हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० हर्षचरितम् यमाना इव, उत्सवमप्युत्सवयन्त्य इव, कटाक्षेक्षितेषु पिबन्त्य इवापाङ्ग- शुक्तिभिः, तर्जनेषु संशमयन्त्य इव नखमयूखपाशैः, कोपाभिनयेषु ताड- यन्त्य इव भ्रूलताविभागैः, प्रणयसंभाषणेषु वर्षन्त्य इव सर्वरसान्, चतुर- चङ्क्रमणेषु विकिरन्त्य इव विकारान्, पश्यविलासिन्यः प्रानृत्यन् । अन्यत्र वेत्रिवेत्रवित्रासितजनदत्तान्तरालाः, ध्रियमाणधवलातपत्रवना वनदेवता इव कल्पतरुतलविचारिण्यः, काश्चित्स्कन्धोभयपालीलम्बमान- लम्बोत्तरीयलग्नहस्ता लीलादोलाधिरूढा इव प्रेङ्खन्त्यः, काश्चित्कनककेयूर- कोटिविपाट्यमानपट्टांशुकोत्तरङ्गास्तरङ्गिण्य इव तरच्चक्रवाकसीमन्त्यमान- स्रोतसः, काश्चिदुद्धूयमानधवलचामरटालमत्रिकण्टकवलितविकटकटा- क्षाः, सरस्य इव हंसाकृष्यमाणनीलोत्पलवनाः, काश्चिश्चलचरणच्युतालक्त- स्यादि । मदेन हि सर्वो मत्तो भवति, मदस्तु ता आश्रित्य मत्तः । एवमुत्तरत्र । अन्यत्रेत्यादौ । राजमहिष्यो विलेसुरिति संबन्धः । ध्रियमाणधवलातपत्रवना इत्यादौ वाक्यार्थोपमा विचार्या । पाली पङ्क्तिः । कनककेयूरेणेति । कनकग्रहणेन चक्र- वाकसादृश्यमाह । तरङ्ग उत्तरीयम् । सीमन्त्यमानानि द्विधाक्रियमाणानि । त्रिक- की तरह राग ( स्वरलय, या स्नेह) को उदीप्त कर रहीं थीं। आनन्द उत्पन्न करने में स्फूर्ति के समान थीं। मानों मद को भी मतवाला बना रही थीं, राग को भी रंजित कर रही थीं, आनन्द को भी आनन्दित कर रही थीं, नृत्य को भी नचा रही थीं, उत्सव को भी उत्सव में लीन कर रही थीं। इस प्रकार कटाक्षों से देखती मानों अपाङ्ग की सीपीं से पान कर रही थीं। जब कोप का अभिनय करतीं तो लगता कि अपनी भौंहें चला- चलाकर ताड़न करती हैं। प्रणय की बातचीत में तो मानों सारे रसों को उड़ेल कर रख देतीं। नृत्य की चक्करदार मुद्राओं में मानों कामजनित विकारों को छींट रही थीं। दूसरी ओर राजमहिषियां भी नृत्य में कूद पड़ीं। दर्शनार्थी लोगों को द्वारपालों ने डण्डे से बाहर रोक रखा। तब इन्हें नाचने का अवकाश मिल गया। सिर पर लगे हुए धवल छत्र के साथ नाच रही थीं, मानों कल्पवृक्षों के नीचे विचरण करने वाली वनदेवता हों। कुछ के दोनों तरफ कन्धों से उत्तरीय के लम्बे छोर लटक रहे थे मानों हिंडोले पर बैठकर झूल रही हों। कुछ के अंशुक केयूर के नुकीले अग्रभाग में लगकर चर-से फट जाते और फहराने लगते थे, मानों नदियों के समान थीं जिनकी लहरें चक्रवाक पक्षी के तैरने से दो भागों में विभक्त हो जाती हैं। कानों के त्रिकंटक में डोलते हुए चंवर के बालों के फंस जाने से कुछ अपने कटाक्ष सिमट ले रही थीं, यह दृश्य ऐसा लगता मानों हंस तालाव के नीले कमलों को खींच रहे हों। कुछ अपने चञ्चल पैर में लगे हुए आलते से,