हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
२१० हर्षचरितम् कांशुके स्तनमण्डले संक्रान्तमुडुपतिमण्डलमुपरि गर्भस्य श्वेतातपत्र- मिव केनापि धार्यमाणमदृश्यत । सुप्ताया वासभवने चित्रभित्तिचामर- ग्राहिण्योऽपि चामराणि चालयांचक्रुः । स्वप्नेषु करविधृतकमलिनीपलाश- पुटसलिलैश्चतुर्भिरपि दिग्करिभिरक्रियताभिषेकः । प्रतिबुध्यमानायाश्च चन्द्र- शालिसालभञ्जिकापरिजनेाऽपि जयशब्दमसकृदजनयत् । परिजना- ह्वानेष्वादिशेत्यशरीरा वाचो निश्चेरुः । क्रीडायामपि नासहताज्ञाभ- ङ्गम् । अपि च चतुर्णामपि महार्णवानामेकीकृतेनाम्भसा स्नातुं वाञ्छा बभूव । वेलाबनलतागृहोदरपुलिनपरिसरेषु पर्यटितुं हृदयमभिललाष । आत्ययिकेष्वपि कार्येषु सविभ्रमं भ्रूलता चचाल । संनिहितेष्वपि मणि- दर्पणेषु मुखमुत्खाते खङ्गपट्टे वीक्षितुं व्यसनमासीत् । उत्सारितवीणाः स्त्रीजनविरुद्धा धनुर्ध्वनयः श्रुतावसुखायन्त । पञ्जरकेसरिषु चक्षुररमत । गुरुप्रणामेष्वपि स्तम्भितमिव शिरः कथमपि ननाम । सख्यश्चास्याः
स्तन्यं क्षीरम् । अपाश्रयः पर्यङ्कः । उन्माथः खेदः । चन्द्रशाला धवलगृहस्योपरि प्रासादिकायामन्तर्धारणीत्युच्यते । गर्भस्थजनचित्तवृत्त्यनुसारेण गर्भिण्या अपि चित्तवृत्तिर्भवति । यतो वार्ता श्रूयते ततश्चतुर्णामित्युक्तम् । परिसरः पर्यन्तः । आत्ययिकेष्ववश्यकर्त्तव्येषु । चन्द्र-मण्डल का प्रतिबिम्ब मानों गर्भ के ऊपर किसी के द्वारा धारण किया गया श्वेत आतपत्र के समान लगता था। जब वह अपने वास-भवन में सोती तो भित्तियों पर बनी हुई चामरग्राहिणी स्त्रियाँ भी उसके ऊपर चँवर डुलाती जान पड़ती थीं। जब वह सो जाती तब स्वप्नों में चारों दिशाओं के दिग्गज अपनी कमलिनी के खदोने में जल लेकर उसका अभिषेक करते। जब वह सोकर उठती तो चन्द्रशालिका में उत्कीर्ण शालभंजिका रूपी स्त्रियाँ भी उसकी मानों जयजयकार करती थीं। जब अपने परिजनों को पुकारती तो 'आज्ञा दो' यह आवाज आकाश से भी आती। वह खेल-खिलवाड़ में भी अपनी आज्ञा का भङ्ग होना न सह सकती थी। वह चारों समुद्रों के एक में मिले जल से स्नान करने की इच्छा प्रकट करती थी। समुद्रतट के वन के लतागृहों की रेतों में घूमने का मन होता। आवश्यक कार्यों में भी वह केवल विलास के साथ अपनी भौंह ही मटकाती रहती थी। पास में मणिदर्पणों के रहने पर भी वह खींची हुई तलवार पर ही अपना मुँह देखने का शौक करती थी। वीणा की आवाज के बदले स्त्रियों के स्वभाव के विरुद्ध उसे धनुष का टंकार ही सुखद प्रतीत होती। उसकी आँखें पिंजड़े के शेरों पर टिकती थीं। गुरुजनों को प्रणाम करते समय उसका निश्चल सिर किसी-किसी प्रकार झुकता था।
चतुर्थ उच्छ्वासः २११ प्रमोद्विस्फारितैर्लोचनपुटैरासन्नप्रसवमहोत्सवधियेव धवलयन्त्यो भवनं विकचकुमुदकमलकुवलयपलाशवृष्टिमयं रक्षाबलिविधिमिवानवरतं विद- धाना दिक्षु क्षणमपि न मुमुचुः पार्श्वम्। आत्मोचितस्थाननिषण्णाश्च महान्तो विविधौषधिधरा भिषजो भूधरा इव भुवो धृतिं चक्रुः। पयोनिधीनां हृदयानीव लक्ष्म्या सहागतानि ग्रीवासूत्रग्रन्थिषु प्रशस्तरत्नान्यबध्यन्त । ततश्च प्राप्ते ज्येष्ठामूलीये मासि बहुलासु बहुलपक्षद्वादश्यां व्यतीते प्रदोषसमये समारुरुक्षति क्षपायौवने सहसैवान्तःपुरे समुदपादि कोला- हलः स्त्रीजनस्य । निर्गत्य च ससंभ्रमं यशोवत्याः स्वयमेव हृदयनिर्विशेषा धात्र्याः सुता सुपात्रेति नाम्ना राज्ञः पादयोर्निपत्य 'देव ! दिष्ट्या वर्धसे द्वितीयसुतजन्मना' इति व्याहरन्ती पूर्णपात्रं जहार । अस्मिन्नेव च काले राज्ञः परमसम्मतः शतशः संवादितातीन्द्रियादेशः, महान्तः प्रभाविनः, उच्छ्रिताश्च । विविधा ओषधीर्धारयन्ति ये ते विविधा ओषधयो यासु ताः धरा भूमयो येषां ते च । धृतिं धैर्यम्, धारणं च । लक्ष्म्या सहैति । लच्म! हिं पयोधिमुता । प्रशस्तरत्नानीति कर्मधारयः, अन्यत्र बहुव्रीहिः । ज्येष्ठामूलोयो मासो ज्येष्ठः । बहुलासु कृत्तिकासु । बहुलपक्षः कृष्णपक्षः । पूर्ण- पात्रं यथापरिहृतवस्त्रादि । उक्तं च—'आनन्ददो हि सौहार्दादित्य वस्त्रादिकं बलात् । भजानतो हरत्येव पूर्णपात्रं तु तत्स्मृतम् ॥' इति । संचादितः प्रत्यक्षीकृतः । अतीन्द्रियादेशो भाविकथनम् । संकलिता गणनाज्ञः । उसकी सखियाँ निकट भविष्य में होने वाले पुत्र-जन्म के महोत्सव के लिए मानो आनन्द से विस्फारित आँखों द्वारा भवनों को बनाती हुई और खिले कुमुद, कमल, कुवलय, पलाश की वर्षा के रूप में दिशाओं में रक्षाबलि चढ़ाती हुई उसे क्षण भर भी अकेली न छोड़ती थीं। अपने-अपने योग्य स्थान पर बैठे हुए पर्वत के समान नाना प्रकार की औषधि लिए हुए बड़े बड़े वैद्य भी उस प्रसव-भूमि को सिर पर लिए रहते थे। बहुमूल्य रत्न उसकी गर्दन के सूत्र में गुंथे हुए लटक रहे थे, मानों लक्ष्मी के साथ निकल कर आए हुए समुद्र के हृदय हों । तब जेठ महीने के कृत्तिका नक्षत्र में कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन सन्ध्या के बीतने पर जब रात चढ़ रही थी तभी अन्तःपुर में एकाएक स्त्रियों ने शोरगुल मचाया । रानी यशोमती की अत्यन्त प्रिय धात्री की लड़की सुपात्रा स्वयं बड़ी तेजी से निकली और राजा के पैरों पर गिरकर 'देव, दूसरे पुत्र का जन्म हुआ है, आप भाग्यवान् है' यह कह कर इनाम के रूप में वस्त्र आदि ( पूर्णपात्र ) प्राप्त किया । इस समय तारक नाम का पूजा करने वाला ज्योतिषी राजा का परम-प्रिय था,
२१२ · हर्षचरितम् दर्शितप्रभावः संकलिती, ज्योतिषि सर्वासां ग्रहसंहितानां पारदृश्वा, सकलगणकमध्ये महितो हितश्च त्रिकालज्ञानभाग्भोजकस्तारको नाम गणकः समुपसृत्य विज्ञापितवान्—'देव ! श्रूयते मांधाता किलैवंविधे व्यतीपातादिसर्वदोषाभिषङ्गरहितेऽहनि सर्वेषूच्चस्थानस्थितेष्वेवं ग्रहेष्वी- दृशि लग्ने भेजे जन्म । अर्वाक्ततोऽस्मिन्नन्तराले पुनरेवंविधे योगे चक्रवर्तिजनने नाजनि जगति कश्चिदपरः । सप्तानां चक्रवर्तिनामग्रणीश्च- क्रवर्तिचिह्नानां महारत्नानां च भाजनं सप्तानां सागराणां पालयिता सप्तत- न्तूनां सर्वेषां प्रवर्तयिता सप्तसप्तिसमः सुतोऽयं देवस्य जातः' इति । पारदृश्वा पर्यन्तदर्शी । (भोजको रविमर्चयित्वा, पूजका हि भूयसा गणका भवन्ति । ये मगा इति प्रसिद्धाः ) भागवता इत्यन्ये । व्योम्नि चन्द्रार्कौ राशिषट्के यदैकमार्ग- स्थितौ भवतः स व्यतीपातः । उक्तं च लाटाचार्येण—'गगने हिमकरसूर्यौ युग- पट्स्यानां यदैकमार्गस्थौ। भगणार्द्धऽर्कश्च यदा शशी च स भवेद्व्यतीपातः ॥' इति । अभिषङ्गः संबन्धः । अर्वाक्पश्चात् । चक्रवर्तिनामिति । 'भरतार्जुनमांधातृभगीरथ- युधिष्ठिराः । सगरो नहुषश्चैव सप्तैते चक्रवर्तिनः ॥' 'कूर्मोर्णो जालहस्तित्वं पद्मादि जालचरणत्व'मित्यादि चक्रवर्तिचिह्नानि । 'मण्यश्वरत्नचक्राणि वरा स्त्री परिना- यकः । षडेतानि तु रत्नानि कीर्तितानि मनीषिभिः ॥' परिनायकः सेनापतिः । गृहनायको गजाध्यक्षः । सप्ततन्तूनां यज्ञानाम् । सप्तसप्तिः सूर्यः । पहुँचा । विद्या के बल से उसने सैकड़ों बार इन्द्रियातीत विषय को सबके सामने प्रत्यक्ष कराया था । इस प्रकार वह अपना प्रभाव दिखा चुका था । वह गणित के अनुसार फल देखता था । ज्योतिष शास्त्र की सारी ग्रहसंहिताओं का वह पारंगत विद्वान् था । समस्त ज्योतिषियों के बीच में उसकी प्रतिष्ठा थी । स्वयं भी वह आदमी अच्छा था और त्रिकालज्ञ था । उसने महाराज के पास आकर निवेदन किया—'राजन्, सुना जाता है इसी प्रकार सारे व्यतीपात आदि दोषों से रहित दिन में जब सारे ग्रह अपने ऊँचे स्थान पर विराजमान थे तभी इसी प्रकार के शुभ-लग्न में मान्धाता का जन्म हुआ था । इसके बाद इस बीच चक्रवर्ती के उत्पन्न होने वाले ऐसे योग में अब तक कोई उत्पन्न नहीं हुआ । यह तुम्हारा पुत्र प्रसिद्ध सात चक्रवर्ती राजाओं ( भरत, अर्जुन, मान्धाता, युधिष्ठिर, सगर और नहुष ) में आगे रहने वाला, शंख, चक्र आदि चक्रवर्ती के चिह्नों और महारत्नों को प्राप्त करने वाला, सात समुद्रों पर शासन करने वाला, समस्त यज्ञ करने वाला एवं सप्तसप्ति ( सूर्य ) के सदृश उत्पन्न हुआ है ।
चतुर्थ उच्छ्वासः २१३ अत्रान्तरे स्वयमेवानाध्माता अपि तारमधुरं शङ्खा विरेसुः । अताडि- तोऽपि क्षुभितजलनिधिजलध्वनिधीरं जुगुञ्जाभिषेकदुन्दुभिः । अनाह- तान्यपि मङ्गलतूर्याणि रेगुः । सर्वभुवनाभयघोषणापटह इव दिगन्तरेषु बभ्राम तूर्यप्रतिशब्दः । विधुतकेसरसटाश्च साटोपगृहीतहरितदूर्वापल्लव- कवलप्रशस्तैर्मुखपुटैः समहेषन्त हृष्टा वाजिनः । सलीलमुत्क्षिप्तैर्हस्तपल्ल- वैर्नृत्यन्त इव, श्रवणसुभगं जगर्जुर्गजाः । ववौ चाचिराच्चक्रायुधमुत्सृजन्त्या लक्ष्म्या निःश्वास इव सुरामोदसुरभिर्दिव्यानिलः यज्वनां मन्दिरेषु प्रदक्षिणशिखाकलापकथितकल्याणागमाः प्रजज्वलुरनिन्धना वैतानवह्वयः । भुवस्तलात्तपनीयशृङ्खलाबन्धबन्धुरकलशीकोशाः समुद्गुर्महानिधयः । प्रहतमङ्गलतूर्यप्रतिशब्दानिभेन दिक्षु दिक्पालैरपि प्रमोदादक्रियतैव दिष्ट- वृद्धिकलकलः । तत्क्षण एव च शुक्लवाससो ब्रह्ममुखाः कृतयुगप्रजापतय इव प्रजावृद्धये समुपतस्थिरे द्विजातयः । साक्षाद्धर्म इव शान्त्युदकफल- अनाध्माता मुखानिलेनापूरिताः । दुन्दुभिरानकः । तूर्याणि वादित्राणि घोषण- श्रावणा । ग्रीवारोमवक्षस्यस्त एव सटाः । कवलो ग्रासः । यज्वनां यज्ञयाजिनाम् । विताने यज्ञे भवा वैतानाः । तपनीयं सुवर्णम् । बन्धुरो हृद्यः । कोश आवरणम् । ब्रह्ममुखा वेदवदना अपि । इसी समय मुँह से फूँके न जाने पर भी शंख ऊँची और मधुर आवाज में बज उठे । अभिषेक की दुन्दुभि बिना बजाए ही क्षुभित समुद्र की भाँति धीर स्वर में गूँज उठी । आहत न होने पर भी मंगलतूर्य गरज उठे । उनका प्रतिशब्द सारे भुवन को अभयदान करने वाला घोषणापटह के समान दिग्दिगन्त में चक्कर मारने लगा । घोड़े प्रसन्न होकर अपनी अयाल झाड़ते हुए हपस-हपस कर उठाई हुई हरी दूब के कौर से भरे मुँह से हिनहिनाने लगे । लीला के साथ अपनी सूँड़ को उठाकर मानो नाचते हुए हाथी चिग्घाड़ने लगे । थोड़ी ही देर में मानों विष्णु को छोड़ती हुई लक्ष्मी के विरहजन्य निःश्वास के समान मदिरा की मादक गन्ध वाली दिव्य हवा चलने लगी । याज्ञिक लोगों के घर में बिना इन्धन के ही यज्ञ की अग्नियों अपना दक्षिणामुख शिखाओं से शुभागम का सन्देश व्यक्त करते हुए धधक उठीं । सोने की सिकड़ियों में बँधे हुए घड़ों की बड़ी बड़ी निधियाँ भूगर्भ से निकलने लगीं । बजाए जाते हुए मंगलतूर्यों के प्रतिशब्द के रूप में दिशाओं में मानों दिक्पाल आनन्दित होकर भाग्यवृद्धि के होने से धूमधाम मचाने लगे । उसी समय श्वेत वस्त्र धारण किये हुए वैदिक ब्राह्मण उपस्थित होने लगे, मानों प्रजावृद्धि के
२१४ हर्षचरितम् हस्तस्तस्थौ पुरः पुरोधाः ! पुरातन्यः स्थितय इवादृश्यन्तागता बान्धव- वृद्धाः । प्रलम्बश्मश्रुजालजटिलाननानि बहलमलपङ्ककलङ्ककालकायानि नश्यतः कलिकालस्य बान्धवकुलानीवाकुलान्यधावन्त मुक्तानि बन्धन- वृन्दानि । तत्कालापक्रान्तस्याधर्मस्य शिबिरश्रेणय इवालद्यन्त लोक- विलुण्ठिता विपणिवीथ्यः । बिलसदुन्मुखवामनकबधिरवृन्दवेष्टिताः साक्षा- ज्जातमातृदेवता इव बहुबालकव्याकुला ननृतुर्वृद्धधात्र्यः । प्रावर्तत च विगतराजकुलस्थितिरधःकृतप्रतीहाराकृतिरपनीतवेत्रिवेत्रो निर्दोषान्तः- पुरप्रवेशः समस्वामिपरिजनों निर्विशेषबालवृद्धः समानशिष्टारिष्टजनो दुर्ज्ञेयमत्तमत्तप्रविभागस्तुल्यकुलयुवतिवेश्यालापविलासः प्रनृत्तसकलकट- कलोकः पुत्रजन्मोत्सवो महान् । अपरेद्युरारभ्य सर्वाभ्यो दिग्भ्यः स्त्रीराज्यानीवावर्जितानि, असुरविव- राणीवापावृतानि, नारायणावरोधानीव प्रस्खलितानि, अप्सरसामिव पुरोधाः पुरोहितः । विपणिवीथ्यो वणिक्पथपङ्क्तयः । जातमातृदेवताः मार्जरा- नना ब्रह्मपुत्रपरिवारा सूतिकागृहे स्थाप्यते । अवरोधोऽन्तःपुरम् । अपरेद्युरित्यादौ । इदमित्थं बिभ्राणेन परिजनेनानुगम्यमानानि सामन्तान्तःपुर- लिए पधारे हुए सत्ययुगीन प्रजापति हों । साक्षात् धर्म के समान पुरोहित ब्राह्मण हाथ में शान्तिकर्म के लिए जल और फल लिए खड़े हो गए । बड़े-बूढ़े रिश्तेदार पुरानी मर्यादाओं के समान एकत्र हुए । दाढ़ों के बढ़ जाने से विकट मुँह वाले मैल के बैठ जाने से काले चिकट शरीर वाले बन्दी कारागार से मुक्त कर दिए गए और आकुल होकर इस प्रकार भागने लगे मानों नष्ट होते हुए कलिकाल के भाई-बन्धु हों । प्रसन्न हुए लोगों ने मारे खुशी के बनियों की दुकानें लूट लीं जो भागते हुए अधर्म की पैंठ सी जान पड़ती थीं । राजमहल में ऊपर मुँह किए हुए बौने और बहरों से घिरी हुई साक्षात् जानमातृका- संज्ञक देवियों के समान बालकों से अकुलाई जाती हुई बूढ़ी धात्रियाँ नाचने लगीं । राजकुल के नियम शिथिल कर दिए गए, प्रतीहार लोगों ने अपना वेष और डंडे उतार कर रख दिए और सब लोग बेरोक-टोक राजा की हवेली में घुसने लगे, मालिक और नौकर में कोई भेद नहीं रहा, बाल और वृद्ध सब एक हो गए, शिष्ट और अशिष्ट का भी अन्तर नहीं के बराबर हो गया, कुलयुवतियों और वेश्याओं की बातचीत में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं रहा । शिविर में रहने वाले लोग भी नाचने लगे । इस प्रकार धूम-धाम से पुत्र का जन्मोत्सव मनाया गया । दूसरे दिन सामन्तों की स्त्रियाँ राजकुल में आती हुई दिखाई पड़ीं, मानों सक्र
चतुर्थ उच्छ्वासः २१५ महीमवतीर्णानि कुलानि, परिजनेन पृथुकरण्डपरिगृहीताः स्नानीयचूर्णा- वकीर्णकुसुमाः सुमनःस्रजः, स्फटिकशिलाशकलशुक्लकर्पूरखण्डपूरिताः पात्रीः, कुङ्कुमाधिवासभाञ्जि भाजनानि च मणिमयानि, सहकारतैलति- म्यत्तनुखदिरकेसरजालजटिलानि चन्दनधवलपूगफलफालीदन्तुरदन्तश- फरुकाणि, गुञ्जन्मधुकरकुलपीयमानपारिजातपरिमलानि पाटलानि पाट- लकानि च, सिन्दूरपात्राणि च पिष्टातकपात्राणि च बाललतालम्बमान- विटकवीटकांश्च ताम्बूलवृक्षकान्बिभ्राणेनानुगम्यमानानि चरणनिकुट्टन- रणितमणिन् पुरमुखरितदिङ्मुखानि नृत्यन्ति राजकुलमागच्छन्ति सम- न्तात्सामन्तान्तःपुरसहस्राण्यदृश्यन्त । शनैः शनैर्व्यजृम्भत च क्वचिन्नृत्तानूचितचिरंतनशालीनकुलपुत्रकलो- कलास्यप्रथितपार्थिवानुरागः, क्वचिदन्तःस्मितक्षितिपालापेक्षितक्षीबक्षुद्र- सहस्राण्यदृश्यन्तेति संबन्धः । स्त्रीराज्यानीति बहुलत्वम् । असुरविवराणीवेत्युज्ज्व- लत्वात् । नारायणेत्यादिगौरववत्त्वाद्बहुलत्वाच्च । स्नानीयं स्नानहितम् । खदिरकेसरं खदिरसारम् । फाली खाता । शफरुकाणि समुद्राः । पारिजातं सुगन्धिद्रव्यचूर्णम् । ‘पिष्टातः पटवासकः’ इत्यमरसिंहः । स च मङ्गलार्थः । विटकवीटकं पञ्चाशत्ताम्बूल- पत्रैः क्रियते । शनैः शनैरित्यादौ । व्यजृम्भतोत्सवामोद इति संबन्धः । शालीनमघृष्टता । दिशाओं से स्त्रियों के राज्य ही खिंचकर चले आ रहे हों, या पाताल के विवर ही खुल गए हों, या भगवान् कृष्ण के अन्तःपुर ही टपक पड़े हों, या अप्सराएँ जत्थे के जत्थे पृथिवी पर उतर आई हों । उनके पीछे अनेक नौकर-चाकर थे जो चौड़ी चंगेलियों में स्नानीय चूर्णों से छिड़की हुई फूलों की मालाएँ, तश्तरियों में स्फटिकमणि के टुकड़ों के समान कपूर के खण्ड, कुंकुम से सुगन्धित अनेक प्रकार के मणिमय पात्र, हाथीदाँत की छोटी मंजूषा में चन्दन से धवलित पूगफल और आम्र के तैल से सिक्त खदिर के केसर, सुगन्धित द्रव्यों के चूर्ण से भरी हुई लाल थैलियाँ, सिन्दूर के सिन्दोरे, पिष्टातक या पट- वासकचूर्ण से भरे पात्र और लटकते हुए पचास बीड़ों से लदे हुए छोटे-छोटे ताम्बूल के झाड़ लिए हुए थे। वे आकर अपने मणिनूपुरों की आवाज से दिशाओं को मुखरित करती हुई नाचने लगीं । शनैः शनैः उत्सव में कुछ और गमक पैदा हुई । कहीं नृत्य का अभ्यास न होने पर भी बड़े ही शर्मालु कुलपुत्र राजा के प्रेम से नाचने लगे । कहीं मतवाली क्षुद्रदासियाँ
२१६ हर्षचरितम् दासीसमाकृष्यमाणराजवल्लभः, क्वचिन्मत्तकटककुट्टनीकण्ठलग्नवृद्धार्यसा- मन्तवृत्तनिर्र्भरहसितनरपतिः, क्वचित्क्षितिपाक्षिसंज्ञादिष्टदुष्टदासेरकगीत- सूच्यमानसचित्रचौर्यरतप्रपञ्चः, क्वचिन्मदोत्कटकुटहारिकापरिष्वज्यमान- जरत्प्रव्रजितजनितजनहासः, क्वचिदन्योन्यनिर्भरस्पर्धोद्धुरविटकचेटकार- ब्धावाच्यवचनयुद्धः, क्वचिद्भूपालाबलात्कारकृष्टनर्त्यमाननृत्तानभिज्ञांतः- पुरपालभावितभुजिष्यः, सपर्र्वत इव कुसुमराशिभिः, सधारागृह इव सीधुप्रपाभिः, सनन्दनवन इव पारिजातकामोदैः, सनीहार इव कर्पूर- रेणुभिः, साट्टहास इव पटहरवैः, सामृतमथन इव महाकलकलैः, सावर्त्त इव रासकमण्डलैः, सरोमाञ्च इव भूषणमणिकिरणैः, सपट्टबन्ध इव चन्दन- ललाटिकाभिः, सप्रसव इव प्रतिशब्दकैः, सप्ररोह इव प्रसाददानैरुत्स- वामोदः । दास्या अपत्यं दासेरकः । 'क्षुद्राभ्यो वा' इत्यारक् । सचिवो मन्त्री । रतं सुरतम् । कुटहा- रिका कुम्भदासी । गायननर्तकभुजिष्याजनरचितः समूहश्चेटकः । अवाच्यवचनानि गाल्यः । भावितः कथं नृत्यन्तीत्यवलोकिताः । भुजिष्या दास्यः । रासकमण्डलै- स्त्यस्रभ्रान्तनृत्तवृन्दैः । ललाटेऽलंकारो ललाटिका । 'कर्णललाटात्कनलंकारे' । प्ररोहोऽङ्कुरः । मंद हँसी के साथ राजा का इशारा पाकर सम्राट् के प्रिय-पात्रों को अपनी ओर खींच लेती थीं। कहीं मतवाली बूढ़ी छिनाल स्त्रियाँ बूढ़े आर्य सामन्तों के गले में हाथ डाल देतीं, इस दृश्य को देख महाराज भी हँस पड़ते । कहीं पाजी छोकरे राजा की आँख का इशारा पाकर सचिवों के गुप्त प्रेम की पोल खोलने लगे । कहीं मस्तानी पनिहारिनें बूढ़े संन्यासियों से लिपट कर लोगों को हँसाने लगीं । कहीं एक दूसरे से चखाचखी करने में चालाक बदतमीज नौकर गाली-गलौज करते हुए भिड़ गए । कहीं नृत्य में अनभिज्ञ रनिवास की महिलाओं द्वारा जबर्दस्ती खींचकर नचाए गए अन्तःपुर के प्रतिहारी दासियों के साथ नृत्य में सम्मिलित हो गए । पर्वत के समान जगह-जगह फूलों की ढेरें थीं । धारागृहों की भाँति मदिरा के पनसाले बन गए । पारिजात की सुगन्धि नन्दनवन के समान भरने लगी । ओस जैसी कपूर की धूल भर गई । अट्टहास के समान पटह आवाज करने लगे । अमृत- मथन के समान लोग शोरगुल करने लगे । भँवरियों के समान रासमण्डलियाँ बन गईं । गहनों की मणियों की किरणें रोमाञ्च के सदृश मालूम पड़ीं । माथे पर चंदन के खौर कपड़े की बँधी पट्टी जैसे लगने लगे । बच्चों की केहाँ-केहाँ के समान प्रतिध्वनि होने लगी । प्रसन्नता से दिए जाने वाले दान अंकुर की भाँति लगातार बढ़ने लगे ।
चतुर्थ उच्छ्वासः २१७ स्कन्धावलम्बमानकेसरमालाः काम्बोजवाजिन इवास्कन्दन्तः, तरल- तारका हरिणा इवोड्डीयमानाः, सगरसुता इव खनित्रैर्निर्दयैश्चरणाभिघातै- र्दारयन्तो भुवम् , अनेकसहस्रसंख्याश्चिक्रीडुर्युवानः । कथमपि तालावचर- चारणचरणक्षोभं चक्षमे क्षमा । क्षितिपालकुमारकाणां च खेलतामन्यो- न्याम्फालेराभरणेषु मुक्ताफलानि फेलुः । सिन्दूररेणुना पुनरुत्पन्नहिरण्य- गर्भगर्भशोणितशोणाक्षमिव ब्रह्माण्डकपालमभवत् । पटवासपांसुपटलेन प्रकटितमन्दाकिनीसैकतसहस्रमिव शुशुभे नभस्तलम् । विप्रकीर्यमाण- पिष्टातकपरागपिञ्जरितातपा भुवनक्षोभविशीर्णपितामहकमलकिञ्जल्कर- जोराजिरञ्जिता इव रेजुर्दिवसाः । संघट्टविघटितहारपतितमुक्ताफलपटलेषु चस्खाल लोकः । स्थानस्थानेषु च मन्दमन्दमास्फाल्यमानालिङ्ग्यकेन शिञ्जानमञ्जु- केसराणि बकुलानि, ग्रीवारोमवह्वयश्च । काम्बोजा बाह्निकदेशजाः । आस्क- न्दन्त आक्रमन्तः । तालैरवचरन्ति तालावचराः । तालावचरणयुक्तं भ्रमणम् । स्फुटितालिकाशतैर्युक्तं चारणजनस्य कैश्चिद्भ्रमणम् । तत्कांस्यतालिकायाराडाशिष्टा- पञ्चकुलमारिवकाः दक्षिणापथे तालावा इति प्रसिद्धाः । खेलतां क्रीडताम् । फेलु- र्बिभिदुः । शोणाक्षं लोहितदिक्कम् । स्थानस्थानेष्वित्यादौ । एवंविधेनातोद्येनानुगम्यमानाः पण्यविलासिन्यः प्रानृत्य- हजारों नवयुवक कम्बोज देश के घोड़ों की तरह मौलसिरी की माला कंधे पर लटकाए कूदका मारने लगे और खन्ती से पृथ्वी को खन देने वाले सगर के पुत्रों के समान अपने निर्दय चरण के प्रहारों द्वारा पृथिवी को मानो विदीर्ण कर रहे थे । ताल के साथ नृत्य करते हुए चरण के प्रहारों को पृथिवी किस प्रकार सहन कर पाती थी । खेलते हुए राज- कुमारों के परस्पर धक्कामुक्की करने से आभूषणों के मोती टूट कर बिखर गए । सिन्दूर की धूल इस प्रकार दिशाओं में फैल गई मानों ब्रह्माण्ड का कपाल फिर से हिरण्यगर्भ के गर्भ से उत्पन्न हो रहा है और उस गर्भ के खून से लद्रफद है । पटवास की धूल से आकाश मन्दाकिनी की हजारों रेतों को प्रकट करता हुआ शोभित हो रहा था । दिन के आतप पिष्टातक के पीले पराग के उड़ने से पिंजरित हो गए, मानों सारे भुवन को आनन्द से कम्पित करने वाले ब्रह्माजी के कमल की धूल से रंजित हों । टक्कर लगने से टूटे हुए हार के बिखरे मुक्ताफलों पर पैर पड़ते ही लोग फिसल कर गिरने लगे । जगह-जगह पर वेश्यायें नृत्य करने लगीं । आलिङ्ग्यक नाम का एक विशेष प्रकार
वेणुना झणझणायमानझल्लरीकेण ताड्यमानतन्त्रीपटहिकेन वाद्यमाना- नुत्तालालावुवीणेन कलकांस्यकोशीक्वणितकाहलेन समकालदीयमानानु- तालतालिकेनातोग्यवाद्येनानुगम्यमानाः, पदे पदे झणझणितभूषणरवैर्पि सहृदयैरिवानुवर्तमानताललयाः, कोकिला इव मदकलकाकलीकामला- लापिन्यो विटानां कर्णामृतान्यश्लीलरासकपदानि गायन्त्यः, समुड्ड- मालिकाः, सकर्णपल्लवाः, सचन्दनतिलकाः, समुच्छ्रिताभिर्वलयावलाया- चालाभिर्बाहुलतिकाभिः सवितारमिवालिङ्गयन्त्यः, कुङ्कुमप्रमृष्टिरुचिर- कायाः काश्मीरकिशोर्य इव वल्गन्त्यः, नितम्बबिम्बलम्बिविकटकुरण्टकशे- खराः प्रदीप्ता इव रागाग्निना, सिन्दूरच्छटाच्छुरितमुखमुद्राः शासनपट्टपङ्क्तय
क्षिति संबन्धः। आलिङ्गयको मुरजभेदः। तन्त्री। पटहिका पटहभेदः। न उत्ताला अनुत्ताला अनुद्धटशब्दाः। कांस्यकोशी शय्या। काहलेन व्यासेन। काहलं कांस्य- द्वयाभिघातः। आतोद्यमिति। उक्तं च-'ततं वीणादिकं वाद्यमानद्धं मुरजादिकम्। वंशादिकं तु सुषिरं कांस्यतालादिकं घनम्। चतुर्विधमिदं वाद्यं वादित्राताद्यनाम- कम् ॥' इति। लयशब्देन ताल एव माननिधानं यतीनामवच्छेदेन विधिं निवर्त्त- यमानो द्रुतमध्यविलम्बिताख्यमानवर्तनविधौ। स एव तालम्तु यस्यवच्छेदमलक्ष्य- मानः स्यात्। व्यपदेशो लय ल्ति ख्यान इति। मदेन कलो हृष्टः। काकली कल- सूक्ष्ममधुरगीतध्वनिः। अश्लीलानि ग्राम्याणि। कुङ्कुमेन परिमृष्टिः परिमार्जनमुद्व- र्तनादि। अन्यत्र, कुङ्कुमप्रमृष्टिः कुङ्कुमस्थलीषु लोटनात्। कुरण्टका अम्लातकानि। तेषां रक्तत्वमाह-प्रदीप्ता इति। मुखमुद्रा वक्रटङ्कः। शासनपट्टानां मुखेऽग्रे या
का मृदङ्ग धीरे धीरे बजाया जा रहा था। वंशी भी सुरीली तान में बज रही थी। झांझ भी झनझना रही थी। तन्त्री पटहिका नामक एक ताशेनुमा छोटा बाजा टुनटुनाया जा रहा था। नीचे की तुम्बी वाली अलाबुवी वीणा बजाई जा रही थी। कांस्यकोशी काहल नाम का वाद्य भी बज रहा था। एक ही समय में ताल के अनुसार तालियां भी बजाई जा रही थीं और इन सबके सम्मिलित नौबत बजती हुई उनके पीछे चल रही थी। डग-डग पर उनके गहने बज उठते थे। मानों सहृदय लोग उनके पीछे ताल और लय का अनुसरण करते चल रहे हों। कोयल के समान वे काकलो के अव्यक्त मधुर स्वर में अलापती थीं। सुनने में विटों को प्रिय लगने वाले गाली भरे गीत गा रही थीं। सिर पर पुष्पमाला, कानों में पल्लव और माथे पर चन्दन-तिलक लगाये थीं। वलयों को खनकाती हुई अपनी भुजमताओं को इस प्रकार उठाती मानों सूर्य का आलिङ्गन कर रही हों। कुङ्कुम से मसले हुए अपने अङ्गों से काश्मीर की नबेलियों के समान मचल रही थीं। उनके नितम्ब पर कुरंटक पुष्प की मालायें लटक रही थीं। मानो राग की अग्नि से जल उठी हों। सिन्दूर
चतुर्थ उच्छ्वासः २१६ इवाप्रतिहतशासनस्य कंदर्पस्य, मुष्टिप्रकीर्यमाणकर्पूरपटवासपांसुला मनो- रथसंचरणरथ्या इव यौवनस्य, उद्दामकुसुमदामताडिततरुणजनाः प्रतीहा- र्य इव तरुणमहोत्सवस्य, प्रचलत्पत्रकुण्डला लसन्त्यो लता इव मदन- चन्दनद्रुमस्य, ललितपदहंसरवमुखराः समुल्लसन्त्यो वीचय इव शृङ्गार- रससागरस्य, वाच्यावाच्यविवेकशून्या बालक्रोडा इव सौभाग्यस्य, घनपटहरवोत्कण्टकितगात्रयष्टयः केतक्य इव कुसुमफूलिमुद्रिरन्त्यः, कमलिन्य इव दिवसमुत्फुल्लाननाः, कुमुदिन्य इव रात्रावनुपजातनिद्राः, आविष्टा इव नरेन्द्रवृन्दपरिवृताः, प्रीतय इव हृदयमपहरन्त्यः, गीतय इव रागमुरुदीपयन्त्यः, पुष्टय इवानन्दमुत्पादयन्त्यः, मदमपि मदयन्त्य इव, रागमपि रञ्जयन्त्य इव, आनन्दमपि आनन्दयन्त्य इव, नृत्यमपि नर्त- मुद्रा दीयन्ते ता अपि ससिन्दूराः । मनोरथेत्यादि । रथाश्च रथ्यासु संचरन्ति । ता अपि तद्वशात्पांसुला भवन्ति । उद्दामेति । प्रतीहार्यश्च । ता अप्येवंविधा भवन्ति । प्रचलन्ति नृत्तवशाद्दोलायमानानि पत्राणि विशेषकानि तथा कुण्डलानि यासाम्, अन्यत्र, - पत्राणि पल्लवाः । कुण्डलानि समूहाः । ललितेषु पदेषु हंसका नूपुराः । 'पादाङ्गदं तुलाकोटिर्मञ्जीरो नूपुरोऽस्त्रियाम् । हंसकः पादकटकः' इति । यद्वा, - ललितानि पदानि यासां ताश्च ता हंसरवमुखराश्च । ता ललितपदाश्च ते हंसा एव हंसकाश्चेति वा । बालक्रोडाश्च विवेकशून्याः । घनो निरन्तरः, मेघश्च । केत- क्योऽपि सकेतकरजस्काः । निद्रा स्वापः, संकोचश्च । आविष्टा भूतादिगृहीताः । नरेन्द्रो राजा, मन्त्री च । रागोऽभिष्वङ्गः, हिङ्गुलकादिश्च । मदमपि मदयन्त्य इवे- से उनके मुह की मुद्रा दमक रहा था, मानो अमोघ शासन वाले कामदेव के शासनपट्ट पर लगी हुई सिन्दूर की मुद्रा हो । साड़ियों पर कपूर की धूल की मूंठ छिड़कने से वे इस प्रकार धूल-धूल हो रही थीं मानों स्वेच्छा से विहार करने के लिये यौवन की गलियां हों। बड़ी बड़ी फूल मालाओं से नवयुवकों पर प्रहार कर रही थीं मानो युवकों के महोत्सव की रक्षा करने के लिए नियुक्त प्रतीहारियां हों। उनके पल्लवों के साथ कुण्डल हिलते हुए इस प्रकार शोभित हो रहे थे मानों वे मदनरूपी चन्दनवृक्ष की लताए हों। अच्छी और बुरी बात का विवेक बिल्कुल नहीं कर रही थीं, मानों सौभाग्य की बाल- क्रीड़ाएं हों। पटह की गम्भीर आवाज से उनके शरीर में रोमान्च भर आते थे मानों परागभरती हुई केतकी के फूल हों। दिन में खिली हुई कमलिनियों के समान और रात में विकसित कुमुदिनियों के समान लग रही थीं। भूतों से आविष्ट की भांति नरेन्द्रों अर्थात ओझैतों ( अथवा राजाओं) से घिरी थीं। प्रीति की तरह हृदय को हर ले रही थीं। गीति
२२० हर्षचरितम् यमाना इव, उत्सवमप्युत्सवयन्त्य इव, कटाक्षेक्षितेषु पिबन्त्य इवापाङ्ग- शुक्तिभिः, तर्जनेषु संशमयन्त्य इव नखमयूखपाशैः, कोपाभिनयेषु ताड- यन्त्य इव भ्रूलताविभागैः, प्रणयसंभाषणेषु वर्षन्त्य इव सर्वरसान्, चतुर- चङ्क्रमणेषु विकिरन्त्य इव विकारान्, पश्यविलासिन्यः प्रानृत्यन् । अन्यत्र वेत्रिवेत्रवित्रासितजनदत्तान्तरालाः, ध्रियमाणधवलातपत्रवना वनदेवता इव कल्पतरुतलविचारिण्यः, काश्चित्स्कन्धोभयपालीलम्बमान- लम्बोत्तरीयलग्नहस्ता लीलादोलाधिरूढा इव प्रेङ्खन्त्यः, काश्चित्कनककेयूर- कोटिविपाट्यमानपट्टांशुकोत्तरङ्गास्तरङ्गिण्य इव तरच्चक्रवाकसीमन्त्यमान- स्रोतसः, काश्चिदुद्धूयमानधवलचामरटालमत्रिकण्टकवलितविकटकटा- क्षाः, सरस्य इव हंसाकृष्यमाणनीलोत्पलवनाः, काश्चिश्चलचरणच्युतालक्त- स्यादि । मदेन हि सर्वो मत्तो भवति, मदस्तु ता आश्रित्य मत्तः । एवमुत्तरत्र । अन्यत्रेत्यादौ । राजमहिष्यो विलेसुरिति संबन्धः । ध्रियमाणधवलातपत्रवना इत्यादौ वाक्यार्थोपमा विचार्या । पाली पङ्क्तिः । कनककेयूरेणेति । कनकग्रहणेन चक्र- वाकसादृश्यमाह । तरङ्ग उत्तरीयम् । सीमन्त्यमानानि द्विधाक्रियमाणानि । त्रिक- की तरह राग ( स्वरलय, या स्नेह) को उदीप्त कर रहीं थीं। आनन्द उत्पन्न करने में स्फूर्ति के समान थीं। मानों मद को भी मतवाला बना रही थीं, राग को भी रंजित कर रही थीं, आनन्द को भी आनन्दित कर रही थीं, नृत्य को भी नचा रही थीं, उत्सव को भी उत्सव में लीन कर रही थीं। इस प्रकार कटाक्षों से देखती मानों अपाङ्ग की सीपीं से पान कर रही थीं। जब कोप का अभिनय करतीं तो लगता कि अपनी भौंहें चला- चलाकर ताड़न करती हैं। प्रणय की बातचीत में तो मानों सारे रसों को उड़ेल कर रख देतीं। नृत्य की चक्करदार मुद्राओं में मानों कामजनित विकारों को छींट रही थीं। दूसरी ओर राजमहिषियां भी नृत्य में कूद पड़ीं। दर्शनार्थी लोगों को द्वारपालों ने डण्डे से बाहर रोक रखा। तब इन्हें नाचने का अवकाश मिल गया। सिर पर लगे हुए धवल छत्र के साथ नाच रही थीं, मानों कल्पवृक्षों के नीचे विचरण करने वाली वनदेवता हों। कुछ के दोनों तरफ कन्धों से उत्तरीय के लम्बे छोर लटक रहे थे मानों हिंडोले पर बैठकर झूल रही हों। कुछ के अंशुक केयूर के नुकीले अग्रभाग में लगकर चर-से फट जाते और फहराने लगते थे, मानों नदियों के समान थीं जिनकी लहरें चक्रवाक पक्षी के तैरने से दो भागों में विभक्त हो जाती हैं। कानों के त्रिकंटक में डोलते हुए चंवर के बालों के फंस जाने से कुछ अपने कटाक्ष सिमट ले रही थीं, यह दृश्य ऐसा लगता मानों हंस तालाव के नीले कमलों को खींच रहे हों। कुछ अपने चञ्चल पैर में लगे हुए आलते से,
चतुर्थे उच्छ्वासः २२१
कारुणस्वेदशीकरसिच्यमानभवनहंसाः, संध्यारागरञ्जयमानेन्दुबिम्बा इव कौमुदीरजन्यः, काश्चित्कण्ठनिहितकाञ्चनकाञ्चीगुणान्वितकञ्चुकिविकारा- कुञ्चितभ्रुवः, कामवागुरा इव प्रसारितबाहूपाशा राजमहिष्यः प्रारब्ध- नृत्ता विलेसुः । सर्वतश्च नृत्यतः स्त्रैणस्य गलद्भिः पादालक्तकैररुणिता रागमयीव शुशोण क्षोणी । समुल्लसद्भिः स्तनमण्डलैर्मङ्गलकलशमय इव बभूव महोत्सवः । भुजलताविक्षेपैर्मृणालवलयमय इव रराज जीवलोकः । समु- ल्लसद्भिर्विलासस्मितैस्तडिन्मय इवाक्रियत कालः । चञ्चलानां चक्षुषामं- शुभिः कृष्णसारमया इवासन्वासराः । समुल्लसद्भिः शिरीषकुसुमस्तबक- कर्णपूरैः शुकपिच्छमय इव हरितच्छायोऽभूदातपः । विस्रंसमानैर्धम्मि- ल्लतमालपल्लवैः कज्जलमयमिवालक्ष्यतान्तरिक्षम् । उत्क्षिप्तैर्हस्ताग्रकिसलयैः ण्टकः कर्णाभरणभेदः । 'त्रिकण्टकस्तु त्र्यस्रः स्यात्त्रिभी रत्नैश्च भूषणम्' । कौमुदी कार्तिकज्योत्स्ना । तद्युक्ता रजन्यो रात्रयः । आकुञ्चित भ्रुकुटः । विलेसुश्चिक्रीडुः । स्त्रीणां समूहः स्त्रैणं तस्य । शुशोण शोणाभूत् । कालो होरादिलक्षणः, कालश्च कृष्णः । कथं तडिन्मयो रक्तवर्ण इति विरोधच्छाया । धम्मिल्लाः संयताः केशाः । जो देह से टपकते हुए पसीने की बूँदों को लाल कर रहा था, भवन के हंसों को रँग रहा थीं मानों सन्ध्या की लाली से नहाये हुए चन्द्र से युक्त कार्तिक की चांदनी भरी रातें हों । कुछ अपनी सोने की करधनी को बूढ़े कंचुकियों के गले में डालकर उनके विकृत भावों को भौंहें नचा-नचाकर निहार रही थीं। इस प्रकार कामदेव की युवक लोगों को बांधने वाली डोरी के समान अपने भुजपाशों को फैलाकर उन्होंने नाचना शुरू किया । चारों ओर नाचती हुई स्त्रियों के पैर के आलते से पृथिवी रागमयी की भांति लाल हो गयी । उनके उभरते हुए स्तनमण्डलों से महोत्सव में केवल मङ्गलकलश ही दिखाई पड़ते थे। सारा संसार उनकी भुजलताओं के विक्षेप से मानों मृणालों से भरा प्रतीत होने लगा । वह उनकी कौंधती हुई मुस्कानों से समय मानों बिजलियों से भर गया । चंचल आंखों की रश्मियों से मानों दिन मृगों से भरे प्रतीत होने लगे। शिरीष पुष्प के गुच्छों के कनफूल इतने समुल्लसित हो गए कि आतप की छाया ही प्रतीत हो गई और ऐसा लगा कि सुग्गे के हरे हरे पंख बिछ गए । बंधे हुए केशपाश में खोंसे गए तमालपल्लव इस प्रकार खुलकर चूने लगे मानों आकाश में काजल भरने लगा। ऊपर उत्क्षिप्त हाथों से सृष्टि कमलिनियों से भरी जैसी शोभित होने लगी। माणिक्य के बने इन्द्रायुधों की किरणों से सूर्य की रश्मियां चाषपक्षी के पंख के समान शोभित हुईं। गहनों की झनझनाहट की प्रतिध्वनि
२२२ हर्षचरितम् कमलिनीमय्य इव बभासिरे सृष्टयः । माणिक्येन्द्रायुधानांमर्चिषा चाषप- त्रमया इव चकाशिरे रविमरीचयः । रणतामाभरणगणानां प्रतिशब्दकैः किङ्किणीमय्य इव शिशिश्रिरे दिशः । जरत्योऽप्युन्मादिन्य इव रमण्यो रेणुः । वर्षीयांसोऽपि ग्रहगृहीता इव नापत्रेपिर । विद्वांसोऽपि मत्ता इवात्मानं विसस्मरुः । निनर्तिषया मुनीनामपि मनांसि विपुस्फुलुः । सर्वस्वं च ददौ नरपतिः । दिशि दिशि कुबेरकोषा इवालुप्यन्त लोकेन द्रविणराशयः । एवं च वृत्ते तस्मिन्महोत्सवे, शनैः शनैः पुनरप्यतिक्रामति काले, देवे चोत्तमाङ्गनिरहितरक्षासर्षपे, समुन्मिषत्प्रतापाग्नस्फुलिङ्ग इव गोरो- चनापिञ्जरितवपुषि, समभिव्यज्यमानसहजक्षात्रतेजसीव हाटकबद्धविक- टव्याघ्रनखपङ्क्तिमण्डितग्रीवके हृद्योद्भिद्यमानदर्पाङ्कुर इव, प्रथमाव्यक्त- जल्पितेन सत्यस्य शनैःशनैरौङ्कारमिव कुर्वाणे, मुग्धस्मितैः कुसुमौरव मधुकरकलानि बन्धुहृदयान्यकर्षति, जननीपयोधरकलशपयःसीकरसे- कादिव जायमानैर्विलासहसिताङ्कुरैर्दर्शनकैरलंक्रियमाणमुखकमलके चारित्र बभासिरेऽशोभन्त । माणिक्यमुत्कृष्टं रत्नम् । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः । शिशिश्रिरे सशब्दा अभवन् । रेणुः स्तनितवत्यः । वर्षीयांसो वृद्धतराः । अपत्रेपिरे लज्जामभ- जन्त । विपुस्फुलुश्चेरुः । एवं चेत्यादौ । देवी यशोमती राज्यश्रियमधत्तेति संबन्धः । हाटकं सुवर्णम् । इस प्रकार उठी मानों दिशाओं में किंकिणियां बजने लगीं । बूढ़ी स्त्रियां भी युवतियों के समान ठमकने लगीं । बड़े-बूढ़े भी इस प्रकार निर्लज्ज हो गए मानों उनपर कोई ग्रह सवार हो । पढ़े लिखे भी लोग मतवाले होकर अपने आपको भूल बैठे । नाचने की इच्छा से मुनियों के मन में भी खलबली मचने लगी । राजा ने अपना सब कुछ लुटा दिया । कुबेर के खजानों की भांति धनराशियों को लोगों ने लूट लिया । इस प्रकार वह महोत्सव समाप्त हुआ । धीरे धीरे फिर समय बीतने लगा । हर्ष भी बढ़ने लगा । उसके मस्तक पर रक्षा के लिये सरसों रखी जाती थी । गोरोचना की उबटन से उसकी देह पीली हो गयी थी, मानों फूटकर निकली हुई प्रतापाग्नि के कण छा गए हों। उसकी ग्रीवा में बाघ के नखों की पंक्ति सोने में जड़वाकर पहना दी गयी थी, मानों उसका स्वाभाविक क्षत्रिय तेज अभिव्यक्त हो रहा था । सत्ययुग का धीरे धीरे आरम्भ करता हुआ सा ओंकार के समान पहले पहल वह तुतलाती आवाज में बोलने लगा, मानों उसके हृदय में पनपते हुए दर्प का अंकुर हो । फूल जैसे भौरों को अपनी ओर खींच लेते
चतुर्थ उच्छ्वासः २२३ इवान्तःपुरस्त्रीकदम्बकेन पाल्यमाने, मन्त्र इव सचिवमण्डलेन रक्ष्य- माणे, वृत्त इव कुलपुत्रकलोकेनामुच्यमाने, यशसीवात्मवंशेन संवर्ध्य- माने, मृगपतिपोत इव रक्षिपुरुषशस्त्रपञ्जरमध्यगते, धात्रीकराङ्गुलिलग्ने पञ्चषाणि पदानि प्रयच्छति हर्षे, षष्ठं वर्षमवतरति च राज्यवर्धने देवी यशोमती गर्भणाधत्त नारायणमूर्तिरिव वसुधां देवीं राज्यश्रियम् । पूर्णेपु च प्रसवदिवसेषु दीर्घरक्तनालनेत्रामुत्पलिनीमित्र सरसी, हंस- मधुरस्वरां शरदमिव प्रावृट् , कुसुमसुकुमारावयवां वनराजिमिव मधुश्रीः, महाकनकावदातां वसुधारामिव द्यौः, प्रभावर्षिणीं रत्नजातिमिव वेला, सकलजननयनानन्दकारिणीं चन्द्रलेखामिव प्रतिपत् , सहस्रनेत्रदर्शन- योग्यां जयन्तीमिव शची, सर्वभूभृद्भ्यर्थितां गौरीमिव मेना प्रसूतवती ओंकारम् । ओमिति यावत् । पयोधरौ स्तनौ, पयोधराश्च मेघाः। पयः क्षीरम्, जलं च । पञ्च वा षड् वा पञ्चषाणि । पूर्णे०त्यादौ । देवी दुहितरं प्रसूतवतीति संबन्धः । रक्तनाले रक्ते एव नेत्रे यस्याः, रक्तानि नालानि नेत्राणि मूलानि च यस्याः । हंसवतैश्च मधुरः । अवयवा अङ्गानि, विभागाश्च । माधवो वसन्तः । महाकनकं तिलसुवर्णम् । वसुधारा धन- वृष्टिः । इयं च महाभ्युदयसूचनाय दिवा पतति । वेला जलविकृतिः । इन्द्राऽपि सहस्रनेत्रः । जयन्तः शक्रपुत्रः । भूभृतो राजानः, पर्वताश्च । मेना हिमवन्महिला । हैं वैसे ही वह अपनी मुसकान से बन्धुओं के मन हर लेता था । माता के स्तनकलश की दूधधार से सींचने से उत्पन्न विलासपूर्ण हँसी के अंकुर के समान उसक दांत मुखकमल को अलंकृत कर रहे थे । अन्तःपुर की स्त्रियां चारित्र्य की भांति उसका पालन करती थीं। सचिव लोग यन्त्र की भांति उसकी रक्षा में तत्पर रहते थे । कुलीन राजपुत्र सदाचार की भांति उसे कभी नहीं छोड़ते थे । यश की भांति वह अपने वंश के साथ बढ़ने लगा । शेर के बच्चे की भांति उसके चारों ओर शस्त्र लिये हुये रक्षि पुरुष तैनात रहने लगे । जब वह धाय की उंगली पकड़कर पांच छः कदम चलने लगा और जब राज्यवर्धन ने भी छठे वर्ष में पदार्पण किया तब देवी यशोमती ने राज्यश्री को गर्भ में उस प्रकार धारण किया जैसे नारायण की मूर्ति पृथिवी को धारण करती है । जब प्रसव के दिन पूरे हो गए तब रानी ने पुत्री को पैदा किया । सरसी से उत्पन्न कमलिनी की भाँति उसके बड़े और लाल नेत्र थे । प्रावृट् से उत्पन्न शरद् की भाँति हंसों जैसा उसका स्वर था । वसन्त की श्री से उत्पन्न वनराजि की भाँति उसके अंग फूल की भाँति कोमल थे । आकाश से होने वाली सुवर्णवृष्टि के समान वह सोने जैसे अवदात
२२४ हर्षचरितम् दुर्हितरम् । यया द्वयोः सुतयोरुपरि स्तनयोरिवैकावलीलतया नितराम- राजत जननी । अस्मिन्नेव तु काले देव्या यशोमत्या भ्राता सुतमष्टवर्षदेशीयमु- द्धूयमानकुटिलकाकपक्षकशिखण्डं खण्डपरशुहुंकारामिधूमलेखानुबद्ध- मूर्धानं मकरध्वजमिव पुनर्जातम् , एकेनेन्द्रनीलकुण्डलांशुश्यामलितेन शरीरार्धेनेतरेण च त्रिकण्टकमुक्ताफलालोकधवलितेन संपृक्तावतारमिव हरिहरयोर्दर्शयन्तम्, पीनप्रकोष्ठप्रतिष्ठितपुष्पलोहवलयं परशुराममिव क्षत्रक्षपणक्षीणपरशुपाशचिह्नितं बालताङ्गतम् , कण्ठसूत्रग्रथितभङ्गुरप्रवा- लाङ्कुरं हिरण्यकशिपुमिवोरःकाठिन्यखण्डितनरसिंहनखरखण्डम्, गृही- ययेत्यादौ । यया दुहित्रा । द्वयोः सुतयोरुपरि जातया यशोमती नितरामराज- तेति संबन्धः । अस्मिन्नित्यादौ । देव्या यशोमत्या भ्राता स्वतनयं भण्डिनामानं कुमारयोरनु- चरमर्पितवानिति संबन्धः । काकपक्षकशिखण्डा एव शिखण्डः पिच्छम् । पुष्पलोहं मणिभेदः । मृताग्निहोत्रं रथचक्रमिति केचित् । रणहतवीरकायशातनवशात्परशोः वर्ण की थी । जैसे समुद्र की वेला रत्नों को छिटका देती है वैसे ही वह अपनी कान्ति फैला रही थी । प्रतिपदा से उत्पन्न चन्द्रलेखा की भाँति वह सबके नयन आनन्दित करती थी । इन्द्राणी से उत्पन्न जयन्ती की भाँति वह सहस्र नेत्रों (अथवा सहस्र नेत्र इन्द्र) द्वारा देखने योग्य थीं । मेना से उत्पन्न पार्वती की भाँति समस्त भृभृत् (राजा या पर्वत) उसका लाड़-प्यार करते थे । जैसे दोनों स्तनों के ऊपर एकावली लता सुशोभित होती है उसी प्रकार रानी यशोमती दोनों पुत्रों के बाद उस पुत्री से अत्यन्त सुशोभित हुई। इसी समय यशोमती के भाई ने आठ वर्ष की उम्र वाले भण्डि नामक अपने पुत्र को राज्यवर्धन और हर्ष के संगी-साथी के रूप में रहने के लिए भेजा। उसकी शिखा मोर- पंख की भाँति लहरा रही थी, मानों शिवजी की क्रोधाग्नि की धूमलेखा को सिर से लिए हुए कामदेव फिर उत्पन्न हो गया हो। उसके शरीर का एक अर्धभाग इन्द्रनीलमणि के कुंडल की किरणों से श्याम वर्ण का हो रहा था और दूसरा भाग त्रिकंटक में पिरोई हुई मोतों की आभा से सफेद हो गया था, मानों विष्णु और शिव के सम्मिलित अवतार का दृश्य उपस्थित कर रहा हो । उसकी मोटी कलाई में पुखराज का कड़ा पड़ा था, मानों क्षत्रियों का विनाश करने में घिसे हुए परशु से चिह्नित भगवान् परशुराम ही बालक रूप में उत्पन्न हों । गले में सूत्र में बँधा हुआ मूंगे का टेढ़ा टुकड़ा सिंहनख की तरह लग रहा था मानों हिरण्यकशिपु जिसकी कड़ी छाती पर भगवान् नृसिंह के नख का खण्ड टूट कर
चतुर्थ उच्छ्वासः २२५ तजन्मान्तरम् शैशवेऽपि साबष्टम्भं बीजमिव वीर्यद्रुमस्य भण्डिनामानम- नुचरं कुमारयोरर्पितवान् । अवनिफ्तेस्तु तस्योपरि पुत्रयोस्तृतीयस्य नेत्रयोरिवेश्वरस्य तुल्यं दर्शनमासीत् । राजपुत्रावपि सकलजावलोकहृदयानन्ददायिनौ तेन प्रकृ- तिदक्षिणेन मधुमाधवाविव मलयमारुतेनोपेतौ नितरां रेजतुः । क्रमेण चापरेणेव भ्रात्रा प्रजानन्देन सह वर्धमानौ यौवनमवतेरतुः । स्थिरोरु- स्तम्भौ च पृथुप्रकोष्ठौ दीर्घभुजार्गलौ विकटोरःकवाटौ प्रांशुसालाभिरामौ महानगरसंनिवेशाइव सर्वलोकाश्रयक्षमौ बभूवतुः । अथ चन्द्रसूर्याविव स्फुरज्ज्योत्स्नायशःप्रतापाक्रान्तभुवनावभिरामदु- पाशावशेषता । भङ्गुरः कुटिलः । बीजमिवेति । शैशवाद्बीजावस्थोत्प्रेक्ष्यते, न तु द्रुमावस्था । अवनीत्यादौ । अवनिफ्तेस्तु तस्योपरि पुत्रयोस्तुल्यं दर्शनमालोकनमिति संबन्धः । अन्यत्र,-दर्शनं दृष्टिः । तृतीयस्येति च । ईश्वरस्येति साधारणम् । सकले- त्यादि साधारणम् । दक्षिणोऽनुकूलः, दाक्षिणात्यश्च । मधुमाधवौ चैत्रवैशाखौ । उरु- स्तम्भाविव उरवः महान्तश्च स्तम्भाः । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । स्थानविशेषो वा । कवाटो द्वारपट्टः । सालो वृक्षभेदः, प्राकारश्च । सर्वलोकेत्यादि साधारणम् । अथेत्यादौ । तौ सर्वस्यामेव पृथिव्यां प्रकाशतां जग्मतुरिति संबन्धः । स्फुर- ज्ज्योत्स्नाजालं यशस्तथा प्रतापोस्ताभ्याम्; अन्यत्र,-ज्योत्स्नायश इव भुवनाक्रमण- लग गया हो, फिर से उत्पन्न हो गया । इस शैशवकाल में भी वह तेजस्वी के सदृश लग रहा था । पराक्रम के वृक्ष का मानों वह बीज था । भण्डि के ऊपर राजा की दृष्टि दोनों पुत्रों के बीच शिवजी के तीसरे नेत्र के समान थी । समस्त जीवलोक को आनन्दित करने वाले दोनों राजपुत्र भी स्वभाव से दक्षिण (अनुकूल) उस भण्डि से अत्यन्त घुल-मिल गए, जैसे चैत्र और वैशाख दक्षिण की ओर से बहने वाले मलयानिल के साथ हो जाते हैं। क्रमशः दूसरे भाई के समान प्रजाओं के आनन्द के समान बढ़ते हुए यौवन को प्राप्त हुए । उनके स्तम्भ की भाँति स्थिर दो-दो ऊरु दण्ड, द्वार प्रकोष्ठ की भाँति सुगठित प्रकोष्ठ, अर्गलादण्ड की भाँति दीर्घ भुजाएँ, किवाड़ के पल्ले की भाँति चौड़ी छाती और प्राकार की भाँति ऊँचा आकार ऐसा लगता था मानों सारे संसार के आश्रय के योग्य किसी महानगर की रचना हुई हो । राज्यवर्धन और हर्ष दोनों का यश थोड़े ही समय में अन्य द्वीपों में भी फैल गया । चन्द्र की ज्योत्स्ना और सूर्य के प्रताप के समान उनके भी यश और प्रताप सारे संसार १५ ह० च०
२२६ : हर्षचरितम् निरीक्ष्यौ, अग्निमारुताविव समभिव्यक्ततेजोबलावेकीभूतौ, शिलाकठिन- कायबन्धौ हिमवद्विन्ध्याविवाचलौ, महावृषाविव कृतयुगयोग्यौ, अरुणग- रुडाविव हरिवाहनविभक्तशरीरौ, इन्द्रोपेन्द्राविव नागेन्द्रगतौ, कर्णार्जुना- विव कुण्डलकिरीटधरौ, पूर्वापरदिग्भागाविव सर्वतेजस्विनामुदयास्त- मयसंपादनसमर्थौ, अमान्ताविवातिमानेनासन्नवेलार्गलनिरोधसंकटे कुकु- टीरके, तेजःपराङ्मुखीं छायामपि जुगुप्समानौ, स्वात्मप्रतिबिम्बेनापि पादनखलग्नेन लजमानौ, शिरोरुहाणामपि भङ्गेन दुःखमवतिष्ठमानौ, समर्थत्वम् । प्रताप आयतिः, आतपश्च । तेजस्तैक्ष्ण्यम्, प्रकाशश्च । बलं सामर्थ्यम् । उभयत्राप्येकीभूतावन्योन्यानुवर्तिनौ, मिलितौ च । शिलावत्तादृशञ्च कठिनः । अच- लावकम्पौ, गिरी चाचलौ । कृतयुगमाद्ययुगभेदः, मूर्धन्यकाष्ठं च । योग्यावुचितौ, योग्या च शिक्षा । यद्वा, -कृतयुगे तत्र शकटादौ समर्थौ । हरयोऽश्वाः, सूर्यविष्णू च हरी । उक्तं च—'यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकेषु हरिर्ना कपिले त्रिषु ॥' इति । विभक्तं स्कन्धमध्यादिविभागेन स्थितम्, परिकल्पितं च नाग ऐरावणः, शेषश्च । नागेन्द्रवद्गतं ययोः, नागेन्द्रे वा गतावारूढौ । तेज- स्विनो वीराः, आदित्याश्च । उदयो वृद्धिः, आविर्भावश्च । अस्तमयो नाशः, तिरो- धानं च । अमान्ताविव वर्तमानौ । वेला जलनिधेः, जलमर्यादा । कुर्भूमिरेव कुटीरकं पर छा गए और दोनों (चन्द्र के समान) अभिराम एवं (सूर्य के समान) दुर्धर्ष हो गए। अग्नि और वायु के समान दोनों में तेज और बल बराबर अभिव्यक्त हुए और दोनों जैसे एक हो गए। हिमालय और विन्ध्याचल के समान दोनों अडिग हुए और उनके शरीर की गठन शिला जैसी कड़ी थी। दो महावृषभ के समान कृतयुग अर्थात् सतयुग के उचित (जुभाठ धारण करने योग्य) थे। अरुण और गरुड़ के समान दोनों अलग-अलग घोड़े की सवारी करते थे (अरुण पक्ष में-सूर्य के वाहन अर्थात् सारथि के रूप में, और गरुड पक्ष में-विष्णु के वाहन रूप में विभक्त शरीर वाले)। कर्ण और अर्जुन के समान कुण्डल और किरीट धारण करते थे। पूर्व और पश्चिम दिग्भाग के समान समस्त तेज- स्वियों (सूर्य और चन्द्र) का उदय और अस्त करने में समर्थ थे। उन्होंने अपना इतना विस्तार कर लिया कि पृथिवी की कुटिया के संकीर्ण स्थान में अँट नहीं पा रहे थे, जिसमें समुद्रतट की अर्गला लगा दी गई थी। तेज से अलग होकर रहने वाली छाया को भी वे हीन दृष्टि से देखते थे। अपने पैर के नखों में गिरकर लगे हुए अपने शरीर के प्रतिबिम्ब से भी वे लज्जा का अनुभव करते थे। सिर के बालों को काटने से भी उन्हें दुःख का अनु- भव होता । अपनी चूडामणि में प्रतिबिम्बित होते हुए अपने ही छत्र को दूसरा समझकर
चतुर्थ उच्छ्वासः २२७ चूडामणिसंक्रान्तेनापि द्वितीयेनातपत्रेणापत्रपमाणौ, भगवति षण्मुखेऽपि स्वामिशब्देनासुखायमानश्रवणौ, दपणदृष्टेनापि प्रतिपुरुषेण दूयमानन- यनौ, संध्याञ्जलिघटनेष्वपि शूलायमानोत्तमाङ्गौ, जलधरधृतेनापि धनुषा दोधूयमानहृदयौ, आलेख्यक्षितिपतिभिरप्यप्रणमद्भिः संतप्यमानचरणौ, परिमितमण्डलसंतुष्टं तेजः सवितुरप्यबहुमन्यमानौ, भूभृदपहृतलक्ष्मीकं सागरमप्युपहसन्तौ, बलवन्तमकृतविग्रहं मारुतमपि निन्दन्तौ, हिमव- तोऽपि चमरीवालव्यजनवीजितेन दह्यमानौ, जलधीनामपि शङ्खैः खिद्य- मानौ, चतुःसमुद्राधिपतिमपरं प्रचेतसमप्यसहमानौ, अनपहृतच्छत्रा- नपि विच्छायानवनिपालान्कुर्वाणौ, माधुष्वप्यसेवितप्रसन्नौ, मुखेन मधु जरद्हूम् । भङ्गः कुञ्चितत्वम्, युद्धे पलायनं च । अपत्रपमाणौ लज्जन्तौ । स्वामी कुमारः, प्रभुश्च । प्रतिपुरुषेनेति । स्पर्धायां प्रतिशब्दः । दोधूयमानं संतप्यमानम् । मण्डलं बिम्बम्, विषयश्च । तेजः प्रकाशः, तैक्ष्ण्यं च । भूभृदत्र प्रकरणान्मन्दरः, राजानश्च भूभृतः । लक्ष्मीः समृद्धिरपि । विग्रहं वैरम्, देहश्च । अनपहतेत्यादि वर्ण्यमानवयोवस्थाभिप्रायेणोक्तम् । छाया कान्तिः, आतपप्रतिपक्षजातिश्च । सति छत्रे विच्छायत्वं न भवतीति विरोधः । माध्विति । साधूनां सेवान्यतिरेकेण प्रसादायो ग्यत्वम् । प्रसन्नौ प्रसादवन्तौ, सुरापि प्रसन्ना । मधु माधुर्यम्, मद्यं च । असेवितप्रसन्नश्च कथं मुखेन मधु क्षरतीति विरोधः । ऊष्मा स्मयः, तापश्च । लज्जित होते थे । भगवान् कार्तिकेय के लिए भी स्वामी शब्द का व्यवहार करना उनके कानों को सुखकर नहीं लगता । दर्पण में अपने ही प्रतिबिम्ब को किसी दूसरे प्रतिस्पर्धी का समझकर उनकी आँखों को कष्ट होता । संध्या को प्रणाम करने के लिए हाथ जोड़ते ही उनके सिर में पीड़ा होने लगती । उनके सामने मेघ भी जब धनुष धारण करता तो उनके हृदय में कँपकँपी होने लगती । सिर नहीं झुकाते हुए चित्रलिखित राजाओं को देखकर उनके पैर मारे क्रोध के थरथराने लगते । सूर्य के मण्डल में घिरे हुए तेज को भी वे बहुत नहीं मानते थे । हरी हुई लक्ष्मी वाले समुद्र की भी वे हँसी उड़ाते थे । बलवान् होकर भी युद्ध नहीं करने वाले (अथवा शरीर से रहित) वायु की भी वे निन्दा करते थे । हिमालय को भी चमरी के बालों से झले जाते देखकर वे भीतर-भीतर जलते थे । समुद्रों के भी शंखों (शंख संज्ञक निधियों) को देखकर खिन्न होते थे । चारों समुद्रों पर आधिपत्य करने से दूसरे वरुण को भी सह नहीं पाते थे । छत्र छीन कर भी राजाओं को छायारहित (कान्तिहीन) कर देते थे । सज्जनों पर सेवा के बिना ही प्रसन्न रहते (अथवा प्रसन्ना अर्थात् मदिरा के न सेवन करने पर भी) और मुख से उनके प्रति मीठी बात बोलते (अथवा मधु अर्थात् मदिरा को मुँह से उगलते) । दुष्ट राजाओं के वंश को अपनी गर्मी
२२८ हर्षचरितम् क्षरन्तौ, दुष्टराजवंशानूष्मणा दूरस्थितानपि म्लानिमानयन्तौ, अनुदिवसं शस्त्राभ्यासश्यामिकाकलङ्कितमशेषराजप्रतापाग्निनिर्वपणमलिनमिव कर- तलमुद्वहन्तौ, योग्याकालेषु धीरैर्धनुर्ध्वनिभिरभ्यर्णोपभोगाद्दिग्वधूभिरिवा- लपन्तौ राज्यवर्धन इति हर्ष इति सर्वस्यामेव पृथिव्यामाविर्भूतशब्दप्रा- दुर्भावौ, स्वल्पीयसैव कालेन द्वीपान्तरेष्वपि प्रकाशतां जग्मतुः । एकदा च तावाहूय भुक्तवानभ्यन्तरगतः पिता सस्नेहमवादीत्— ‘वत्सौ ! प्रथमं राज्याङ्गं, दुर्लभाः सद्भूत्याः । प्रायेण परमाणव इव समवायेष्वनुगुणीभूय द्रव्यं कुर्वन्ति पार्थिवं क्षुद्राः । क्रीडारसेन नर्तयन्तौ मयूरतां नयन्ति बालिशाः । दर्पणमिवानुपविश्यात्मीयां प्रकृतिं संक्राम- ऊष्मणा च दाहशक्त्या । वंशा वेणवः । निकटस्थो म्लानीक्रियते न तु दूरस्थ इति विरोधः । निर्वपणं शमनम् । योग्या अभ्यासः । अभ्यर्णः प्रत्यासन्नः शब्दः । प्रादुर्भावः ख्यातिः । प्रथमं प्रधानभूतम् । प्रायेणेति । क्षुद्राः प्रायेण समवायेषु मन्त्रेष्वनुगुणीभूय यथा क्षुद्रा अल्पपरिमाणाः परमाणवः पार्थिवं पृथिव्यादिजातीयं घटादिद्रव्यं कुर्वन्ति । कथं समवायेष्वनुगुणीभूयायुतसिद्धानामाधाराधेयभूतानामिह प्रत्ययहेतुः। संयोगः समवायः । यथा तन्तुषु पट इति । कार्यस्य द्रव्यस्यावयविन आरम्भं प्रतियोगीभावोऽनुगुणत्वम् । मयूरो धूर्तजनयोग्यो हासो वा, शिखण्डी च । बालिशा धूर्ताः, कुमाराश्च । बालका हि क्रीडारसेन मयूरं नर्तयन्ते । अनुप्रविश्य से दूर से ही म्लान कर देते थे। प्रतिदिन शस्त्र के अभ्यास करने से दाग पड़े हुए और समस्त राजाओं को प्रतापाग्नि को बुझाने से मलिन अपने दोनों करतलों को धारण करते थे । अभ्यास-काल में धनुष की गम्भीर टंकार से मानों निकट में उपभोग की भावना से दिगङ्गनाओं के साथ बातचीत करते थे । राज्यवर्धन और हर्ष इन दोनों शब्दों का प्रादुर्भाव सारी पृथिवी में हो गया । एक समय भोजन करने के बाद दोनों पुत्रों को पिता ने बुलाकर स्नेह के साथ कहा—'बच्चे, अच्छे सचिव ही राज्य के प्रधान अङ्ग होते हैं । 'जैसे छोटे-छोटे परमाणु समवाय सम्बन्ध से एकत्र होकर पार्थिव द्रव्य को उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार क्षुद्र प्रकृति के लोग खुशामद की बात करके राजा को साधारण जन बना देते हैं । धूर्त लोग विविध क्रीड़ाओं के आनन्द में उसे फँसाकर मयूर के समान उसे नचाने लगते हैं । चट्टे-बट्टे लोग दर्पण के समान उसमें प्रवेश करके अपनी प्रकृति को उसमें संक्रान्त कर देते हैं । ठग विद्या में निपुण लोग झूठ-मूठ की बातों को दिखाकर उसकी बुद्धि को खराब कर
चतुर्थ उच्छ्वासः २२६ यन्ति पल्लविकाः । स्वप्ना इव मिथ्यादर्शनैरसद्बुद्धिं जनयन्ति विप्रल- म्भकाः । गीतनृत्यहसितैरुन्मत्ततामावहन्त्यपेक्षिता विकारा इव वातिकाः । चातका इव तृष्णावन्तो न शक्यन्ते ग्रहीतुमकुलीनाः । मानसे मीनमिव स्फुरन्तमेवाभिप्रायं गृह्णन्ति जालिकाः । यमपट्टिका इवाम्बरे चित्रमालि- खन्त्युद्गीतकाः । शल्यं हृदये निक्षिपन्त्यतिमार्गणाः । यतः सर्वैरेभिर्दोषा- भिषङ्गैरसंगतौ बहुधोपधाभिः परीक्षितौ शुची विनीतौ विक्रान्तावभिरूपौ मालवराजपुत्रौ भ्रातरौ भुजाविव मे शरीराद्व्यतिरिक्तं कुमारगुप्तमाधव- चित्तरञ्जनां कृत्वा, आसाद्य च प्रकृतिं स्वभावम्, शरीरं च । पल्लविका विटाः, किसलयानि च । मिथ्यादर्शनैरसदागमैः, अलीकवस्तुप्रकाशनैश्च । असतीमशोभनां बुद्धिम्, असत्यविद्यमाने च बुद्धिः । विप्रलम्भकाः प्रतारकाः । वातिका धूर्ताः, वातोत्थिताश्च । तृष्णा धनगर्धा, पिपासा च । ग्रहीतुमावर्जयितुम्, अवलब्धुं च । अकुलीना अकुलोद्गताः । को भूमौ न निलीनाश्चाकाशचारित्वात् । मानसे चित्ते, सरोभेदे च । स्फुरन्तमुत्पद्यमानम् । अनुत्पन्नाभिभवमिति यावत् । सति कार्ये हि सर्व एवाभिप्रायं लक्षयति । एतेऽत्र प्रागेव । अन्यत्र, -च चलन्तम् । जालिकाः कौसृतिकाः, कैवर्ताश्च । यमपट्टिका गृहीतपट्टलिखितसपरिवारधर्मराजाः । अम्बर आकाशे, वस्त्रे चाम्बरे । चित्रमालिखन्तीति । असंभाव्यमानानर्थानारभन्त इति यावत् । अन्यत्र,-चित्रमालेख्यम् । उद्गीतका उच्चतरत्वादुच्चैर्गीतं येषां ते च । शल्यमिव शल्यं पीडा, फलिका च । अतिमार्गणा अतिक्रम्य ये संश्रयन्ते, अन्यथा महाभागिनोऽस्य वक्तुरनुचितेयमुक्तिः स्यात् । तेनानुरूपसंभवमविच्छिन्नं च । मार्गणमतिमार्गणम्, मार्गणाः शराश्च । हृदये शल्यं फलिकामर्पयन्ति । अभिषङ्गः संपर्कः । उपधा भृत्यस्य धर्मादिविषयः परीक्षणोपायः । उक्तं च—'उपेत्याधीयते यस्मादुपधेति ततः स्मृता । उपाय उपधा ज्ञेया तया भृत्यान्परीक्षयेत् ॥' इति । विक्रान्तौ शूरौ । अभिरूपौ सुन्दरौ । डालते हैं । अपेक्षित होने पर वायुजन्य व्याधि के समान ये धूर्त नाच, गाना और हँसी-मजाक से पागल बना देते हैं । चातकों के समान धन के प्यासे ये ऐरे-गैरे लोग साथ नहीं देते । ये चालबाज लोग मानस में मत्स्य के ससान ऊपर की ओर उचकते ही अभिप्राय पकड़ लेते हैं । यमदूतों के समान ये उचकें लोग आकाश में चित्रकारी करते हैं अर्थात् बिना किसी सम्भावना के एकाएक अनिष्ट कर बैठते हैं । बाणों के समान छिद्रान्वेषी प्रकृति के ये लोग हृदय में पीड़ा उत्पन्न करते हैं। इसलिए इन सब दोषों के लगाव से सर्वथा दूर रहने वाले, बहुत प्रकार के उपायों से परीक्षित, पवित्र, विनम्र,