हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उच्छ्वासः २०६ अथान्यस्मिन्नतिक्रान्ते कस्मिंश्चित्काले कन्दलिनि कुड्मलितकदम्ब- तरौ रूढतोक्मतृणस्तम्बे स्तम्भिततामरसे विकसितचातकचेतसि मूक- मानसाैकसि नभसि मासि देव्या देवक्या इव चक्रपाणिर्यशोमत्या हृदये गर्भे च सममेव संबभूव हर्षः । शनैः शनैश्चास्याः सर्वप्रजापुण्यैरिव परिगृहीता भूयोऽप्यापाण्डुतामङ्गयष्टिर्जगाम । गर्भारम्भेण श्यामायमान- चारुचूचुकचूलिकौ चक्रवर्तिनः पातुं मुद्रिताविव पयोधरकलशौ बभारोरः- स्थलेन । स्तन्यार्थमानननिहिता दुग्धनदीव दीर्घस्निग्धधवला माधुर्य- मधत्त दृष्टिः । सकलमङ्गलगणाधिष्ठितगात्रगरिम्णेव गतिरमन्दायत । मन्दं-मन्दं संचरन्त्या निर्मलमणिकुट्टिमनिमग्नप्रतिबिम्बनिभेन गृहीतपा- दपल्लवा पूर्वसेवामिवारेभे पृथिव्यस्याः दिवसमधिशयानायाः शयनीय- मपाश्रयपत्रभङ्गपुत्रिकाप्रतिमा विमलकपोलॊदरगता प्रसवसमयं प्रतिपा- लयन्ती लक्ष्मीरिवालक्ष्यत । क्षपासु सौधशिखराग्रगताया गर्भोन्माथमु- कन्दलानी लताभेदः । नीरं तोयम् । मानसाैकसो हंसाः । नभसि श्रावणे । यशोवत्या देव्याः । चक्रपाणिः कृष्णः, रेखाकारं च चक्रं पाणौ यस्य । देवक्या अपि यशोवत्याः । प्रमोदो हर्षः । पुण्यैरिवेति । पुण्यानां स्वभावशुद्धित्वात् । स्तनयोर्भम्वं कुछ समय के बाद सावन के महीने में कंदली लताएँ बढ़ गईं, कदम्ब के वृक्षों में कोंढ़ियाँ उग आईं, तोभ नामक घास के हरे हरे गुच्छे उत्पन्न हो गए, कमल निश्चल हो गए, चातक पक्षियों का मन खिल गया और हंस चुप हो गए तब देवकी के गर्भ में कृष्ण के समान यशोवती के हृदय और गर्भ में साथ ही साथ हर्ष उत्पन्न हुआ । धीरे-धीरे उसकी अङ्गयष्टि मानों प्रजा के पुण्यों से मिलकर पीली पड़ गई । गर्भ के आरम्भकाल से ही उसके स्तनकलश के काले-काले चुचुक और भी काले पड़ गए, मानों चक्रवर्ती के पीने के लिए उन पर मुद्रा (अर्थात् राजकीय सील-मोहर) लगी हो । मानों स्तन के दूध के लिए उसके मुँह में निहित दुग्धनदी के समान दीर्घ, स्निग्ध और उज्ज्वल उसकी दृष्टि में मिठास भर गई । सारे मंगलों से अधिष्ठित होने के कारण शरीर पर बोझ होने से मानों उसकी गति मन्द पड़ गई । इधर से उधर जब वह मन्द मन्द संचरण करती तब जो चरण-युगल निर्मल मणिकुट्टिमों पर पड़ता तो ऐसा मालूम होता कि पृथिवी उसके चरणपल्लव ग्रहण करके अभी से सेवा करने लग गई हो । दिन में पलंग पर सोती हुई उसके कपोलतल में उपधान पर की पत्रभंग के साथ पुतलियाँ प्रतिबिम्बित हो जाती थीं, मानों प्रसवसमय की प्रतीक्षा में लक्ष्मी विराजमान हो । रात्रियों में जब वह कोठे के अग्रभाग पर जाकर बैठती तो उसके गर्भखेद से स्रस्त अंशुक वाले स्तनों पर पड़ता हुआ १४ ह० च०