हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ हर्षचरितम् कमलिनीमय्य इव बभासिरे सृष्टयः । माणिक्येन्द्रायुधानांमर्चिषा चाषप- त्रमया इव चकाशिरे रविमरीचयः । रणतामाभरणगणानां प्रतिशब्दकैः किङ्किणीमय्य इव शिशिश्रिरे दिशः । जरत्योऽप्युन्मादिन्य इव रमण्यो रेणुः । वर्षीयांसोऽपि ग्रहगृहीता इव नापत्रेपिर । विद्वांसोऽपि मत्ता इवात्मानं विसस्मरुः । निनर्तिषया मुनीनामपि मनांसि विपुस्फुलुः । सर्वस्वं च ददौ नरपतिः । दिशि दिशि कुबेरकोषा इवालुप्यन्त लोकेन द्रविणराशयः । एवं च वृत्ते तस्मिन्महोत्सवे, शनैः शनैः पुनरप्यतिक्रामति काले, देवे चोत्तमाङ्गनिरहितरक्षासर्षपे, समुन्मिषत्प्रतापाग्नस्फुलिङ्ग इव गोरो- चनापिञ्जरितवपुषि, समभिव्यज्यमानसहजक्षात्रतेजसीव हाटकबद्धविक- टव्याघ्रनखपङ्क्तिमण्डितग्रीवके हृद्योद्भिद्यमानदर्पाङ्कुर इव, प्रथमाव्यक्त- जल्पितेन सत्यस्य शनैःशनैरौङ्कारमिव कुर्वाणे, मुग्धस्मितैः कुसुमौरव मधुकरकलानि बन्धुहृदयान्यकर्षति, जननीपयोधरकलशपयःसीकरसे- कादिव जायमानैर्विलासहसिताङ्कुरैर्दर्शनकैरलंक्रियमाणमुखकमलके चारित्र बभासिरेऽशोभन्त । माणिक्यमुत्कृष्टं रत्नम् । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः । शिशिश्रिरे सशब्दा अभवन् । रेणुः स्तनितवत्यः । वर्षीयांसो वृद्धतराः । अपत्रेपिरे लज्जामभ- जन्त । विपुस्फुलुश्चेरुः । एवं चेत्यादौ । देवी यशोमती राज्यश्रियमधत्तेति संबन्धः । हाटकं सुवर्णम् । इस प्रकार उठी मानों दिशाओं में किंकिणियां बजने लगीं । बूढ़ी स्त्रियां भी युवतियों के समान ठमकने लगीं । बड़े-बूढ़े भी इस प्रकार निर्लज्ज हो गए मानों उनपर कोई ग्रह सवार हो । पढ़े लिखे भी लोग मतवाले होकर अपने आपको भूल बैठे । नाचने की इच्छा से मुनियों के मन में भी खलबली मचने लगी । राजा ने अपना सब कुछ लुटा दिया । कुबेर के खजानों की भांति धनराशियों को लोगों ने लूट लिया । इस प्रकार वह महोत्सव समाप्त हुआ । धीरे धीरे फिर समय बीतने लगा । हर्ष भी बढ़ने लगा । उसके मस्तक पर रक्षा के लिये सरसों रखी जाती थी । गोरोचना की उबटन से उसकी देह पीली हो गयी थी, मानों फूटकर निकली हुई प्रतापाग्नि के कण छा गए हों। उसकी ग्रीवा में बाघ के नखों की पंक्ति सोने में जड़वाकर पहना दी गयी थी, मानों उसका स्वाभाविक क्षत्रिय तेज अभिव्यक्त हो रहा था । सत्ययुग का धीरे धीरे आरम्भ करता हुआ सा ओंकार के समान पहले पहल वह तुतलाती आवाज में बोलने लगा, मानों उसके हृदय में पनपते हुए दर्प का अंकुर हो । फूल जैसे भौरों को अपनी ओर खींच लेते