमवतीणौ। तौ च मे विलपन्त्याः शस्त्रेणोदरं विदार्य प्रवेष्टुमारब्धौ। प्रतिबुद्धास्मि चार्यपुत्र ! विक्रोशयन्ती वेपमान- हृदया' इति। एतस्मिन्नेव च कालक्रमे राजलक्ष्म्याः प्रथमालापः प्रथयन्निव स्वप्न- फलमुपतोरणं रराण प्रभातशङ्खः। भाविनीं भूतिमिवाभिदधाना दध्वनु- रमन्दं दुन्दुभयः। चकाण कोणाहतानन्दादिव प्रत्यूषनान्दी। जयज- येति प्रबोधमङ्गलपरिपाठकानामुच्चैर्वाचोऽश्रूयन्त। पुरुषश्च वल्लभतुरङ्ग- मन्दूरामन्दिरे मन्दमन्दं सुप्तोत्थितः सप्रीणां कृतमधुरहेषारवाणां
मुकुटिनौ मौलियुक्तौ। अङ्गदिनौ संक्यूरौ। इन्द्रगोपकः कीटविशेषः ( भाषायां 'वीरबहूटी' इति ख्यातः)। सुषुम्णाख्योऽमृतमयो रविरश्मिः। कोणो वादनभाण्डम्। नान्दी भेरी। वल्लभेष्यादिना पुरुषस्य नैकट्यमाह।
वह भय शान्त हुआ तब देवी यशोवती ने कहा—'आर्यपुत्र, स्मरण करती हूँ कि स्वप्न में भगवान् सूर्य के मण्डल से निकल कर दो तेजस्वी कुमार अपने तेज से दिशाओं को भरते हुए, सारे जीवलोक को तङिन्मय बनाते हुए, सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, हाथ में विजयट, शरीर पर कवच और शस्त्र लिए हुए, इन्द्रगोपक नामक कीट की भाँति अपने तेज की लाल प्रभा में स्नान किए हुए, उन्मुख होकर और अञ्जलि बांधे सारे संसार द्वारा प्रणाम किए गए, सुषुम्ना नाम की रश्मि से निकली हुई चन्द्रमूर्ति के समान एक कन्या द्वारा अनुगत होकर पृथिवी पर उतरे। उन दोनों ने अपने शस्त्र से रोती हुई मेरे उदर को फाड़कर प्रवेश करना आरम्भ किया। आर्यपुत्र, तब मैं जग गई, चिल्ला पड़ी और मेरा हृदय कांपने लगा ।' इसी बीच तोरण के समीप राजलक्ष्मी के प्रथम आलाप के समान, रानी के स्वप्न का फल मानों व्यक्त करता हुआ प्रभातकालीन शंख बज उठा। दुंदुभियाँ भी होने वाली समृद्धि को बताती हुई ध्वनित हो उठीं। भेरियां भी डण्डे से आहत होकर मानों उस खुशी में कड़कने लगीं। जागरणकाल में मङ्गलपाठ करने वालों के ऊंचे स्वर में जय-जयकार सुन पड़ने लगे। कोई अश्वपाल राजा के घोड़साल में सोकर धीरे धीरे उठा और मधुर