भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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२०६ हर्षचरितम् पुरश्च्योतत्तुषारसलिलशीकरं किरन्मरकतहरितं यवसं वक्त्रापरवक्त्रे पपाठ- 'निधिस्ततत्र विकारेण सम्मणिः स्फुरता धाम्ना । शुभागमो निमित्तेन स्पष्टमाख्यायते लोके ॥ ३ ॥ अरुण इव पुरःसरो रवेि पवन इवातिजबो जलागमम् । शुभमशुभमथापि वा नृणां कथयति पूर्वनिदर्शनोदयः' ॥ ४ ॥ नरपतिस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणेनान्तःकरणेन तामवादीत्-'देवि ! मुदोऽवसरे विषीदसि । समृद्धास्ते गुरुजनाशिषः । पूर्णा नो मनोरथाः । परिगृहीतासि कुलदेवताभिः । प्रसन्नस्ते भगवानंशुमाली । न चिरेणैवा- तिगुणवदपत्यत्रयलाभेनानन्दयिष्यति भवतीम्' इति । अवतीर्य च यथा- क्रियमाणाः क्रियाश्चकार । यशोमत्यपि तुतोष तेन पत्युर्भाषितेन । सस्योऽश्वाः । यवसं घासम् । 'नान्द्याः प्रायोऽम्बुधेर्वक्त्रम्' इति वक्त्रलक्षणम् । अपर- वक्त्रं प्रसिद्धम् । तत्र विकारेणेति । यत्राधोनिधिस्तत्र परिणाहोद्गताधोमुखशाखामू- लादिभाजो वृक्षा भवन्ति । निदर्शनं निमित्तम् । समृद्धाः परिपूर्णाः । परिगृहीता अङ्गीकृता । स्वर में हिनहिनाते हुए घोड़ों के सामने मरकत के समान हरी हरी घास जिनसे पानी की बूँदें टपक रही थीं, डालते हुए उसने वक्त्र और अपवक्त्र नामक छन्दों को पढ़ा- 'लोक में जैसे वृक्ष की शाखा के झुक जाने आदि विकार से भूगर्भ में छिपी हुई निधि का पता चलाया जाता है और स्फुरित होते हुए तेज से मणि का सद्भाव मालूम किया जाता है उसी प्रकार किसी प्रकार के निमित्त ( शुभसूचक स्वप्न आदि) से होने वाला मङ्गल समझा जाता है।' 'जैसे आगे उदित होने वाला अरुण सूर्य को और हवा का झकोरा जल की वर्षा को सूचित करता है उसी प्रकार पहले देखा गया शुभ या अशुभ लक्षण मनुष्यों के होने वाले शुभ या अशुभ को कह देता है।' राजा ने उसे सुनकर हृदय से प्रसन्न होते हुए रानी से कहा-'देवी, प्रसन्न होने के अवसर में क्यों मन को दुखाती हो ? तुम्हारे गुरुजनों के आशीर्वाद सफल हो गए । हमारे मनोरथ पूरे हुए। कुलदेवताओं ने तुम्हारी बात मान ली । तुम पर भगवान् सूर्य प्रसन्न हैं । वे कुछ ही समय में अत्यन्त गुणशाली तीन सन्तान देकर आनन्दित करेंगे।' यह कहकर राजा कोठे से उतरकर नियमानुसार अपने कार्य में लग गए। रानी यशोमती पति की इस बात से बहुत सन्तुष्ट हुई।