भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

वेणुना झणझणायमानझल्लरीकेण ताड्यमानतन्त्रीपटहिकेन वाद्यमाना- नुत्तालालावुवीणेन कलकांस्यकोशीक्वणितकाहलेन समकालदीयमानानु- तालतालिकेनातोग्यवाद्येनानुगम्यमानाः, पदे पदे झणझणितभूषणरवैर्पि सहृदयैरिवानुवर्तमानताललयाः, कोकिला इव मदकलकाकलीकामला- लापिन्यो विटानां कर्णामृतान्यश्लीलरासकपदानि गायन्त्यः, समुड्ड- मालिकाः, सकर्णपल्लवाः, सचन्दनतिलकाः, समुच्छ्रिताभिर्वलयावलाया- चालाभिर्बाहुलतिकाभिः सवितारमिवालिङ्गयन्त्यः, कुङ्कुमप्रमृष्टिरुचिर- कायाः काश्मीरकिशोर्य इव वल्गन्त्यः, नितम्बबिम्बलम्बिविकटकुरण्टकशे- खराः प्रदीप्ता इव रागाग्निना, सिन्दूरच्छटाच्छुरितमुखमुद्राः शासनपट्टपङ्क्तय

क्षिति संबन्धः। आलिङ्गयको मुरजभेदः। तन्त्री। पटहिका पटहभेदः। न उत्ताला अनुत्ताला अनुद्धटशब्दाः। कांस्यकोशी शय्या। काहलेन व्यासेन। काहलं कांस्य- द्वयाभिघातः। आतोद्यमिति। उक्तं च-'ततं वीणादिकं वाद्यमानद्धं मुरजादिकम्। वंशादिकं तु सुषिरं कांस्यतालादिकं घनम्। चतुर्विधमिदं वाद्यं वादित्राताद्यनाम- कम् ॥' इति। लयशब्देन ताल एव माननिधानं यतीनामवच्छेदेन विधिं निवर्त्त- यमानो द्रुतमध्यविलम्बिताख्यमानवर्तनविधौ। स एव तालम्तु यस्यवच्छेदमलक्ष्य- मानः स्यात्। व्यपदेशो लय ल्ति ख्यान इति। मदेन कलो हृष्टः। काकली कल- सूक्ष्ममधुरगीतध्वनिः। अश्लीलानि ग्राम्याणि। कुङ्कुमेन परिमृष्टिः परिमार्जनमुद्व- र्तनादि। अन्यत्र, कुङ्कुमप्रमृष्टिः कुङ्कुमस्थलीषु लोटनात्। कुरण्टका अम्लातकानि। तेषां रक्तत्वमाह-प्रदीप्ता इति। मुखमुद्रा वक्रटङ्कः। शासनपट्टानां मुखेऽग्रे या

का मृदङ्ग धीरे धीरे बजाया जा रहा था। वंशी भी सुरीली तान में बज रही थी। झांझ भी झनझना रही थी। तन्त्री पटहिका नामक एक ताशेनुमा छोटा बाजा टुनटुनाया जा रहा था। नीचे की तुम्बी वाली अलाबुवी वीणा बजाई जा रही थी। कांस्यकोशी काहल नाम का वाद्य भी बज रहा था। एक ही समय में ताल के अनुसार तालियां भी बजाई जा रही थीं और इन सबके सम्मिलित नौबत बजती हुई उनके पीछे चल रही थी। डग-डग पर उनके गहने बज उठते थे। मानों सहृदय लोग उनके पीछे ताल और लय का अनुसरण करते चल रहे हों। कोयल के समान वे काकलो के अव्यक्त मधुर स्वर में अलापती थीं। सुनने में विटों को प्रिय लगने वाले गाली भरे गीत गा रही थीं। सिर पर पुष्पमाला, कानों में पल्लव और माथे पर चन्दन-तिलक लगाये थीं। वलयों को खनकाती हुई अपनी भुजमताओं को इस प्रकार उठाती मानों सूर्य का आलिङ्गन कर रही हों। कुङ्कुम से मसले हुए अपने अङ्गों से काश्मीर की नबेलियों के समान मचल रही थीं। उनके नितम्ब पर कुरंटक पुष्प की मालायें लटक रही थीं। मानो राग की अग्नि से जल उठी हों। सिन्दूर