हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 253, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें२०८ हर्षचरितम् शरीरपरिचारिकाणामङ्केषु सपत्नीनां तु शिरःसु पादौ चकार । अवतीर्णे च दशमे मासि सर्वोर्वीभृत्पक्षपाताय वज्रपरमाणुभिरिव निर्मितम्, त्रिभुवनभारधारणसमर्थ शेषफणामण्डलोपकरणैरिव कल्पितम्, सकल- भूभृत्कम्पकारिण दिग्गजवयवैरिव विहितमसूत देवं राज्यवर्धनम् । यस्मिंश्च जाते जातप्रमोदा नृत्यमय्य इवाजायन्त प्रजाः । पूरितासंख्यशङ्खशब्द- मुखरं प्रहतपटहशतपटुरवं गम्भीरभेरीनिनादनिर्भरभरितभुवनं प्रमोदो- न्मत्तमर्त्यलोकमनोहरं मासमेकं दिवसमिव महोत्सवमकरोन्नरपतिः । उर्वीभृतो राजानः, पर्वताश्च । पक्षाः समूहाः, पतत्राणि च । पातः पतनम्, शातनं च । चाहती थी, भवनलता के सहारे को तो बात ही क्या । घर के कामों को अढ़ाने में भी वह असमर्थ थी, बातचीत करना तो दूर रहा । नूपुरों के बोझ से भी खिन्न हो जाने से उसके दोनों चरण थक जाते थे, ऐसी स्थिति में मन से भी कोठे पर चढ़ने का साहस नहीं कर पाती थी । वह अपने अङ्गों को भी धारण नहीं कर सकती थी, गहने तो दूर रहे । अपने क्रीड़ापर्वत पर जब केवल वह सोचते हुए ही चढ़ती तो उसके दोनों स्तन काँपने लग जाते । जब वह उठने का प्रयत्न करती तब अपनी दोनों जाँघों के अग्रभाग पर हाथ टेकती, फिर भी मानों गर्भ द्वारा अपनी गुरुता के गर्व से फिर बैठा दी जाती थी । दिन में वह अपना मुख नीचा किए रहती, स्तन पर उसके मुख का प्रतिबिम्ब संक्रान्त हो रहा था मानों अपने पुत्र को देखने की उत्सुकता से वह अपने मुख-कमल के भीतर प्रवेश करके प्रसन्न होती हुई गर्भ देखती थी । उदर में बच्चा एवं हृदय में पति के निवास करने से वह मानों दुगुनी शोभा धारण कर रही थी । वह सखियों की गोद में अपने आपको छोड़ देती थी । परिचारिकाओं के अङ्क में और अपनी सौतों के सिर पर उसने अपने चरण रखे। दसवें मास में उसने देव राज्यवर्धन को पैदा किया, मानों वह सारे पर्वतों के पक्ष काट फेंकने के लिए (अथवा सारे राजाओं में पक्षपात करने के लिए) वज्र के परमाणुपुंज से बना था या त्रिभुवन का बोझ धारण करने में समर्थ शेष नाग के फणामण्डल के निर्माण की सामग्री से बना था या सारे पर्वतों (अथवा राजाओं) को कँपा देने वाले दिग्गज के अङ्गों से बना था । उसके उत्पन्न होने की खुशी में सारी प्रजा नाचने लग गई । राजा ने महीने भर बड़ी धूम-धाम के साथ पुत्रजन्मोत्सव मनाया जो ऐसा लगा कि एक दिन में बीत गया। असंख्य शंखों की आवाज चारों ओर भर गई । सैकड़ों पटहों की कड़कड़ाहट गूँज गई । भुवन में भेरियों का गंभीर नाद भर गया । आनन्द से सारा संसार उन्मत्त होकर मनोहर लगने लगा ।