भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

चतुर्थ उच्छ्वासः २२३ इवान्तःपुरस्त्रीकदम्बकेन पाल्यमाने, मन्त्र इव सचिवमण्डलेन रक्ष्य- माणे, वृत्त इव कुलपुत्रकलोकेनामुच्यमाने, यशसीवात्मवंशेन संवर्ध्य- माने, मृगपतिपोत इव रक्षिपुरुषशस्त्रपञ्जरमध्यगते, धात्रीकराङ्गुलिलग्ने पञ्चषाणि पदानि प्रयच्छति हर्षे, षष्ठं वर्षमवतरति च राज्यवर्धने देवी यशोमती गर्भणाधत्त नारायणमूर्तिरिव वसुधां देवीं राज्यश्रियम् । पूर्णेपु च प्रसवदिवसेषु दीर्घरक्तनालनेत्रामुत्पलिनीमित्र सरसी, हंस- मधुरस्वरां शरद‌मिव प्रावृट् , कुसुमसुकुमारावयवां वनराजिमिव मधुश्रीः, महाकनकावदातां वसुधारामिव द्यौः, प्रभावर्षिणीं रत्नजातिमिव वेला, सकलजननयनानन्दकारिणीं चन्द्रलेखामिव प्रतिपत् , सहस्रनेत्रदर्शन- योग्यां जयन्तीमिव शची, सर्वभूभृद्भ्यर्थितां गौरीमिव मेना प्रसूतवती ओंकारम् । ओमिति यावत् । पयोधरौ स्तनौ, पयोधराश्च मेघाः। पयः क्षीरम्, जलं च । पञ्च वा षड् वा पञ्चषाणि । पूर्णे०त्यादौ । देवी दुहितरं प्रसूतवतीति संबन्धः । रक्तनाले रक्ते एव नेत्रे यस्याः, रक्तानि नालानि नेत्राणि मूलानि च यस्याः । हंसवतैश्च मधुरः । अवयवा अङ्गानि, विभागाश्च । माधवो वसन्तः । महाकनकं तिलसुवर्णम् । वसुधारा धन- वृष्टिः । इयं च महाभ्युदयसूचनाय दिवा पतति । वेला जलविकृतिः । इन्द्राऽपि सहस्रनेत्रः । जयन्तः शक्रपुत्रः । भूभृतो राजानः, पर्वताश्च । मेना हिमवन्महिला । हैं वैसे ही वह अपनी मुसकान से बन्धुओं के मन हर लेता था । माता के स्तनकलश की दूधधार से सींचने से उत्पन्न विलासपूर्ण हँसी के अंकुर के समान उसक दांत मुखकमल को अलंकृत कर रहे थे । अन्तःपुर की स्त्रियां चारित्र्य की भांति उसका पालन करती थीं। सचिव लोग यन्त्र की भांति उसकी रक्षा में तत्पर रहते थे । कुलीन राजपुत्र सदाचार की भांति उसे कभी नहीं छोड़ते थे । यश की भांति वह अपने वंश के साथ बढ़ने लगा । शेर के बच्चे की भांति उसके चारों ओर शस्त्र लिये हुये रक्षि पुरुष तैनात रहने लगे । जब वह धाय की उंगली पकड़कर पांच छः कदम चलने लगा और जब राज्यवर्धन ने भी छठे वर्ष में पदार्पण किया तब देवी यशोमती ने राज्यश्री को गर्भ में उस प्रकार धारण किया जैसे नारायण की मूर्ति पृथिवी को धारण करती है । जब प्रसव के दिन पूरे हो गए तब रानी ने पुत्री को पैदा किया । सरसी से उत्पन्न कमलिनी की भाँति उसके बड़े और लाल नेत्र थे । प्रावृट् से उत्पन्न शरद् की भाँति हंसों जैसा उसका स्वर था । वसन्त की श्री से उत्पन्न वनराजि की भाँति उसके अंग फूल की भाँति कोमल थे । आकाश से होने वाली सुवर्णवृष्टि के समान वह सोने जैसे अवदात