हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ हर्षचरितम् दासीसमाकृष्यमाणराजवल्लभः, क्वचिन्मत्तकटककुट्टनीकण्ठलग्नवृद्धार्यसा- मन्तवृत्तनिर्र्भरहसितनरपतिः, क्वचित्क्षितिपाक्षिसंज्ञादिष्टदुष्टदासेरकगीत- सूच्यमानसचित्रचौर्यरतप्रपञ्चः, क्वचिन्मदोत्कटकुटहारिकापरिष्वज्यमान- जरत्प्रव्रजितजनितजनहासः, क्वचिदन्योन्यनिर्भरस्पर्धोद्धुरविटकचेटकार- ब्धावाच्यवचनयुद्धः, क्वचिद्भूपालाबलात्कारकृष्टनर्त्यमाननृत्तानभिज्ञांतः- पुरपालभावितभुजिष्यः, सपर्र्वत इव कुसुमराशिभिः, सधारागृह इव सीधुप्रपाभिः, सनन्दनवन इव पारिजातकामोदैः, सनीहार इव कर्पूर- रेणुभिः, साट्टहास इव पटहरवैः, सामृतमथन इव महाकलकलैः, सावर्त्त इव रासकमण्डलैः, सरोमाञ्च इव भूषणमणिकिरणैः, सपट्टबन्ध इव चन्दन- ललाटिकाभिः, सप्रसव इव प्रतिशब्दकैः, सप्ररोह इव प्रसाददानैरुत्स- वामोदः । दास्या अपत्यं दासेरकः । 'क्षुद्राभ्यो वा' इत्यारक् । सचिवो मन्त्री । रतं सुरतम् । कुटहा- रिका कुम्भदासी । गायननर्तकभुजिष्याजनरचितः समूहश्चेटकः । अवाच्यवचनानि गाल्यः । भावितः कथं नृत्यन्तीत्यवलोकिताः । भुजिष्या दास्यः । रासकमण्डलै- स्त्यस्रभ्रान्तनृत्तवृन्दैः । ललाटेऽलंकारो ललाटिका । 'कर्णललाटात्कनलंकारे' । प्ररोहोऽङ्कुरः । मंद हँसी के साथ राजा का इशारा पाकर सम्राट् के प्रिय-पात्रों को अपनी ओर खींच लेती थीं। कहीं मतवाली बूढ़ी छिनाल स्त्रियाँ बूढ़े आर्य सामन्तों के गले में हाथ डाल देतीं, इस दृश्य को देख महाराज भी हँस पड़ते । कहीं पाजी छोकरे राजा की आँख का इशारा पाकर सचिवों के गुप्त प्रेम की पोल खोलने लगे । कहीं मस्तानी पनिहारिनें बूढ़े संन्यासियों से लिपट कर लोगों को हँसाने लगीं । कहीं एक दूसरे से चखाचखी करने में चालाक बदतमीज नौकर गाली-गलौज करते हुए भिड़ गए । कहीं नृत्य में अनभिज्ञ रनिवास की महिलाओं द्वारा जबर्दस्ती खींचकर नचाए गए अन्तःपुर के प्रतिहारी दासियों के साथ नृत्य में सम्मिलित हो गए । पर्वत के समान जगह-जगह फूलों की ढेरें थीं । धारागृहों की भाँति मदिरा के पनसाले बन गए । पारिजात की सुगन्धि नन्दनवन के समान भरने लगी । ओस जैसी कपूर की धूल भर गई । अट्टहास के समान पटह आवाज करने लगे । अमृत- मथन के समान लोग शोरगुल करने लगे । भँवरियों के समान रासमण्डलियाँ बन गईं । गहनों की मणियों की किरणें रोमाञ्च के सदृश मालूम पड़ीं । माथे पर चंदन के खौर कपड़े की बँधी पट्टी जैसे लगने लगे । बच्चों की केहाँ-केहाँ के समान प्रतिध्वनि होने लगी । प्रसन्नता से दिए जाने वाले दान अंकुर की भाँति लगातार बढ़ने लगे ।