हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ हर्षचरितम् दुर्हितरम् । यया द्वयोः सुतयोरुपरि स्तनयोरिवैकावलीलतया नितराम- राजत जननी । अस्मिन्नेव तु काले देव्या यशोमत्या भ्राता सुतमष्टवर्षदेशीयमु- द्धूयमानकुटिलकाकपक्षकशिखण्डं खण्डपरशुहुंकारामिधूमलेखानुबद्ध- मूर्धानं मकरध्वजमिव पुनर्जातम् , एकेनेन्द्रनीलकुण्डलांशुश्यामलितेन शरीरार्धेनेतरेण च त्रिकण्टकमुक्ताफलालोकधवलितेन संपृक्तावतारमिव हरिहरयोर्दर्शयन्तम्, पीनप्रकोष्ठप्रतिष्ठितपुष्पलोहवलयं परशुराममिव क्षत्रक्षपणक्षीणपरशुपाशचिह्नितं बालताङ्गतम् , कण्ठसूत्रग्रथितभङ्गुरप्रवा- लाङ्कुरं हिरण्यकशिपुमिवोरःकाठिन्यखण्डितनरसिंहनखरखण्डम्, गृही- ययेत्यादौ । यया दुहित्रा । द्वयोः सुतयोरुपरि जातया यशोमती नितरामराज- तेति संबन्धः । अस्मिन्नित्यादौ । देव्या यशोमत्या भ्राता स्वतनयं भण्डिनामानं कुमारयोरनु- चरमर्पितवानिति संबन्धः । काकपक्षकशिखण्डा एव शिखण्डः पिच्छम् । पुष्पलोहं मणिभेदः । मृताग्निहोत्रं रथचक्रमिति केचित् । रणहतवीरकायशातनवशात्परशोः वर्ण की थी । जैसे समुद्र की वेला रत्नों को छिटका देती है वैसे ही वह अपनी कान्ति फैला रही थी । प्रतिपदा से उत्पन्न चन्द्रलेखा की भाँति वह सबके नयन आनन्दित करती थी । इन्द्राणी से उत्पन्न जयन्ती की भाँति वह सहस्र नेत्रों (अथवा सहस्र नेत्र इन्द्र) द्वारा देखने योग्य थीं । मेना से उत्पन्न पार्वती की भाँति समस्त भृभृत् (राजा या पर्वत) उसका लाड़-प्यार करते थे । जैसे दोनों स्तनों के ऊपर एकावली लता सुशोभित होती है उसी प्रकार रानी यशोमती दोनों पुत्रों के बाद उस पुत्री से अत्यन्त सुशोभित हुई। इसी समय यशोमती के भाई ने आठ वर्ष की उम्र वाले भण्डि नामक अपने पुत्र को राज्यवर्धन और हर्ष के संगी-साथी के रूप में रहने के लिए भेजा। उसकी शिखा मोर- पंख की भाँति लहरा रही थी, मानों शिवजी की क्रोधाग्नि की धूमलेखा को सिर से लिए हुए कामदेव फिर उत्पन्न हो गया हो। उसके शरीर का एक अर्धभाग इन्द्रनीलमणि के कुंडल की किरणों से श्याम वर्ण का हो रहा था और दूसरा भाग त्रिकंटक में पिरोई हुई मोतों की आभा से सफेद हो गया था, मानों विष्णु और शिव के सम्मिलित अवतार का दृश्य उपस्थित कर रहा हो । उसकी मोटी कलाई में पुखराज का कड़ा पड़ा था, मानों क्षत्रियों का विनाश करने में घिसे हुए परशु से चिह्नित भगवान् परशुराम ही बालक रूप में उत्पन्न हों । गले में सूत्र में बँधा हुआ मूंगे का टेढ़ा टुकड़ा सिंहनख की तरह लग रहा था मानों हिरण्यकशिपु जिसकी कड़ी छाती पर भगवान् नृसिंह के नख का खण्ड टूट कर