हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थे उच्छ्वासः २०७ ततः समतिक्रान्ते कस्मिंश्चित्कालांशे देव्यां च यशोमत्यां देवो राज्यवर्धनः प्रथममेव संबभूव गर्भे । गर्भस्थितस्यैव च यस्य यशसेव पाण्डुतामादत्त जननी । गुणगौरवक्लान्तेव गात्रमुद्वोढुं न शशाक । कान्तिविसरामृतरसतृप्तेवाहारं प्रति पराङ्मुखी बभूव । शनैः शनैरुपची- यमानगर्भभरालसा च गुरुभिर्वारितापि वन्दनाय कथमपि सखीभिर्ह- स्तावलम्बेनानीयत । विश्राम्यन्ती सालभञ्जिकेव समीपगतस्तम्भभि- त्तिष्वलग्द्यत । कमललोभनिलीनैरलिभिरिव वृतावुद्धर्तुं नाशक्नुच्चरणौ । मृणाललोभेन च चरणनखमयूखलग्नैर्भवनहंसैरिव संचार्यमाणा मन्द- मन्दं बभ्राम । मणिभित्तिपातिनीषु निजप्रतिमास्वपि हस्तावलम्बनलो- भेन प्रसारयामास करकमलम्, किमुत सखीषु । माणिक्यस्तम्भदीधि- तोरप्यालब्बितुमाचकाङ्क्ष, किं पुनर्भवनलताः । समादेष्टुमप्यसमर्थासी- द्गृहकार्याणि, कैव कथा कर्तुम् । आस्तां नूपुरभारखेदितं चरणयुगलं मनसापि नोदसह्त सौधमारोढुम् । अङ्गान्यपि नाशक्तोद्धारयितुं दूरे भूषणानि । चिन्तयित्वापि क्रीडापर्वताधिरोहणमुत्कम्पितस्तनी तस्तान । प्रत्युत्थानेषूभयजानुशिखरांविनिहितकरकिसलयापि गर्वादिव गर्भणाधा- र्यत । दिवसं चाधोमुखी स्तनपृष्ठसंक्रान्तेनापत्यदर्शनौत्सुक्यादन्तःप्रवि- ष्टेनेव मुखकमलेनैवं प्रीयमाणा ददर्श गर्भम् । उदरे तनयेन हृदये च भर्त्रा तिष्ठता द्विगुणितामिव लक्ष्मीमुवाह । सख्युत्सङ्गामुक्तशरीरा च कुछ समय के बीतने पर देवी यशोमती के गर्भ में पहले पहल राज्यवर्धन हुआ । गर्भ में स्थित उसके यश से मानों जननी ने पीलापन धारण किया । उसके गुणों के भार से क्लान्त होकर मानों अपने शरीर को ढोने में वह असमर्थ होने लगी । उसकी कान्ति के अमृत रस से तृप्त होकर मानों वह भोजन से विमुख होने लगी । धीरे-धीरे गर्भ के भारी हो जाने से वह अलसाकर चलने लगी और गुरुओं के मना करने पर भी सखियों द्वारा हाथ का सहारा देकर प्रणाम करने के लिए पहुँचाई जाने लगी । जब वह थक जाने पर विश्राम के लिए समीप के किसी खम्भे का सहारा लेकर टिकती तो सालभंजिका की भाँति प्रतीत होती, मानों कमल समझ कर बैठे हुए भौरों से व्याप्त अपने चरणों को वह उठा नहीं पा रही थी, मानों उसके चरण के नख की किरणों को मृणाल समझ कर उसी के लोभ से हंस उसे मंद मंद चाल से चला रहे थे । मणि की दीवारों में पड़ती हुई अपनी छाया के ऊपर भी हाथ का सहारा लेने के लोभ से वह अपना हाथ फैला देती, सखियों के सहारे की तो बात ही क्या । माणिक्य के स्तम्भों की किरणों पर भी वह टिक जान-