भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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चतुर्थ उच्छ्वासः २१६ इवाप्रतिहतशासनस्य कंदर्पस्य, मुष्टिप्रकीर्यमाणकर्पूरपटवासपांसुला मनो- रथसंचरणरथ्या इव यौवनस्य, उद्दामकुसुमदामताडिततरुणजनाः प्रतीहा- र्य इव तरुणमहोत्सवस्य, प्रचलत्पत्रकुण्डला लसन्त्यो लता इव मदन- चन्दनद्रुमस्य, ललितपदहंसरवमुखराः समुल्लसन्त्यो वीचय इव शृङ्गार- रससागरस्य, वाच्यावाच्यविवेकशून्या बालक्रोडा इव सौभाग्यस्य, घनपटहरवोत्कण्टकितगात्रयष्टयः केतक्य इव कुसुमफूलिमुद्रिरन्त्यः, कमलिन्य इव दिवसमुत्फुल्लाननाः, कुमुदिन्य इव रात्रावनुपजातनिद्राः, आविष्टा इव नरेन्द्रवृन्दपरिवृताः, प्रीतय इव हृदयमपहरन्त्यः, गीतय इव रागमुरुदीपयन्त्यः, पुष्टय इवानन्दमुत्पादयन्त्यः, मदमपि मदयन्त्य इव, रागमपि रञ्जयन्त्य इव, आनन्दमपि आनन्दयन्त्य इव, नृत्यमपि नर्त- मुद्रा दीयन्ते ता अपि ससिन्दूराः । मनोरथेत्यादि । रथाश्च रथ्यासु संचरन्ति । ता अपि तद्वशात्पांसुला भवन्ति । उद्दामेति । प्रतीहार्यश्च । ता अप्येवंविधा भवन्ति । प्रचलन्ति नृत्तवशाद्दोलायमानानि पत्राणि विशेषकानि तथा कुण्डलानि यासाम्, अन्यत्र, - पत्राणि पल्लवाः । कुण्डलानि समूहाः । ललितेषु पदेषु हंसका नूपुराः । 'पादाङ्गदं तुलाकोटिर्मञ्जीरो नूपुरोऽस्त्रियाम् । हंसकः पादकटकः' इति । यद्वा, - ललितानि पदानि यासां ताश्च ता हंसरवमुखराश्च । ता ललितपदाश्च ते हंसा एव हंसकाश्चेति वा । बालक्रोडाश्च विवेकशून्याः । घनो निरन्तरः, मेघश्च । केत- क्योऽपि सकेतकरजस्काः । निद्रा स्वापः, संकोचश्च । आविष्टा भूतादिगृहीताः । नरेन्द्रो राजा, मन्त्री च । रागोऽभिष्वङ्गः, हिङ्गुलकादिश्च । मदमपि मदयन्त्य इवे- से उनके मुह की मुद्रा दमक रहा था, मानो अमोघ शासन वाले कामदेव के शासनपट्ट पर लगी हुई सिन्दूर की मुद्रा हो । साड़ियों पर कपूर की धूल की मूंठ छिड़कने से वे इस प्रकार धूल-धूल हो रही थीं मानों स्वेच्छा से विहार करने के लिये यौवन की गलियां हों। बड़ी बड़ी फूल मालाओं से नवयुवकों पर प्रहार कर रही थीं मानो युवकों के महोत्सव की रक्षा करने के लिए नियुक्त प्रतीहारियां हों। उनके पल्लवों के साथ कुण्डल हिलते हुए इस प्रकार शोभित हो रहे थे मानों वे मदनरूपी चन्दनवृक्ष की लताए हों। अच्छी और बुरी बात का विवेक बिल्कुल नहीं कर रही थीं, मानों सौभाग्य की बाल- क्रीड़ाएं हों। पटह की गम्भीर आवाज से उनके शरीर में रोमान्च भर आते थे मानों परागभरती हुई केतकी के फूल हों। दिन में खिली हुई कमलिनियों के समान और रात में विकसित कुमुदिनियों के समान लग रही थीं। भूतों से आविष्ट की भांति नरेन्द्रों अर्थात ओझैतों ( अथवा राजाओं) से घिरी थीं। प्रीति की तरह हृदय को हर ले रही थीं। गीति