भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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चतुर्थ उच्छ्वासः २१७ स्कन्धावलम्बमानकेसरमालाः काम्बोजवाजिन इवास्कन्दन्तः, तरल- तारका हरिणा इवोड्डीयमानाः, सगरसुता इव खनित्रैर्निर्दयैश्चरणाभिघातै- र्दारयन्तो भुवम् , अनेकसहस्रसंख्याश्चिक्रीडुर्युवानः । कथमपि तालावचर- चारणचरणक्षोभं चक्षमे क्षमा । क्षितिपालकुमारकाणां च खेलतामन्यो- न्याम्फालेराभरणेषु मुक्ताफलानि फेलुः । सिन्दूररेणुना पुनरुत्पन्नहिरण्य- गर्भगर्भशोणितशोणाक्षमिव ब्रह्माण्डकपालमभवत् । पटवासपांसुपटलेन प्रकटितमन्दाकिनीसैकतसहस्रमिव शुशुभे नभस्तलम् । विप्रकीर्यमाण- पिष्टातकपरागपिञ्जरितातपा भुवनक्षोभविशीर्णपितामहकमलकिञ्जल्कर- जोराजिरञ्जिता इव रेजुर्दिवसाः । संघट्टविघटितहारपतितमुक्ताफलपटलेषु चस्खाल लोकः । स्थानस्थानेषु च मन्दमन्दमास्फाल्यमानालिङ्ग्यकेन शिञ्जानमञ्जु- केसराणि बकुलानि, ग्रीवारोमवह्वयश्च । काम्बोजा बाह्निकदेशजाः । आस्क- न्दन्त आक्रमन्तः । तालैरवचरन्ति तालावचराः । तालावचरणयुक्तं भ्रमणम् । स्फुटितालिकाशतैर्युक्तं चारणजनस्य कैश्चिद्भ्रमणम् । तत्कांस्यतालिकायाराडाशिष्टा- पञ्चकुलमारिवकाः दक्षिणापथे तालावा इति प्रसिद्धाः । खेलतां क्रीडताम् । फेलु- र्बिभिदुः । शोणाक्षं लोहितदिक्कम् । स्थानस्थानेष्वित्यादौ । एवंविधेनातोद्येनानुगम्यमानाः पण्यविलासिन्यः प्रानृत्य- हजारों नवयुवक कम्बोज देश के घोड़ों की तरह मौलसिरी की माला कंधे पर लटकाए कूदका मारने लगे और खन्ती से पृथ्वी को खन देने वाले सगर के पुत्रों के समान अपने निर्दय चरण के प्रहारों द्वारा पृथिवी को मानो विदीर्ण कर रहे थे । ताल के साथ नृत्य करते हुए चरण के प्रहारों को पृथिवी किस प्रकार सहन कर पाती थी । खेलते हुए राज- कुमारों के परस्पर धक्कामुक्की करने से आभूषणों के मोती टूट कर बिखर गए । सिन्दूर की धूल इस प्रकार दिशाओं में फैल गई मानों ब्रह्माण्ड का कपाल फिर से हिरण्यगर्भ के गर्भ से उत्पन्न हो रहा है और उस गर्भ के खून से लद्रफद है । पटवास की धूल से आकाश मन्दाकिनी की हजारों रेतों को प्रकट करता हुआ शोभित हो रहा था । दिन के आतप पिष्टातक के पीले पराग के उड़ने से पिंजरित हो गए, मानों सारे भुवन को आनन्द से कम्पित करने वाले ब्रह्माजी के कमल की धूल से रंजित हों । टक्कर लगने से टूटे हुए हार के बिखरे मुक्ताफलों पर पैर पड़ते ही लोग फिसल कर गिरने लगे । जगह-जगह पर वेश्यायें नृत्य करने लगीं । आलिङ्ग्यक नाम का एक विशेष प्रकार