भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 256

चतुर्थ उच्छ्वासः २११ प्रमोद्विस्फारितैर्लोचनपुटैरासन्नप्रसवमहोत्सवधियेव धवलयन्त्यो भवनं विकचकुमुदकमलकुवलयपलाशवृष्टिमयं रक्षाबलिविधिमिवानवरतं विद- धाना दिक्षु क्षणमपि न मुमुचुः पार्श्वम्। आत्मोचितस्थाननिषण्णाश्च महान्तो विविधौषधिधरा भिषजो भूधरा इव भुवो धृतिं चक्रुः। पयोनिधीनां हृदयानीव लक्ष्म्या सहागतानि ग्रीवासूत्रग्रन्थिषु प्रशस्तरत्नान्यबध्यन्त । ततश्च प्राप्ते ज्येष्ठामूलीये मासि बहुलासु बहुलपक्षद्वादश्यां व्यतीते प्रदोषसमये समारुरुक्षति क्षपायौवने सहसैवान्तःपुरे समुदपादि कोला- हलः स्त्रीजनस्य । निर्गत्य च ससंभ्रमं यशोवत्याः स्वयमेव हृदयनिर्विशेषा धात्र्याः सुता सुपात्रेति नाम्ना राज्ञः पादयोर्निपत्य 'देव ! दिष्ट्या वर्धसे द्वितीयसुतजन्मना' इति व्याहरन्ती पूर्णपात्रं जहार । अस्मिन्नेव च काले राज्ञः परमसम्मतः शतशः संवादितातीन्द्रियादेशः, महान्तः प्रभाविनः, उच्छ्रिताश्च । विविधा ओषधीर्धारयन्ति ये ते विविधा ओषधयो यासु ताः धरा भूमयो येषां ते च । धृतिं धैर्यम्, धारणं च । लक्ष्म्या सहैति । लच्म! हिं पयोधिमुता । प्रशस्तरत्नानीति कर्मधारयः, अन्यत्र बहुव्रीहिः । ज्येष्ठामूलोयो मासो ज्येष्ठः । बहुलासु कृत्तिकासु । बहुलपक्षः कृष्णपक्षः । पूर्ण- पात्रं यथापरिहृतवस्त्रादि । उक्तं च—'आनन्ददो हि सौहार्दादित्य वस्त्रादिकं बलात् । भजानतो हरत्येव पूर्णपात्रं तु तत्स्मृतम् ॥' इति । संचादितः प्रत्यक्षीकृतः । अतीन्द्रियादेशो भाविकथनम् । संकलिता गणनाज्ञः । उसकी सखियाँ निकट भविष्य में होने वाले पुत्र-जन्म के महोत्सव के लिए मानो आनन्द से विस्फारित आँखों द्वारा भवनों को बनाती हुई और खिले कुमुद, कमल, कुवलय, पलाश की वर्षा के रूप में दिशाओं में रक्षाबलि चढ़ाती हुई उसे क्षण भर भी अकेली न छोड़ती थीं। अपने-अपने योग्य स्थान पर बैठे हुए पर्वत के समान नाना प्रकार की औषधि लिए हुए बड़े बड़े वैद्य भी उस प्रसव-भूमि को सिर पर लिए रहते थे। बहुमूल्य रत्न उसकी गर्दन के सूत्र में गुंथे हुए लटक रहे थे, मानों लक्ष्मी के साथ निकल कर आए हुए समुद्र के हृदय हों । तब जेठ महीने के कृत्तिका नक्षत्र में कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन सन्ध्या के बीतने पर जब रात चढ़ रही थी तभी अन्तःपुर में एकाएक स्त्रियों ने शोरगुल मचाया । रानी यशोमती की अत्यन्त प्रिय धात्री की लड़की सुपात्रा स्वयं बड़ी तेजी से निकली और राजा के पैरों पर गिरकर 'देव, दूसरे पुत्र का जन्म हुआ है, आप भाग्यवान् है' यह कह कर इनाम के रूप में वस्त्र आदि ( पूर्णपात्र ) प्राप्त किया । इस समय तारक नाम का पूजा करने वाला ज्योतिषी राजा का परम-प्रिय था,