भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

२१० हर्षचरितम् कांशुके स्तनमण्डले संक्रान्तमुडुपतिमण्डलमुपरि गर्भस्य श्वेतातपत्र- मिव केनापि धार्यमाणमदृश्यत । सुप्ताया वासभवने चित्रभित्तिचामर- ग्राहिण्योऽपि चामराणि चालयांचक्रुः । स्वप्नेषु करविधृतकमलिनीपलाश- पुटसलिलैश्चतुर्भिरपि दिग्करिभिरक्रियताभिषेकः । प्रतिबुध्यमानायाश्च चन्द्र- शालिसालभञ्जिकापरिजनेाऽपि जयशब्दमसकृदजनयत् । परिजना- ह्वानेष्वादिशेत्यशरीरा वाचो निश्चेरुः । क्रीडायामपि नासहताज्ञाभ- ङ्गम् । अपि च चतुर्णामपि महार्णवानामेकीकृतेनाम्भसा स्नातुं वाञ्छा बभूव । वेलाबनलतागृहोदरपुलिनपरिसरेषु पर्यटितुं हृदयमभिललाष । आत्ययिकेष्वपि कार्येषु सविभ्रमं भ्रूलता चचाल । संनिहितेष्वपि मणि- दर्पणेषु मुखमुत्खाते खङ्गपट्टे वीक्षितुं व्यसनमासीत् । उत्सारितवीणाः स्त्रीजनविरुद्धा धनुर्ध्वनयः श्रुतावसुखायन्त । पञ्जरकेसरिषु चक्षुररमत । गुरुप्रणामेष्वपि स्तम्भितमिव शिरः कथमपि ननाम । सख्यश्चास्याः

स्तन्यं क्षीरम् । अपाश्रयः पर्यङ्कः । उन्माथः खेदः । चन्द्रशाला धवलगृहस्योपरि प्रासादिकायामन्तर्धारणीत्युच्यते । गर्भस्थजनचित्तवृत्त्यनुसारेण गर्भिण्या अपि चित्तवृत्तिर्भवति । यतो वार्ता श्रूयते ततश्चतुर्णामित्युक्तम् । परिसरः पर्यन्तः । आत्ययिकेष्ववश्यकर्त्तव्येषु । चन्द्र-मण्डल का प्रतिबिम्ब मानों गर्भ के ऊपर किसी के द्वारा धारण किया गया श्वेत आतपत्र के समान लगता था। जब वह अपने वास-भवन में सोती तो भित्तियों पर बनी हुई चामरग्राहिणी स्त्रियाँ भी उसके ऊपर चँवर डुलाती जान पड़ती थीं। जब वह सो जाती तब स्वप्नों में चारों दिशाओं के दिग्गज अपनी कमलिनी के खदोने में जल लेकर उसका अभिषेक करते। जब वह सोकर उठती तो चन्द्रशालिका में उत्कीर्ण शालभंजिका रूपी स्त्रियाँ भी उसकी मानों जयजयकार करती थीं। जब अपने परिजनों को पुकारती तो 'आज्ञा दो' यह आवाज आकाश से भी आती। वह खेल-खिलवाड़ में भी अपनी आज्ञा का भङ्ग होना न सह सकती थी। वह चारों समुद्रों के एक में मिले जल से स्नान करने की इच्छा प्रकट करती थी। समुद्रतट के वन के लतागृहों की रेतों में घूमने का मन होता। आवश्यक कार्यों में भी वह केवल विलास के साथ अपनी भौंह ही मटकाती रहती थी। पास में मणिदर्पणों के रहने पर भी वह खींची हुई तलवार पर ही अपना मुँह देखने का शौक करती थी। वीणा की आवाज के बदले स्त्रियों के स्वभाव के विरुद्ध उसे धनुष का टंकार ही सुखद प्रतीत होती। उसकी आँखें पिंजड़े के शेरों पर टिकती थीं। गुरुजनों को प्रणाम करते समय उसका निश्चल सिर किसी-किसी प्रकार झुकता था।