भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

चतुर्थ उच्छ्वासः २१३ अत्रान्तरे स्वयमेवानाध्माता अपि तारमधुरं शङ्खा विरेसुः । अताडि- तोऽपि क्षुभितजलनिधिजलध्वनिधीरं जुगुञ्जाभिषेकदुन्दुभिः । अनाह- तान्यपि मङ्गलतूर्याणि रेगुः । सर्वभुवनाभयघोषणापटह इव दिगन्तरेषु बभ्राम तूर्यप्रतिशब्दः । विधुतकेसरसटाश्च साटोपगृहीतहरितदूर्वापल्लव- कवलप्रशस्तैर्मुखपुटैः समहेषन्त हृष्टा वाजिनः । सलीलमुत्क्षिप्तैर्हस्तपल्ल- वैर्नृत्यन्त इव, श्रवणसुभगं जगर्जुर्गजाः । ववौ चाचिराच्चक्रायुधमुत्सृजन्त्या लक्ष्म्या निःश्वास इव सुरामोदसुरभिर्दिव्यानिलः यज्वनां मन्दिरेषु प्रदक्षिणशिखाकलापकथितकल्याणागमाः प्रजज्वलुरनिन्धना वैतानवह्वयः । भुवस्तलात्तपनीयशृङ्खलाबन्धबन्धुरकलशीकोशाः समुद्गुर्महानिधयः । प्रहतमङ्गलतूर्यप्रतिशब्दानिभेन दिक्षु दिक्पालैरपि प्रमोदादक्रियतैव दिष्ट- वृद्धिकलकलः । तत्क्षण एव च शुक्लवाससो ब्रह्ममुखाः कृतयुगप्रजापतय इव प्रजावृद्धये समुपतस्थिरे द्विजातयः । साक्षाद्धर्म इव शान्त्युदकफल- अनाध्माता मुखानिलेनापूरिताः । दुन्दुभिरानकः । तूर्याणि वादित्राणि घोषण- श्रावणा । ग्रीवारोमवक्षस्यस्त एव सटाः । कवलो ग्रासः । यज्वनां यज्ञयाजिनाम् । विताने यज्ञे भवा वैतानाः । तपनीयं सुवर्णम् । बन्धुरो हृद्यः । कोश आवरणम् । ब्रह्ममुखा वेदवदना अपि । इसी समय मुँह से फूँके न जाने पर भी शंख ऊँची और मधुर आवाज में बज उठे । अभिषेक की दुन्दुभि बिना बजाए ही क्षुभित समुद्र की भाँति धीर स्वर में गूँज उठी । आहत न होने पर भी मंगलतूर्य गरज उठे । उनका प्रतिशब्द सारे भुवन को अभयदान करने वाला घोषणापटह के समान दिग्दिगन्त में चक्कर मारने लगा । घोड़े प्रसन्न होकर अपनी अयाल झाड़ते हुए हपस-हपस कर उठाई हुई हरी दूब के कौर से भरे मुँह से हिनहिनाने लगे । लीला के साथ अपनी सूँड़ को उठाकर मानो नाचते हुए हाथी चिग्घाड़ने लगे । थोड़ी ही देर में मानों विष्णु को छोड़ती हुई लक्ष्मी के विरहजन्य निःश्वास के समान मदिरा की मादक गन्ध वाली दिव्य हवा चलने लगी । याज्ञिक लोगों के घर में बिना इन्धन के ही यज्ञ की अग्नियों अपना दक्षिणामुख शिखाओं से शुभागम का सन्देश व्यक्त करते हुए धधक उठीं । सोने की सिकड़ियों में बँधे हुए घड़ों की बड़ी बड़ी निधियाँ भूगर्भ से निकलने लगीं । बजाए जाते हुए मंगलतूर्यों के प्रतिशब्द के रूप में दिशाओं में मानों दिक्पाल आनन्दित होकर भाग्यवृद्धि के होने से धूमधाम मचाने लगे । उसी समय श्वेत वस्त्र धारण किये हुए वैदिक ब्राह्मण उपस्थित होने लगे, मानों प्रजावृद्धि के