भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

चतुर्थ उच्छ्वासः २१५ महीमवतीर्णानि कुलानि, परिजनेन पृथुकरण्डपरिगृहीताः स्नानीयचूर्णा- वकीर्णकुसुमाः सुमनःस्रजः, स्फटिकशिलाशकलशुक्लकर्पूरखण्डपूरिताः पात्रीः, कुङ्कुमाधिवासभाञ्जि भाजनानि च मणिमयानि, सहकारतैलति- म्यत्तनुखदिरकेसरजालजटिलानि चन्दनधवलपूगफलफालीदन्तुरदन्तश- फरुकाणि, गुञ्जन्मधुकरकुलपीयमानपारिजातपरिमलानि पाटलानि पाट- लकानि च, सिन्दूरपात्राणि च पिष्टातकपात्राणि च बाललतालम्बमान- विटकवीटकांश्च ताम्बूलवृक्षकान्बिभ्राणेनानुगम्यमानानि चरणनिकुट्टन- रणितमणिन् पुरमुखरितदिङ्मुखानि नृत्यन्ति राजकुलमागच्छन्ति सम- न्तात्सामन्तान्तःपुरसहस्राण्यदृश्यन्त । शनैः शनैर्व्यजृम्भत च क्वचिन्नृत्तानूचितचिरंतनशालीनकुलपुत्रकलो- कलास्यप्रथितपार्थिवानुरागः, क्वचिदन्तःस्मितक्षितिपालापेक्षितक्षीबक्षुद्र- सहस्राण्यदृश्यन्तेति संबन्धः । स्त्रीराज्यानीति बहुलत्वम् । असुरविवराणीवेत्युज्ज्व- लत्वात् । नारायणेत्यादिगौरववत्त्वाद्बहुलत्वाच्च । स्नानीयं स्नानहितम् । खदिरकेसरं खदिरसारम् । फाली खाता । शफरुकाणि समुद्राः । पारिजातं सुगन्धिद्रव्यचूर्णम् । ‘पिष्टातः पटवासकः’ इत्यमरसिंहः । स च मङ्गलार्थः । विटकवीटकं पञ्चाशत्ताम्बूल- पत्रैः क्रियते । शनैः शनैरित्यादौ । व्यजृम्भतोत्सवामोद इति संबन्धः । शालीनमघृष्टता । दिशाओं से स्त्रियों के राज्य ही खिंचकर चले आ रहे हों, या पाताल के विवर ही खुल गए हों, या भगवान् कृष्ण के अन्तःपुर ही टपक पड़े हों, या अप्सराएँ जत्थे के जत्थे पृथिवी पर उतर आई हों । उनके पीछे अनेक नौकर-चाकर थे जो चौड़ी चंगेलियों में स्नानीय चूर्णों से छिड़की हुई फूलों की मालाएँ, तश्तरियों में स्फटिकमणि के टुकड़ों के समान कपूर के खण्ड, कुंकुम से सुगन्धित अनेक प्रकार के मणिमय पात्र, हाथीदाँत की छोटी मंजूषा में चन्दन से धवलित पूगफल और आम्र के तैल से सिक्त खदिर के केसर, सुगन्धित द्रव्यों के चूर्ण से भरी हुई लाल थैलियाँ, सिन्दूर के सिन्दोरे, पिष्टातक या पट- वासकचूर्ण से भरे पात्र और लटकते हुए पचास बीड़ों से लदे हुए छोटे-छोटे ताम्बूल के झाड़ लिए हुए थे। वे आकर अपने मणिनूपुरों की आवाज से दिशाओं को मुखरित करती हुई नाचने लगीं । शनैः शनैः उत्सव में कुछ और गमक पैदा हुई । कहीं नृत्य का अभ्यास न होने पर भी बड़े ही शर्मालु कुलपुत्र राजा के प्रेम से नाचने लगे । कहीं मतवाली क्षुद्रदासियाँ