भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

२१२ · हर्षचरितम् दर्शितप्रभावः संकलिती, ज्योतिषि सर्वासां ग्रहसंहितानां पारदृश्वा, सकलगणकमध्ये महितो हितश्च त्रिकालज्ञानभाग्भोजकस्तारको नाम गणकः समुपसृत्य विज्ञापितवान्—'देव ! श्रूयते मांधाता किलैवंविधे व्यतीपातादिसर्वदोषाभिषङ्गरहितेऽहनि सर्वेषूच्चस्थानस्थितेष्वेवं ग्रहेष्वी- दृशि लग्ने भेजे जन्म । अर्वाक्ततोऽस्मिन्नन्तराले पुनरेवंविधे योगे चक्रवर्तिजनने नाजनि जगति कश्चिदपरः । सप्तानां चक्रवर्तिनामग्रणीश्च- क्रवर्तिचिह्नानां महारत्नानां च भाजनं सप्तानां सागराणां पालयिता सप्तत- न्तूनां सर्वेषां प्रवर्तयिता सप्तसप्तिसमः सुतोऽयं देवस्य जातः' इति । पारदृश्वा पर्यन्तदर्शी । (भोजको रविमर्चयित्वा, पूजका हि भूयसा गणका भवन्ति । ये मगा इति प्रसिद्धाः ) भागवता इत्यन्ये । व्योम्नि चन्द्रार्कौ राशिषट्के यदैकमार्ग- स्थितौ भवतः स व्यतीपातः । उक्तं च लाटाचार्येण—'गगने हिमकरसूर्यौ युग- पट्स्यानां यदैकमार्गस्थौ। भगणार्द्धऽर्कश्च यदा शशी च स भवेद्व्यतीपातः ॥' इति । अभिषङ्गः संबन्धः । अर्वाक्पश्चात् । चक्रवर्तिनामिति । 'भरतार्जुनमांधातृभगीरथ- युधिष्ठिराः । सगरो नहुषश्चैव सप्तैते चक्रवर्तिनः ॥' 'कूर्मोर्णो जालहस्तित्वं पद्मादि जालचरणत्व'मित्यादि चक्रवर्तिचिह्नानि । 'मण्यश्वरत्नचक्राणि वरा स्त्री परिना- यकः । षडेतानि तु रत्नानि कीर्तितानि मनीषिभिः ॥' परिनायकः सेनापतिः । गृहनायको गजाध्यक्षः । सप्ततन्तूनां यज्ञानाम् । सप्तसप्तिः सूर्यः । पहुँचा । विद्या के बल से उसने सैकड़ों बार इन्द्रियातीत विषय को सबके सामने प्रत्यक्ष कराया था । इस प्रकार वह अपना प्रभाव दिखा चुका था । वह गणित के अनुसार फल देखता था । ज्योतिष शास्त्र की सारी ग्रहसंहिताओं का वह पारंगत विद्वान् था । समस्त ज्योतिषियों के बीच में उसकी प्रतिष्ठा थी । स्वयं भी वह आदमी अच्छा था और त्रिकालज्ञ था । उसने महाराज के पास आकर निवेदन किया—'राजन्, सुना जाता है इसी प्रकार सारे व्यतीपात आदि दोषों से रहित दिन में जब सारे ग्रह अपने ऊँचे स्थान पर विराजमान थे तभी इसी प्रकार के शुभ-लग्न में मान्धाता का जन्म हुआ था । इसके बाद इस बीच चक्रवर्ती के उत्पन्न होने वाले ऐसे योग में अब तक कोई उत्पन्न नहीं हुआ । यह तुम्हारा पुत्र प्रसिद्ध सात चक्रवर्ती राजाओं ( भरत, अर्जुन, मान्धाता, युधिष्ठिर, सगर और नहुष ) में आगे रहने वाला, शंख, चक्र आदि चक्रवर्ती के चिह्नों और महारत्नों को प्राप्त करने वाला, सात समुद्रों पर शासन करने वाला, समस्त यज्ञ करने वाला एवं सप्तसप्ति ( सूर्य ) के सदृश उत्पन्न हुआ है ।