हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थे उच्छ्वासः २२१
कारुणस्वेदशीकरसिच्यमानभवनहंसाः, संध्यारागरञ्जयमानेन्दुबिम्बा इव कौमुदीरजन्यः, काश्चित्कण्ठनिहितकाञ्चनकाञ्चीगुणान्वितकञ्चुकिविकारा- कुञ्चितभ्रुवः, कामवागुरा इव प्रसारितबाहूपाशा राजमहिष्यः प्रारब्ध- नृत्ता विलेसुः । सर्वतश्च नृत्यतः स्त्रैणस्य गलद्भिः पादालक्तकैररुणिता रागमयीव शुशोण क्षोणी । समुल्लसद्भिः स्तनमण्डलैर्मङ्गलकलशमय इव बभूव महोत्सवः । भुजलताविक्षेपैर्मृणालवलयमय इव रराज जीवलोकः । समु- ल्लसद्भिर्विलासस्मितैस्तडिन्मय इवाक्रियत कालः । चञ्चलानां चक्षुषामं- शुभिः कृष्णसारमया इवासन्वासराः । समुल्लसद्भिः शिरीषकुसुमस्तबक- कर्णपूरैः शुकपिच्छमय इव हरितच्छायोऽभूदातपः । विस्रंसमानैर्धम्मि- ल्लतमालपल्लवैः कज्जलमयमिवालक्ष्यतान्तरिक्षम् । उत्क्षिप्तैर्हस्ताग्रकिसलयैः ण्टकः कर्णाभरणभेदः । 'त्रिकण्टकस्तु त्र्यस्रः स्यात्त्रिभी रत्नैश्च भूषणम्' । कौमुदी कार्तिकज्योत्स्ना । तद्युक्ता रजन्यो रात्रयः । आकुञ्चित भ्रुकुटः । विलेसुश्चिक्रीडुः । स्त्रीणां समूहः स्त्रैणं तस्य । शुशोण शोणाभूत् । कालो होरादिलक्षणः, कालश्च कृष्णः । कथं तडिन्मयो रक्तवर्ण इति विरोधच्छाया । धम्मिल्लाः संयताः केशाः । जो देह से टपकते हुए पसीने की बूँदों को लाल कर रहा था, भवन के हंसों को रँग रहा थीं मानों सन्ध्या की लाली से नहाये हुए चन्द्र से युक्त कार्तिक की चांदनी भरी रातें हों । कुछ अपनी सोने की करधनी को बूढ़े कंचुकियों के गले में डालकर उनके विकृत भावों को भौंहें नचा-नचाकर निहार रही थीं। इस प्रकार कामदेव की युवक लोगों को बांधने वाली डोरी के समान अपने भुजपाशों को फैलाकर उन्होंने नाचना शुरू किया । चारों ओर नाचती हुई स्त्रियों के पैर के आलते से पृथिवी रागमयी की भांति लाल हो गयी । उनके उभरते हुए स्तनमण्डलों से महोत्सव में केवल मङ्गलकलश ही दिखाई पड़ते थे। सारा संसार उनकी भुजलताओं के विक्षेप से मानों मृणालों से भरा प्रतीत होने लगा । वह उनकी कौंधती हुई मुस्कानों से समय मानों बिजलियों से भर गया । चंचल आंखों की रश्मियों से मानों दिन मृगों से भरे प्रतीत होने लगे। शिरीष पुष्प के गुच्छों के कनफूल इतने समुल्लसित हो गए कि आतप की छाया ही प्रतीत हो गई और ऐसा लगा कि सुग्गे के हरे हरे पंख बिछ गए । बंधे हुए केशपाश में खोंसे गए तमालपल्लव इस प्रकार खुलकर चूने लगे मानों आकाश में काजल भरने लगा। ऊपर उत्क्षिप्त हाथों से सृष्टि कमलिनियों से भरी जैसी शोभित होने लगी। माणिक्य के बने इन्द्रायुधों की किरणों से सूर्य की रश्मियां चाषपक्षी के पंख के समान शोभित हुईं। गहनों की झनझनाहट की प्रतिध्वनि