हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
२२० हर्षचरितम् यमाना इव, उत्सवमप्युत्सवयन्त्य इव, कटाक्षेक्षितेषु पिबन्त्य इवापाङ्ग- शुक्तिभिः, तर्जनेषु संशमयन्त्य इव नखमयूखपाशैः, कोपाभिनयेषु ताड- यन्त्य इव भ्रूलताविभागैः, प्रणयसंभाषणेषु वर्षन्त्य इव सर्वरसान्, चतुर- चङ्क्रमणेषु विकिरन्त्य इव विकारान्, पश्यविलासिन्यः प्रानृत्यन् । अन्यत्र वेत्रिवेत्रवित्रासितजनदत्तान्तरालाः, ध्रियमाणधवलातपत्रवना वनदेवता इव कल्पतरुतलविचारिण्यः, काश्चित्स्कन्धोभयपालीलम्बमान- लम्बोत्तरीयलग्नहस्ता लीलादोलाधिरूढा इव प्रेङ्खन्त्यः, काश्चित्कनककेयूर- कोटिविपाट्यमानपट्टांशुकोत्तरङ्गास्तरङ्गिण्य इव तरच्चक्रवाकसीमन्त्यमान- स्रोतसः, काश्चिदुद्धूयमानधवलचामरटालमत्रिकण्टकवलितविकटकटा- क्षाः, सरस्य इव हंसाकृष्यमाणनीलोत्पलवनाः, काश्चिश्चलचरणच्युतालक्त- स्यादि । मदेन हि सर्वो मत्तो भवति, मदस्तु ता आश्रित्य मत्तः । एवमुत्तरत्र । अन्यत्रेत्यादौ । राजमहिष्यो विलेसुरिति संबन्धः । ध्रियमाणधवलातपत्रवना इत्यादौ वाक्यार्थोपमा विचार्या । पाली पङ्क्तिः । कनककेयूरेणेति । कनकग्रहणेन चक्र- वाकसादृश्यमाह । तरङ्ग उत्तरीयम् । सीमन्त्यमानानि द्विधाक्रियमाणानि । त्रिक- की तरह राग ( स्वरलय, या स्नेह) को उदीप्त कर रहीं थीं। आनन्द उत्पन्न करने में स्फूर्ति के समान थीं। मानों मद को भी मतवाला बना रही थीं, राग को भी रंजित कर रही थीं, आनन्द को भी आनन्दित कर रही थीं, नृत्य को भी नचा रही थीं, उत्सव को भी उत्सव में लीन कर रही थीं। इस प्रकार कटाक्षों से देखती मानों अपाङ्ग की सीपीं से पान कर रही थीं। जब कोप का अभिनय करतीं तो लगता कि अपनी भौंहें चला- चलाकर ताड़न करती हैं। प्रणय की बातचीत में तो मानों सारे रसों को उड़ेल कर रख देतीं। नृत्य की चक्करदार मुद्राओं में मानों कामजनित विकारों को छींट रही थीं। दूसरी ओर राजमहिषियां भी नृत्य में कूद पड़ीं। दर्शनार्थी लोगों को द्वारपालों ने डण्डे से बाहर रोक रखा। तब इन्हें नाचने का अवकाश मिल गया। सिर पर लगे हुए धवल छत्र के साथ नाच रही थीं, मानों कल्पवृक्षों के नीचे विचरण करने वाली वनदेवता हों। कुछ के दोनों तरफ कन्धों से उत्तरीय के लम्बे छोर लटक रहे थे मानों हिंडोले पर बैठकर झूल रही हों। कुछ के अंशुक केयूर के नुकीले अग्रभाग में लगकर चर-से फट जाते और फहराने लगते थे, मानों नदियों के समान थीं जिनकी लहरें चक्रवाक पक्षी के तैरने से दो भागों में विभक्त हो जाती हैं। कानों के त्रिकंटक में डोलते हुए चंवर के बालों के फंस जाने से कुछ अपने कटाक्ष सिमट ले रही थीं, यह दृश्य ऐसा लगता मानों हंस तालाव के नीले कमलों को खींच रहे हों। कुछ अपने चञ्चल पैर में लगे हुए आलते से,
चतुर्थे उच्छ्वासः २२१
कारुणस्वेदशीकरसिच्यमानभवनहंसाः, संध्यारागरञ्जयमानेन्दुबिम्बा इव कौमुदीरजन्यः, काश्चित्कण्ठनिहितकाञ्चनकाञ्चीगुणान्वितकञ्चुकिविकारा- कुञ्चितभ्रुवः, कामवागुरा इव प्रसारितबाहूपाशा राजमहिष्यः प्रारब्ध- नृत्ता विलेसुः । सर्वतश्च नृत्यतः स्त्रैणस्य गलद्भिः पादालक्तकैररुणिता रागमयीव शुशोण क्षोणी । समुल्लसद्भिः स्तनमण्डलैर्मङ्गलकलशमय इव बभूव महोत्सवः । भुजलताविक्षेपैर्मृणालवलयमय इव रराज जीवलोकः । समु- ल्लसद्भिर्विलासस्मितैस्तडिन्मय इवाक्रियत कालः । चञ्चलानां चक्षुषामं- शुभिः कृष्णसारमया इवासन्वासराः । समुल्लसद्भिः शिरीषकुसुमस्तबक- कर्णपूरैः शुकपिच्छमय इव हरितच्छायोऽभूदातपः । विस्रंसमानैर्धम्मि- ल्लतमालपल्लवैः कज्जलमयमिवालक्ष्यतान्तरिक्षम् । उत्क्षिप्तैर्हस्ताग्रकिसलयैः ण्टकः कर्णाभरणभेदः । 'त्रिकण्टकस्तु त्र्यस्रः स्यात्त्रिभी रत्नैश्च भूषणम्' । कौमुदी कार्तिकज्योत्स्ना । तद्युक्ता रजन्यो रात्रयः । आकुञ्चित भ्रुकुटः । विलेसुश्चिक्रीडुः । स्त्रीणां समूहः स्त्रैणं तस्य । शुशोण शोणाभूत् । कालो होरादिलक्षणः, कालश्च कृष्णः । कथं तडिन्मयो रक्तवर्ण इति विरोधच्छाया । धम्मिल्लाः संयताः केशाः । जो देह से टपकते हुए पसीने की बूँदों को लाल कर रहा था, भवन के हंसों को रँग रहा थीं मानों सन्ध्या की लाली से नहाये हुए चन्द्र से युक्त कार्तिक की चांदनी भरी रातें हों । कुछ अपनी सोने की करधनी को बूढ़े कंचुकियों के गले में डालकर उनके विकृत भावों को भौंहें नचा-नचाकर निहार रही थीं। इस प्रकार कामदेव की युवक लोगों को बांधने वाली डोरी के समान अपने भुजपाशों को फैलाकर उन्होंने नाचना शुरू किया । चारों ओर नाचती हुई स्त्रियों के पैर के आलते से पृथिवी रागमयी की भांति लाल हो गयी । उनके उभरते हुए स्तनमण्डलों से महोत्सव में केवल मङ्गलकलश ही दिखाई पड़ते थे। सारा संसार उनकी भुजलताओं के विक्षेप से मानों मृणालों से भरा प्रतीत होने लगा । वह उनकी कौंधती हुई मुस्कानों से समय मानों बिजलियों से भर गया । चंचल आंखों की रश्मियों से मानों दिन मृगों से भरे प्रतीत होने लगे। शिरीष पुष्प के गुच्छों के कनफूल इतने समुल्लसित हो गए कि आतप की छाया ही प्रतीत हो गई और ऐसा लगा कि सुग्गे के हरे हरे पंख बिछ गए । बंधे हुए केशपाश में खोंसे गए तमालपल्लव इस प्रकार खुलकर चूने लगे मानों आकाश में काजल भरने लगा। ऊपर उत्क्षिप्त हाथों से सृष्टि कमलिनियों से भरी जैसी शोभित होने लगी। माणिक्य के बने इन्द्रायुधों की किरणों से सूर्य की रश्मियां चाषपक्षी के पंख के समान शोभित हुईं। गहनों की झनझनाहट की प्रतिध्वनि
२२२ हर्षचरितम् कमलिनीमय्य इव बभासिरे सृष्टयः । माणिक्येन्द्रायुधानांमर्चिषा चाषप- त्रमया इव चकाशिरे रविमरीचयः । रणतामाभरणगणानां प्रतिशब्दकैः किङ्किणीमय्य इव शिशिश्रिरे दिशः । जरत्योऽप्युन्मादिन्य इव रमण्यो रेणुः । वर्षीयांसोऽपि ग्रहगृहीता इव नापत्रेपिर । विद्वांसोऽपि मत्ता इवात्मानं विसस्मरुः । निनर्तिषया मुनीनामपि मनांसि विपुस्फुलुः । सर्वस्वं च ददौ नरपतिः । दिशि दिशि कुबेरकोषा इवालुप्यन्त लोकेन द्रविणराशयः । एवं च वृत्ते तस्मिन्महोत्सवे, शनैः शनैः पुनरप्यतिक्रामति काले, देवे चोत्तमाङ्गनिरहितरक्षासर्षपे, समुन्मिषत्प्रतापाग्नस्फुलिङ्ग इव गोरो- चनापिञ्जरितवपुषि, समभिव्यज्यमानसहजक्षात्रतेजसीव हाटकबद्धविक- टव्याघ्रनखपङ्क्तिमण्डितग्रीवके हृद्योद्भिद्यमानदर्पाङ्कुर इव, प्रथमाव्यक्त- जल्पितेन सत्यस्य शनैःशनैरौङ्कारमिव कुर्वाणे, मुग्धस्मितैः कुसुमौरव मधुकरकलानि बन्धुहृदयान्यकर्षति, जननीपयोधरकलशपयःसीकरसे- कादिव जायमानैर्विलासहसिताङ्कुरैर्दर्शनकैरलंक्रियमाणमुखकमलके चारित्र बभासिरेऽशोभन्त । माणिक्यमुत्कृष्टं रत्नम् । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः । शिशिश्रिरे सशब्दा अभवन् । रेणुः स्तनितवत्यः । वर्षीयांसो वृद्धतराः । अपत्रेपिरे लज्जामभ- जन्त । विपुस्फुलुश्चेरुः । एवं चेत्यादौ । देवी यशोमती राज्यश्रियमधत्तेति संबन्धः । हाटकं सुवर्णम् । इस प्रकार उठी मानों दिशाओं में किंकिणियां बजने लगीं । बूढ़ी स्त्रियां भी युवतियों के समान ठमकने लगीं । बड़े-बूढ़े भी इस प्रकार निर्लज्ज हो गए मानों उनपर कोई ग्रह सवार हो । पढ़े लिखे भी लोग मतवाले होकर अपने आपको भूल बैठे । नाचने की इच्छा से मुनियों के मन में भी खलबली मचने लगी । राजा ने अपना सब कुछ लुटा दिया । कुबेर के खजानों की भांति धनराशियों को लोगों ने लूट लिया । इस प्रकार वह महोत्सव समाप्त हुआ । धीरे धीरे फिर समय बीतने लगा । हर्ष भी बढ़ने लगा । उसके मस्तक पर रक्षा के लिये सरसों रखी जाती थी । गोरोचना की उबटन से उसकी देह पीली हो गयी थी, मानों फूटकर निकली हुई प्रतापाग्नि के कण छा गए हों। उसकी ग्रीवा में बाघ के नखों की पंक्ति सोने में जड़वाकर पहना दी गयी थी, मानों उसका स्वाभाविक क्षत्रिय तेज अभिव्यक्त हो रहा था । सत्ययुग का धीरे धीरे आरम्भ करता हुआ सा ओंकार के समान पहले पहल वह तुतलाती आवाज में बोलने लगा, मानों उसके हृदय में पनपते हुए दर्प का अंकुर हो । फूल जैसे भौरों को अपनी ओर खींच लेते
चतुर्थ उच्छ्वासः २२३ इवान्तःपुरस्त्रीकदम्बकेन पाल्यमाने, मन्त्र इव सचिवमण्डलेन रक्ष्य- माणे, वृत्त इव कुलपुत्रकलोकेनामुच्यमाने, यशसीवात्मवंशेन संवर्ध्य- माने, मृगपतिपोत इव रक्षिपुरुषशस्त्रपञ्जरमध्यगते, धात्रीकराङ्गुलिलग्ने पञ्चषाणि पदानि प्रयच्छति हर्षे, षष्ठं वर्षमवतरति च राज्यवर्धने देवी यशोमती गर्भणाधत्त नारायणमूर्तिरिव वसुधां देवीं राज्यश्रियम् । पूर्णेपु च प्रसवदिवसेषु दीर्घरक्तनालनेत्रामुत्पलिनीमित्र सरसी, हंस- मधुरस्वरां शरदमिव प्रावृट् , कुसुमसुकुमारावयवां वनराजिमिव मधुश्रीः, महाकनकावदातां वसुधारामिव द्यौः, प्रभावर्षिणीं रत्नजातिमिव वेला, सकलजननयनानन्दकारिणीं चन्द्रलेखामिव प्रतिपत् , सहस्रनेत्रदर्शन- योग्यां जयन्तीमिव शची, सर्वभूभृद्भ्यर्थितां गौरीमिव मेना प्रसूतवती ओंकारम् । ओमिति यावत् । पयोधरौ स्तनौ, पयोधराश्च मेघाः। पयः क्षीरम्, जलं च । पञ्च वा षड् वा पञ्चषाणि । पूर्णे०त्यादौ । देवी दुहितरं प्रसूतवतीति संबन्धः । रक्तनाले रक्ते एव नेत्रे यस्याः, रक्तानि नालानि नेत्राणि मूलानि च यस्याः । हंसवतैश्च मधुरः । अवयवा अङ्गानि, विभागाश्च । माधवो वसन्तः । महाकनकं तिलसुवर्णम् । वसुधारा धन- वृष्टिः । इयं च महाभ्युदयसूचनाय दिवा पतति । वेला जलविकृतिः । इन्द्राऽपि सहस्रनेत्रः । जयन्तः शक्रपुत्रः । भूभृतो राजानः, पर्वताश्च । मेना हिमवन्महिला । हैं वैसे ही वह अपनी मुसकान से बन्धुओं के मन हर लेता था । माता के स्तनकलश की दूधधार से सींचने से उत्पन्न विलासपूर्ण हँसी के अंकुर के समान उसक दांत मुखकमल को अलंकृत कर रहे थे । अन्तःपुर की स्त्रियां चारित्र्य की भांति उसका पालन करती थीं। सचिव लोग यन्त्र की भांति उसकी रक्षा में तत्पर रहते थे । कुलीन राजपुत्र सदाचार की भांति उसे कभी नहीं छोड़ते थे । यश की भांति वह अपने वंश के साथ बढ़ने लगा । शेर के बच्चे की भांति उसके चारों ओर शस्त्र लिये हुये रक्षि पुरुष तैनात रहने लगे । जब वह धाय की उंगली पकड़कर पांच छः कदम चलने लगा और जब राज्यवर्धन ने भी छठे वर्ष में पदार्पण किया तब देवी यशोमती ने राज्यश्री को गर्भ में उस प्रकार धारण किया जैसे नारायण की मूर्ति पृथिवी को धारण करती है । जब प्रसव के दिन पूरे हो गए तब रानी ने पुत्री को पैदा किया । सरसी से उत्पन्न कमलिनी की भाँति उसके बड़े और लाल नेत्र थे । प्रावृट् से उत्पन्न शरद् की भाँति हंसों जैसा उसका स्वर था । वसन्त की श्री से उत्पन्न वनराजि की भाँति उसके अंग फूल की भाँति कोमल थे । आकाश से होने वाली सुवर्णवृष्टि के समान वह सोने जैसे अवदात
२२४ हर्षचरितम् दुर्हितरम् । यया द्वयोः सुतयोरुपरि स्तनयोरिवैकावलीलतया नितराम- राजत जननी । अस्मिन्नेव तु काले देव्या यशोमत्या भ्राता सुतमष्टवर्षदेशीयमु- द्धूयमानकुटिलकाकपक्षकशिखण्डं खण्डपरशुहुंकारामिधूमलेखानुबद्ध- मूर्धानं मकरध्वजमिव पुनर्जातम् , एकेनेन्द्रनीलकुण्डलांशुश्यामलितेन शरीरार्धेनेतरेण च त्रिकण्टकमुक्ताफलालोकधवलितेन संपृक्तावतारमिव हरिहरयोर्दर्शयन्तम्, पीनप्रकोष्ठप्रतिष्ठितपुष्पलोहवलयं परशुराममिव क्षत्रक्षपणक्षीणपरशुपाशचिह्नितं बालताङ्गतम् , कण्ठसूत्रग्रथितभङ्गुरप्रवा- लाङ्कुरं हिरण्यकशिपुमिवोरःकाठिन्यखण्डितनरसिंहनखरखण्डम्, गृही- ययेत्यादौ । यया दुहित्रा । द्वयोः सुतयोरुपरि जातया यशोमती नितरामराज- तेति संबन्धः । अस्मिन्नित्यादौ । देव्या यशोमत्या भ्राता स्वतनयं भण्डिनामानं कुमारयोरनु- चरमर्पितवानिति संबन्धः । काकपक्षकशिखण्डा एव शिखण्डः पिच्छम् । पुष्पलोहं मणिभेदः । मृताग्निहोत्रं रथचक्रमिति केचित् । रणहतवीरकायशातनवशात्परशोः वर्ण की थी । जैसे समुद्र की वेला रत्नों को छिटका देती है वैसे ही वह अपनी कान्ति फैला रही थी । प्रतिपदा से उत्पन्न चन्द्रलेखा की भाँति वह सबके नयन आनन्दित करती थी । इन्द्राणी से उत्पन्न जयन्ती की भाँति वह सहस्र नेत्रों (अथवा सहस्र नेत्र इन्द्र) द्वारा देखने योग्य थीं । मेना से उत्पन्न पार्वती की भाँति समस्त भृभृत् (राजा या पर्वत) उसका लाड़-प्यार करते थे । जैसे दोनों स्तनों के ऊपर एकावली लता सुशोभित होती है उसी प्रकार रानी यशोमती दोनों पुत्रों के बाद उस पुत्री से अत्यन्त सुशोभित हुई। इसी समय यशोमती के भाई ने आठ वर्ष की उम्र वाले भण्डि नामक अपने पुत्र को राज्यवर्धन और हर्ष के संगी-साथी के रूप में रहने के लिए भेजा। उसकी शिखा मोर- पंख की भाँति लहरा रही थी, मानों शिवजी की क्रोधाग्नि की धूमलेखा को सिर से लिए हुए कामदेव फिर उत्पन्न हो गया हो। उसके शरीर का एक अर्धभाग इन्द्रनीलमणि के कुंडल की किरणों से श्याम वर्ण का हो रहा था और दूसरा भाग त्रिकंटक में पिरोई हुई मोतों की आभा से सफेद हो गया था, मानों विष्णु और शिव के सम्मिलित अवतार का दृश्य उपस्थित कर रहा हो । उसकी मोटी कलाई में पुखराज का कड़ा पड़ा था, मानों क्षत्रियों का विनाश करने में घिसे हुए परशु से चिह्नित भगवान् परशुराम ही बालक रूप में उत्पन्न हों । गले में सूत्र में बँधा हुआ मूंगे का टेढ़ा टुकड़ा सिंहनख की तरह लग रहा था मानों हिरण्यकशिपु जिसकी कड़ी छाती पर भगवान् नृसिंह के नख का खण्ड टूट कर
चतुर्थ उच्छ्वासः २२५ तजन्मान्तरम् शैशवेऽपि साबष्टम्भं बीजमिव वीर्यद्रुमस्य भण्डिनामानम- नुचरं कुमारयोरर्पितवान् । अवनिफ्तेस्तु तस्योपरि पुत्रयोस्तृतीयस्य नेत्रयोरिवेश्वरस्य तुल्यं दर्शनमासीत् । राजपुत्रावपि सकलजावलोकहृदयानन्ददायिनौ तेन प्रकृ- तिदक्षिणेन मधुमाधवाविव मलयमारुतेनोपेतौ नितरां रेजतुः । क्रमेण चापरेणेव भ्रात्रा प्रजानन्देन सह वर्धमानौ यौवनमवतेरतुः । स्थिरोरु- स्तम्भौ च पृथुप्रकोष्ठौ दीर्घभुजार्गलौ विकटोरःकवाटौ प्रांशुसालाभिरामौ महानगरसंनिवेशाइव सर्वलोकाश्रयक्षमौ बभूवतुः । अथ चन्द्रसूर्याविव स्फुरज्ज्योत्स्नायशःप्रतापाक्रान्तभुवनावभिरामदु- पाशावशेषता । भङ्गुरः कुटिलः । बीजमिवेति । शैशवाद्बीजावस्थोत्प्रेक्ष्यते, न तु द्रुमावस्था । अवनीत्यादौ । अवनिफ्तेस्तु तस्योपरि पुत्रयोस्तुल्यं दर्शनमालोकनमिति संबन्धः । अन्यत्र,-दर्शनं दृष्टिः । तृतीयस्येति च । ईश्वरस्येति साधारणम् । सकले- त्यादि साधारणम् । दक्षिणोऽनुकूलः, दाक्षिणात्यश्च । मधुमाधवौ चैत्रवैशाखौ । उरु- स्तम्भाविव उरवः महान्तश्च स्तम्भाः । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । स्थानविशेषो वा । कवाटो द्वारपट्टः । सालो वृक्षभेदः, प्राकारश्च । सर्वलोकेत्यादि साधारणम् । अथेत्यादौ । तौ सर्वस्यामेव पृथिव्यां प्रकाशतां जग्मतुरिति संबन्धः । स्फुर- ज्ज्योत्स्नाजालं यशस्तथा प्रतापोस्ताभ्याम्; अन्यत्र,-ज्योत्स्नायश इव भुवनाक्रमण- लग गया हो, फिर से उत्पन्न हो गया । इस शैशवकाल में भी वह तेजस्वी के सदृश लग रहा था । पराक्रम के वृक्ष का मानों वह बीज था । भण्डि के ऊपर राजा की दृष्टि दोनों पुत्रों के बीच शिवजी के तीसरे नेत्र के समान थी । समस्त जीवलोक को आनन्दित करने वाले दोनों राजपुत्र भी स्वभाव से दक्षिण (अनुकूल) उस भण्डि से अत्यन्त घुल-मिल गए, जैसे चैत्र और वैशाख दक्षिण की ओर से बहने वाले मलयानिल के साथ हो जाते हैं। क्रमशः दूसरे भाई के समान प्रजाओं के आनन्द के समान बढ़ते हुए यौवन को प्राप्त हुए । उनके स्तम्भ की भाँति स्थिर दो-दो ऊरु दण्ड, द्वार प्रकोष्ठ की भाँति सुगठित प्रकोष्ठ, अर्गलादण्ड की भाँति दीर्घ भुजाएँ, किवाड़ के पल्ले की भाँति चौड़ी छाती और प्राकार की भाँति ऊँचा आकार ऐसा लगता था मानों सारे संसार के आश्रय के योग्य किसी महानगर की रचना हुई हो । राज्यवर्धन और हर्ष दोनों का यश थोड़े ही समय में अन्य द्वीपों में भी फैल गया । चन्द्र की ज्योत्स्ना और सूर्य के प्रताप के समान उनके भी यश और प्रताप सारे संसार १५ ह० च०
२२६ : हर्षचरितम् निरीक्ष्यौ, अग्निमारुताविव समभिव्यक्ततेजोबलावेकीभूतौ, शिलाकठिन- कायबन्धौ हिमवद्विन्ध्याविवाचलौ, महावृषाविव कृतयुगयोग्यौ, अरुणग- रुडाविव हरिवाहनविभक्तशरीरौ, इन्द्रोपेन्द्राविव नागेन्द्रगतौ, कर्णार्जुना- विव कुण्डलकिरीटधरौ, पूर्वापरदिग्भागाविव सर्वतेजस्विनामुदयास्त- मयसंपादनसमर्थौ, अमान्ताविवातिमानेनासन्नवेलार्गलनिरोधसंकटे कुकु- टीरके, तेजःपराङ्मुखीं छायामपि जुगुप्समानौ, स्वात्मप्रतिबिम्बेनापि पादनखलग्नेन लजमानौ, शिरोरुहाणामपि भङ्गेन दुःखमवतिष्ठमानौ, समर्थत्वम् । प्रताप आयतिः, आतपश्च । तेजस्तैक्ष्ण्यम्, प्रकाशश्च । बलं सामर्थ्यम् । उभयत्राप्येकीभूतावन्योन्यानुवर्तिनौ, मिलितौ च । शिलावत्तादृशञ्च कठिनः । अच- लावकम्पौ, गिरी चाचलौ । कृतयुगमाद्ययुगभेदः, मूर्धन्यकाष्ठं च । योग्यावुचितौ, योग्या च शिक्षा । यद्वा, -कृतयुगे तत्र शकटादौ समर्थौ । हरयोऽश्वाः, सूर्यविष्णू च हरी । उक्तं च—'यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकेषु हरिर्ना कपिले त्रिषु ॥' इति । विभक्तं स्कन्धमध्यादिविभागेन स्थितम्, परिकल्पितं च नाग ऐरावणः, शेषश्च । नागेन्द्रवद्गतं ययोः, नागेन्द्रे वा गतावारूढौ । तेज- स्विनो वीराः, आदित्याश्च । उदयो वृद्धिः, आविर्भावश्च । अस्तमयो नाशः, तिरो- धानं च । अमान्ताविव वर्तमानौ । वेला जलनिधेः, जलमर्यादा । कुर्भूमिरेव कुटीरकं पर छा गए और दोनों (चन्द्र के समान) अभिराम एवं (सूर्य के समान) दुर्धर्ष हो गए। अग्नि और वायु के समान दोनों में तेज और बल बराबर अभिव्यक्त हुए और दोनों जैसे एक हो गए। हिमालय और विन्ध्याचल के समान दोनों अडिग हुए और उनके शरीर की गठन शिला जैसी कड़ी थी। दो महावृषभ के समान कृतयुग अर्थात् सतयुग के उचित (जुभाठ धारण करने योग्य) थे। अरुण और गरुड़ के समान दोनों अलग-अलग घोड़े की सवारी करते थे (अरुण पक्ष में-सूर्य के वाहन अर्थात् सारथि के रूप में, और गरुड पक्ष में-विष्णु के वाहन रूप में विभक्त शरीर वाले)। कर्ण और अर्जुन के समान कुण्डल और किरीट धारण करते थे। पूर्व और पश्चिम दिग्भाग के समान समस्त तेज- स्वियों (सूर्य और चन्द्र) का उदय और अस्त करने में समर्थ थे। उन्होंने अपना इतना विस्तार कर लिया कि पृथिवी की कुटिया के संकीर्ण स्थान में अँट नहीं पा रहे थे, जिसमें समुद्रतट की अर्गला लगा दी गई थी। तेज से अलग होकर रहने वाली छाया को भी वे हीन दृष्टि से देखते थे। अपने पैर के नखों में गिरकर लगे हुए अपने शरीर के प्रतिबिम्ब से भी वे लज्जा का अनुभव करते थे। सिर के बालों को काटने से भी उन्हें दुःख का अनु- भव होता । अपनी चूडामणि में प्रतिबिम्बित होते हुए अपने ही छत्र को दूसरा समझकर
चतुर्थ उच्छ्वासः २२७ चूडामणिसंक्रान्तेनापि द्वितीयेनातपत्रेणापत्रपमाणौ, भगवति षण्मुखेऽपि स्वामिशब्देनासुखायमानश्रवणौ, दपणदृष्टेनापि प्रतिपुरुषेण दूयमानन- यनौ, संध्याञ्जलिघटनेष्वपि शूलायमानोत्तमाङ्गौ, जलधरधृतेनापि धनुषा दोधूयमानहृदयौ, आलेख्यक्षितिपतिभिरप्यप्रणमद्भिः संतप्यमानचरणौ, परिमितमण्डलसंतुष्टं तेजः सवितुरप्यबहुमन्यमानौ, भूभृदपहृतलक्ष्मीकं सागरमप्युपहसन्तौ, बलवन्तमकृतविग्रहं मारुतमपि निन्दन्तौ, हिमव- तोऽपि चमरीवालव्यजनवीजितेन दह्यमानौ, जलधीनामपि शङ्खैः खिद्य- मानौ, चतुःसमुद्राधिपतिमपरं प्रचेतसमप्यसहमानौ, अनपहृतच्छत्रा- नपि विच्छायानवनिपालान्कुर्वाणौ, माधुष्वप्यसेवितप्रसन्नौ, मुखेन मधु जरद्हूम् । भङ्गः कुञ्चितत्वम्, युद्धे पलायनं च । अपत्रपमाणौ लज्जन्तौ । स्वामी कुमारः, प्रभुश्च । प्रतिपुरुषेनेति । स्पर्धायां प्रतिशब्दः । दोधूयमानं संतप्यमानम् । मण्डलं बिम्बम्, विषयश्च । तेजः प्रकाशः, तैक्ष्ण्यं च । भूभृदत्र प्रकरणान्मन्दरः, राजानश्च भूभृतः । लक्ष्मीः समृद्धिरपि । विग्रहं वैरम्, देहश्च । अनपहतेत्यादि वर्ण्यमानवयोवस्थाभिप्रायेणोक्तम् । छाया कान्तिः, आतपप्रतिपक्षजातिश्च । सति छत्रे विच्छायत्वं न भवतीति विरोधः । माध्विति । साधूनां सेवान्यतिरेकेण प्रसादायो ग्यत्वम् । प्रसन्नौ प्रसादवन्तौ, सुरापि प्रसन्ना । मधु माधुर्यम्, मद्यं च । असेवितप्रसन्नश्च कथं मुखेन मधु क्षरतीति विरोधः । ऊष्मा स्मयः, तापश्च । लज्जित होते थे । भगवान् कार्तिकेय के लिए भी स्वामी शब्द का व्यवहार करना उनके कानों को सुखकर नहीं लगता । दर्पण में अपने ही प्रतिबिम्ब को किसी दूसरे प्रतिस्पर्धी का समझकर उनकी आँखों को कष्ट होता । संध्या को प्रणाम करने के लिए हाथ जोड़ते ही उनके सिर में पीड़ा होने लगती । उनके सामने मेघ भी जब धनुष धारण करता तो उनके हृदय में कँपकँपी होने लगती । सिर नहीं झुकाते हुए चित्रलिखित राजाओं को देखकर उनके पैर मारे क्रोध के थरथराने लगते । सूर्य के मण्डल में घिरे हुए तेज को भी वे बहुत नहीं मानते थे । हरी हुई लक्ष्मी वाले समुद्र की भी वे हँसी उड़ाते थे । बलवान् होकर भी युद्ध नहीं करने वाले (अथवा शरीर से रहित) वायु की भी वे निन्दा करते थे । हिमालय को भी चमरी के बालों से झले जाते देखकर वे भीतर-भीतर जलते थे । समुद्रों के भी शंखों (शंख संज्ञक निधियों) को देखकर खिन्न होते थे । चारों समुद्रों पर आधिपत्य करने से दूसरे वरुण को भी सह नहीं पाते थे । छत्र छीन कर भी राजाओं को छायारहित (कान्तिहीन) कर देते थे । सज्जनों पर सेवा के बिना ही प्रसन्न रहते (अथवा प्रसन्ना अर्थात् मदिरा के न सेवन करने पर भी) और मुख से उनके प्रति मीठी बात बोलते (अथवा मधु अर्थात् मदिरा को मुँह से उगलते) । दुष्ट राजाओं के वंश को अपनी गर्मी
२२८ हर्षचरितम् क्षरन्तौ, दुष्टराजवंशानूष्मणा दूरस्थितानपि म्लानिमानयन्तौ, अनुदिवसं शस्त्राभ्यासश्यामिकाकलङ्कितमशेषराजप्रतापाग्निनिर्वपणमलिनमिव कर- तलमुद्वहन्तौ, योग्याकालेषु धीरैर्धनुर्ध्वनिभिरभ्यर्णोपभोगाद्दिग्वधूभिरिवा- लपन्तौ राज्यवर्धन इति हर्ष इति सर्वस्यामेव पृथिव्यामाविर्भूतशब्दप्रा- दुर्भावौ, स्वल्पीयसैव कालेन द्वीपान्तरेष्वपि प्रकाशतां जग्मतुः । एकदा च तावाहूय भुक्तवानभ्यन्तरगतः पिता सस्नेहमवादीत्— ‘वत्सौ ! प्रथमं राज्याङ्गं, दुर्लभाः सद्भूत्याः । प्रायेण परमाणव इव समवायेष्वनुगुणीभूय द्रव्यं कुर्वन्ति पार्थिवं क्षुद्राः । क्रीडारसेन नर्तयन्तौ मयूरतां नयन्ति बालिशाः । दर्पणमिवानुपविश्यात्मीयां प्रकृतिं संक्राम- ऊष्मणा च दाहशक्त्या । वंशा वेणवः । निकटस्थो म्लानीक्रियते न तु दूरस्थ इति विरोधः । निर्वपणं शमनम् । योग्या अभ्यासः । अभ्यर्णः प्रत्यासन्नः शब्दः । प्रादुर्भावः ख्यातिः । प्रथमं प्रधानभूतम् । प्रायेणेति । क्षुद्राः प्रायेण समवायेषु मन्त्रेष्वनुगुणीभूय यथा क्षुद्रा अल्पपरिमाणाः परमाणवः पार्थिवं पृथिव्यादिजातीयं घटादिद्रव्यं कुर्वन्ति । कथं समवायेष्वनुगुणीभूयायुतसिद्धानामाधाराधेयभूतानामिह प्रत्ययहेतुः। संयोगः समवायः । यथा तन्तुषु पट इति । कार्यस्य द्रव्यस्यावयविन आरम्भं प्रतियोगीभावोऽनुगुणत्वम् । मयूरो धूर्तजनयोग्यो हासो वा, शिखण्डी च । बालिशा धूर्ताः, कुमाराश्च । बालका हि क्रीडारसेन मयूरं नर्तयन्ते । अनुप्रविश्य से दूर से ही म्लान कर देते थे। प्रतिदिन शस्त्र के अभ्यास करने से दाग पड़े हुए और समस्त राजाओं को प्रतापाग्नि को बुझाने से मलिन अपने दोनों करतलों को धारण करते थे । अभ्यास-काल में धनुष की गम्भीर टंकार से मानों निकट में उपभोग की भावना से दिगङ्गनाओं के साथ बातचीत करते थे । राज्यवर्धन और हर्ष इन दोनों शब्दों का प्रादुर्भाव सारी पृथिवी में हो गया । एक समय भोजन करने के बाद दोनों पुत्रों को पिता ने बुलाकर स्नेह के साथ कहा—'बच्चे, अच्छे सचिव ही राज्य के प्रधान अङ्ग होते हैं । 'जैसे छोटे-छोटे परमाणु समवाय सम्बन्ध से एकत्र होकर पार्थिव द्रव्य को उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार क्षुद्र प्रकृति के लोग खुशामद की बात करके राजा को साधारण जन बना देते हैं । धूर्त लोग विविध क्रीड़ाओं के आनन्द में उसे फँसाकर मयूर के समान उसे नचाने लगते हैं । चट्टे-बट्टे लोग दर्पण के समान उसमें प्रवेश करके अपनी प्रकृति को उसमें संक्रान्त कर देते हैं । ठग विद्या में निपुण लोग झूठ-मूठ की बातों को दिखाकर उसकी बुद्धि को खराब कर
चतुर्थ उच्छ्वासः २२६ यन्ति पल्लविकाः । स्वप्ना इव मिथ्यादर्शनैरसद्बुद्धिं जनयन्ति विप्रल- म्भकाः । गीतनृत्यहसितैरुन्मत्ततामावहन्त्यपेक्षिता विकारा इव वातिकाः । चातका इव तृष्णावन्तो न शक्यन्ते ग्रहीतुमकुलीनाः । मानसे मीनमिव स्फुरन्तमेवाभिप्रायं गृह्णन्ति जालिकाः । यमपट्टिका इवाम्बरे चित्रमालि- खन्त्युद्गीतकाः । शल्यं हृदये निक्षिपन्त्यतिमार्गणाः । यतः सर्वैरेभिर्दोषा- भिषङ्गैरसंगतौ बहुधोपधाभिः परीक्षितौ शुची विनीतौ विक्रान्तावभिरूपौ मालवराजपुत्रौ भ्रातरौ भुजाविव मे शरीराद्व्यतिरिक्तं कुमारगुप्तमाधव- चित्तरञ्जनां कृत्वा, आसाद्य च प्रकृतिं स्वभावम्, शरीरं च । पल्लविका विटाः, किसलयानि च । मिथ्यादर्शनैरसदागमैः, अलीकवस्तुप्रकाशनैश्च । असतीमशोभनां बुद्धिम्, असत्यविद्यमाने च बुद्धिः । विप्रलम्भकाः प्रतारकाः । वातिका धूर्ताः, वातोत्थिताश्च । तृष्णा धनगर्धा, पिपासा च । ग्रहीतुमावर्जयितुम्, अवलब्धुं च । अकुलीना अकुलोद्गताः । को भूमौ न निलीनाश्चाकाशचारित्वात् । मानसे चित्ते, सरोभेदे च । स्फुरन्तमुत्पद्यमानम् । अनुत्पन्नाभिभवमिति यावत् । सति कार्ये हि सर्व एवाभिप्रायं लक्षयति । एतेऽत्र प्रागेव । अन्यत्र, -च चलन्तम् । जालिकाः कौसृतिकाः, कैवर्ताश्च । यमपट्टिका गृहीतपट्टलिखितसपरिवारधर्मराजाः । अम्बर आकाशे, वस्त्रे चाम्बरे । चित्रमालिखन्तीति । असंभाव्यमानानर्थानारभन्त इति यावत् । अन्यत्र,-चित्रमालेख्यम् । उद्गीतका उच्चतरत्वादुच्चैर्गीतं येषां ते च । शल्यमिव शल्यं पीडा, फलिका च । अतिमार्गणा अतिक्रम्य ये संश्रयन्ते, अन्यथा महाभागिनोऽस्य वक्तुरनुचितेयमुक्तिः स्यात् । तेनानुरूपसंभवमविच्छिन्नं च । मार्गणमतिमार्गणम्, मार्गणाः शराश्च । हृदये शल्यं फलिकामर्पयन्ति । अभिषङ्गः संपर्कः । उपधा भृत्यस्य धर्मादिविषयः परीक्षणोपायः । उक्तं च—'उपेत्याधीयते यस्मादुपधेति ततः स्मृता । उपाय उपधा ज्ञेया तया भृत्यान्परीक्षयेत् ॥' इति । विक्रान्तौ शूरौ । अभिरूपौ सुन्दरौ । डालते हैं । अपेक्षित होने पर वायुजन्य व्याधि के समान ये धूर्त नाच, गाना और हँसी-मजाक से पागल बना देते हैं । चातकों के समान धन के प्यासे ये ऐरे-गैरे लोग साथ नहीं देते । ये चालबाज लोग मानस में मत्स्य के ससान ऊपर की ओर उचकते ही अभिप्राय पकड़ लेते हैं । यमदूतों के समान ये उचकें लोग आकाश में चित्रकारी करते हैं अर्थात् बिना किसी सम्भावना के एकाएक अनिष्ट कर बैठते हैं । बाणों के समान छिद्रान्वेषी प्रकृति के ये लोग हृदय में पीड़ा उत्पन्न करते हैं। इसलिए इन सब दोषों के लगाव से सर्वथा दूर रहने वाले, बहुत प्रकार के उपायों से परीक्षित, पवित्र, विनम्र,
२३० हर्षचरितम् गुप्तनामानावस्माभिर्भवतोरनुचरत्वार्थमिमौ निर्दिष्टौ । अनयोरुपरि भवद्भयामपि नान्यपरिजनसमवृत्तिभ्यां भवितव्यम्,' इत्युक्त्वा तयोराह्वा- नाय प्रतीहारमादिदेश । न चिराद्द्वारदेशनिहितलोचनौ राज्यवर्धनहर्षौ प्रतीहारेण सह प्रवि- शन्तम्, अग्रतो ज्येष्ठमष्टादशवर्षवयसं नात्युच्चं नातिखर्वमतिगुरुभिः पदन्यासैरनेकनरपतिसंचरणचलां निश्चलीकुर्वाणमिवोर्वीम्, अनवरताभ्य- स्तसङ्घनघनोपचयकठिनमांसमेदुरादूरुद्वयान्निष्पततेवानुल्बणजानुग्रन्थिप्र- सूतेन तनुतरजङ्घाकाण्डयुगलेन भासमानम्, उल्लिखितपार्श्वप्रकाशितक्र- शिम्ना मन्दरमिव सुरासुररभसभ्रमितवासुकिकषणक्षीणेन मध्येन लक्ष्य- माणम्, अतिविस्तीर्णेनोरसा स्वामिसंभावनानामपरिमितानामवकाशमिव प्रयच्छन्तम्, प्रलम्बमानस्य भुजयुगलस्य निभृतललितैर्विक्षेपैरतिदुस्तरं तरन्तमिव यौवनोदधिम्, वामकरकटकमाणिक्यमरीचिमञ्जरीशालिन्या समुद्भिद्यमानप्रतापानलशिखापल्लवयेव चापगुणकिणलेखयाङ्कितपीवरप्र- कोष्ठम्, आलोहिनीमुत्सांसतटावलम्बिनीमस्त्रग्रहणव्रतविधृतां रौरवीमिव न चिरादित्यादौ । राज्यवर्धनहर्षौ प्रतीहारेण सह प्रविशन्तमग्रतो ज्येष्ठं कुमा- रगुप्तं पृष्ठतश्च तस्य कनीयांसं नीतिमत्त्वं प्रकाशितम् । खर्वं वामनम् । मेदुरात्पु- ष्टात् । अनुल्वणोऽनुद्धतः । उल्लिखितमिवोल्लिखितं तनूकृतम् । रुरुर्मृगभेदस्तस्येयं शूर, सुन्दर, मालवराज के पुत्र कुमारगुप्त और माधवगुप्त नाम के दो भाई, जो मेरी दोनों भुजाओं के समान मेरे शरीर से अलग नहीं, मैंने तुम्हारे अनुचर के रूप में नियुक्त किये हैं । इन दोनों के साथ आप लोग भी सामान्य परिजनों जैसा व्यवहार नहीं रखेंगे ।' यह कहकर राजा ने उन दोनों को बुला लाने के लिये आदेश दिया । कुछ ही देर में द्वार की ओर आँख लगाये राज्यवर्धन और हर्ष ने आगे आगे अठारह वर्ष की अवस्था के जेठे, न अधिक नाटे न अधिक लम्बे, प्रतिहार के साथ प्रवेश करते हुये कुमारगुप्त को देखा । वह मानों अनेक राजाओं के चलने से हिलती हुई पृथिवी को गम्भीर पदविन्यास से निश्चल बना रहा था । हमेशा लांघने के अभ्यास से उसके दोनों ऊरुकाण्ड भर जाने से कड़े और गंसे हुये थे । उसके सुघड़ ठेहुने से निकली हुयी पतली सी छरहरी जाँघें शोभित हो रही थीं । उसका मध्य भाग देवता और दानवों द्वारा घुमाये गये वासुकि सर्प की रगड़ खाकर मन्दराचल के समान कृश लग रहा था मानों खराद पर चढ़ाया गया हो । अपनी चौड़ी छाती से वह मानों स्वामी के अपरिचित स्नेह सद्भाव के रहने के लिये अवकाश दे रहा था । लम्बी-लम्बी सुघड़ अपनी दोनों
चतुर्थ उच्छ्वासः २३१ त्यचं कर्णाभरणमयोः प्रभां बिभ्राणम्, उत्कोटिकेयरपत्रभङ्गपुत्रिकाप्रति- बिम्बगर्भकपोलं मुखं चन्द्रमसमिव हृदयस्थितरोहिणीकमुद्वहन्तम्, अच- पलस्तिमिततारकेणाधोमुखेन चक्षुषा शिक्षयन्तमिव लक्ष्मोलाभोत्तानि- मुखानि पङ्कजवनानि विनयम्, स्वाम्यनुरागमिवाम्लातकमृत्तंसीकृतं शिरसा धारयन्तम्, निर्दयया कङ्कणभङ्गभीतसकलकार्मुकार्पितामिव नम्रतां प्रकाशयन्तम्, शैशव एव निर्जितैरिन्द्रियैररिभिरिव संयतैः शोभ- मानम्, प्रणयिनीमिव विश्वासभूमिं कुलपुत्रतामनुवर्तमानम्, तेजस्विनमपि शीलेनाह्लादकेन सवितारमिव शशिनान्तर्गतेन विराजमानम्, अचला- नामपि कायकार्कशयेन गन्धनमिवाचरन्तम्, दर्शनक्रीतमानन्दहस्ते विक्री- णानमिव जनं सौभाग्येन कुमारगुप्तम्, पृष्ठतस्तस्य कनीयांसमतिप्रांशुतया
रौरवी ताम् । अम्लातकं पुष्पभेदम्, कुरण्टिकापुष्पभेदं वा । उत्तंसीकृतं शेखरतां नीतम् । शीलेनाप्यन्तर्गतेन । एतेन चास्या दाम्भिकत्वमुक्तम् । गन्धनं मर्दनम्; उद्दाहनं वा । दृष्टमेव जनं वश्यमेव सर्वं करोतीति दर्शनक्रीतता । क्रीतमावर्जि- तम् । पुनश्चानन्दोत्पादनद्वारेणानन्दवन्तं तच्छरणं करोतीति । तत्र विक्रियोत्प्रेक्षा- यत्तु वस्तु केनचिदर्थेन क्रीतं तदप्यन्यस्य विक्रीत इत्युक्तम् । विक्रीणानमिति । भुजाओं को हिलाते हुये वह मानों अत्यन्त दुस्तर यौवन रूपी समुद्र पर तैर रहा था। उसके बायें हाथ में धनुष की डोर से रगड़ पड़ने के कारण काली-सी रेखा थी जिस पर उस हाथ के विजयट के रत्न की किरणें पड़ रहीं थीं, मानों प्रकट होते हुये प्रतापानल की पल्लवाकार शिखा हो । ऊँचे कन्धे से लटकती हुयी कान के आभरण-मणि की लाल प्रभा को धारण कर रहा था मानो अस्त्र ग्रहण करने के लिये धारण की गयी रुरु मृग के चमड़े की पेटी हो । खड़ी कोर वाले केयूर में पत्रलता सहित पुतली की छाया से गर्भित कपोल वाला मुख रोहिणी को हृदय में लिये हुये चन्द्रमा की भाँति धारण कर रहा था। उसकी आँखें झुकी हुयी और पुतलियाँ स्थिर थीं, मानों लक्ष्मी के लोभ से सिर ऊँचा किये कमलों को विनय की सीख दे रहा था। अम्लातक नामक लाल पुष्प को उत्तंस बनाकर सिर से स्वामी के अनुराग के रूप में धारण कर रहा था। निर्दयता के कारण कंकण के टूट जाने के कारण डरे हुये धनुष की नम्रता को प्रकाशित कर रहा था। बाल्यकाल में ही शत्रुओं के समान जीते जाने पर संयत हुई इन्द्रियों से शोभित हो रहा था। प्रेयसी के समान विश्वास करने योग्य अपनी कुलीनता को व्यक्त कर रहा था। जैसे चन्द्रमा सूर्य को अपने अन्तर्गत कर लेता है उसी प्रकार तेजस्वी होकर भी वह अपने आह्लादक शील गुण से शोभ रहा था। उसकी देह इतनी कड़ी थी कि पहाड़ों को
२३२ हर्षचरितम् गौरतया च मनःशिलाशैलमिव संचरन्तम्, अनुल्बणमालतीकुसुमशेखर- निभेन निर्जिगमिषता गुरुणा शिरशि चुम्बितमिव यशसा परस्परविरुद्ध- योर्विनययौवनयोश्चिरात्प्रथमसंगमचिह्नमिव भ्रूसंगतकेन कथयन्तम्, अति- धीरतया हृदयनिहितां स्वामिभक्तिमिव निश्चलां दृष्टिं धारयन्तम्, अच्छा- च्छचन्दनरसानुलेपनशीतलं संनिहितहारोपधानं वक्षःस्थलमन्तसामन्त- संक्रान्तिक्रान्तायाः श्रियो विशालं शशिमणिशिलापट्टशयनमिव बिभ्राणम्, चक्षुः कुरङ्गकैर्घोणावंशं वराहैः स्कन्धपीठं महिषैः प्रकोष्ठबन्धं व्याघ्रैः पराक्रमं केसरिभिर्गमनं मतङ्गजैर्मृगयाक्षपितशेषैर्भीतैरुत्कोचमिव दत्तं दर्शयन्तं माधवगुप्तं ददृशतुः । प्रविश्य च तौ दूरादेव चतुर्भिरङ्गैरुत्तमाङ्गेन च गां स्पृशन्तौ नमश्च- गौरतयेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया । शेखरस्यानुल्बणत्वं विनयं वक्ति । गुरुणा भूयि- ष्ठेन । चुम्बितमधिष्ठितम् । गुरुणा च पित्रा निर्गच्छता पुनः शिरसि चुम्ब्यते । भ्रूसंगत कं विनयम्, उपधानं गण्डकम् । विशालं प्रशस्तम् । विशाले चाङ्गानि प्रसार्यन्ते । शीतलत्वाच्चाङ्गनिर्वृतिः । घोणा नासिका एव स्पष्टत्वाद्वंशस्तम् । उत्को- चमिवेति । दण्डमित्यर्थः । चतुर्भिरङ्गैरिति । जानुभ्यां हस्ताभ्यां चोत्तमाङ्गेन मूर्ध्ना । भूमितौ च । भी मसल डालने की क्षमता रख रहा था । दर्शन देकर खरीदे गये की तरह अपने वश में हुये लोगों को सौभाग्य के द्वारा आनन्द के हाथ मानों बेंच रहा था । उसके पीछे पीछे अवस्था में छोटे लेकिन उसकी अपेक्षा लम्बे और गोरे मैनसिल के पर्वत के समान आते हुये माधवगुप्त को देखा । वह सुन्दर मालती के फूलों के शेखर के रूप में, निकलते हुए यश की भाँति अपनी भौंहों के संगतक ( सम्मेलन ) से मानों परस्पर विरुद्ध विनय और यौवन के पहले-पहल हुए एकत्र संगम को व्यक्त कर रहा था । हृदय में निहित स्वामी की भक्ति के रूप में अत्यन्त धीर स्वभाव के कारण निश्चल दृष्टि को धारण कर रहा था । सफेद चन्दन के रस से शीतल और लटकते हुए मोटे हार से युक्त वक्षःस्थल को मानों वह अनेक सामन्तों पर संक्रमण करने से थकी हुई लक्ष्मी के विश्राम के लिए गोल तकिए की तरह हार से युक्त शिलापट्ट के पलंग के समान धारण कर रहा था । आखेट में मारे जाने से बचे हुए मृगों ने घूस के रूप में मानों उसे आँखें, वराहों ने नाक, भैंसों ने स्कन्धपीठ, बाघों ने कलाई, शेरों ने पराक्रम, गजों ने चाल आदि दिए थे, जिन्हें वह दिखा रहा था । प्रवेश करके उन दोनों ने दूर ही से अपने चार अङ्गों के साथ सिर से पृथिवी का
चतुर्थ उच्छ्वासः २३३ ऋतुः । स्निग्धनेरेन्द्रदृष्टिनिर्दिष्टामुचितां भूमिं भेजाते । मुहूर्तं च स्थित्वा भूपतिरादिदेश तौ—'अद्यप्रभृति भवद्भ्यां कुमारावनुवर्तनीयौ' इति । 'यथाज्ञापयति देवः' इति मेदिनीदोलायमानमौलिभ्यामुत्थाय राज्यवर्ध- नहर्षौ प्रणेमतुः । तौ च पितरम् । ततश्चारभ्य क्षणमपि निमेषोन्मेषा- विव चक्षुर्गोचरादनपयान्तावुच्छ्वासनिःश्वासाविव नक्तंदिवमभिमुखस्थितौ भुजाविव सततपार्श्ववर्तिनौ कुमारयोस्तौ बभूवतुः । अथ राज्यश्रीरपि नृत्तगीतादिषु विदग्धासु सखीषु सकलासु कलासु च प्रतिदिनमुपचीयमानपरिचया शनैः शनैरवर्धत । परिमितैरेव दिव- सैर्यौवनमारुरोह । निपेतुरेकस्यां तस्यां शरा इव लक्ष्यभुवि भूभुजां सर्वेषां दृष्टयः । दूतसंप्रेषणादिभिश्च तां ययाचिरे राजानः । कदाचित्तु राजान्तःपुरप्रासादस्थितो बाह्यकक्ष्यावस्थितेन पुरुषेण स्वप्रस्तावागतां गीयमानामार्यामशृणोत्— पितरमिति । तौ च राज्यवर्धनहर्षौ लब्धानुचरावभिवन्दनाय पितरं प्रणेमतुरित्यर्थः । विदग्धासु प्रवीणासु, ग्राम्यासु च । स्पर्श करते हुए पञ्चाङ्ग प्रणाम किया। तब राजा की स्नेह भरी दृष्टि से दिखाए गए उचित स्थान पर बैठे। क्षण भर ठहर कर राजा ने उनको आदेश दिया—'आज से आप दोनों राजकुमारों के अनुगामी हुए।' 'आपकी जो आज्ञा' यह कहकर पृथिवी की ओर सिर झुकाते हुए दोनों ने उठकर राज्यवर्धन और हर्ष को प्रणाम किया। इन दोनों ने भी अपने पिता को प्रणाम किया। उसी समय से लेकर पलक के निमेष-उन्मेष के समान क्षण भर भी वे दोनों राजकुमारों की आँखों से ओझल नहीं होते, उच्छ्वास और निःश्वास के समान रात दिन अभिमुख रहते और भुजाओं के समान हमेशा अगल बगल में निवास करते। इधर राज्यश्री भी नृत्य और गीत आदि कलाओं में निपुण अपनी सखियों के बीच समस्त कलाओं में प्रतिदिन अपना परिचय बढ़ाती हुई शनैः शनैः बढ़ने लगी और कुछ ही दिनों में यौवन को प्राप्त हुई। जैसे बाण एक ही लक्ष्य पर गिरते हैं उसी प्रकार उसके ऊपर समस्त राजाओं की आँखें पड़ गईं। अपने अपने दूत आदि पठाकर राजा लोग उसकी याचना करने लगे। एक दिन जब राजा प्रभाकरवर्धन अपने अन्तःपुर के कोठे पर विराजमान थे, तभी उन्होंने बाहरी ड्योढ़ी पर नियुक्त किसी पुरुष के द्वारा अपनी बातचीत के प्रसङ्ग में गायी गयी आर्या को सुना—
२३४ हर्षचरितम् 'उद्वेगमहावर्ते पातयति पयोधरोन्नमनकाले । सरिदिव तटमनुवर्षं विवर्धमाना सुता पितरम् ॥ ५ ॥' तां च श्रुत्वा पार्श्वस्थितां महादेवीमुत्सारितपरिजनों जगाद—'देवि ! तरुणीभूता वत्सा राज्यश्रीः । एतदीया गुणवत्तेव क्षणमपि हृदयान्ना- पयाति मे चिन्ता । यौवनारम्भ एव च कन्यकानाम इन्धनीभवन्ति पितरः संतापानलस्य । हृदयमन्धकारयति मे दिवसमिव पयोधरोन्नतिरस्याः । केनापि कृता धर्म्या नाभिमता मे स्थितिरियं यदङ्गसंभूतान्यङ्कपालिता- न्यपरित्याज्यान्यपत्यकान्यकाण्ड एवागत्यासंस्तुतैर्नीयन्ते । एतानि तानि खल्वङ्कनस्थानानि संसारस्य । सेयं सर्वाभिभाविनी शोकाग्नेर्दाहशक्ति- र्यदपत्यत्वे समानेऽपि जातायां दुहितरि दूयन्ते सन्तः । एतदर्थं जन्म- काल एव कन्यकाभ्यः प्रयच्छन्ति सलिलमश्रुभिः साधवः । एतद्भयाद्- कृतदारपरिग्रहाः परिहृतगृहवसतयः शून्यान्यरण्यान्यधिशेरते मुनयः । को हि नाम सहेत सचेतनो विरहमपत्यानाम् । यथा यथा समापतन्ति दूता उद्वेगो मानसी पीडा तस्यावर्त्तनमावर्तो जलभ्रमणम् । तत्र पयोधरशब्दः स्तनमेघयोः । अनुवर्षं वर्षे, प्रावृषि च । असंस्तुतैरपरिचितैः । दौःशील्यं चिह्नम् । वराकी तपस्विनी । अभिजनं कुलम् । सकलेत्यादि साधारणम् । 'नदी जैसे वर्षाकाल में मेघों के झुकने पर अपने तट को गिरा देती है वैसे ही स्तनों के बढ़ने के अवसर में यौवन को प्राप्त हुई कन्या पिता को चिन्ता में ढकेल देती है।' उसे सुनकर राजा ने परिजनों को हटाकर बगल में बैठी हुयी महारानी से कहा— 'देवी, वत्सा राज्यश्री अब यौवन को प्राप्त हुयी। इसके गुणों के समान इसकी चिन्ता मेरे हृदय से नहीं जा रही है। यौवन के आरम्भ होते ही पिता कन्याओं के सन्ताप की अग्नि के ईन्धन बन जाते हैं। जैसे मेघ आकाश में उठकर दिन को अन्धकार से भर देते हैं वैसे ही इसके स्तनों की उन्नति मेरे हृदय को अन्धकार से भर रही है। जिस किसी द्वारा की हुयी इसके पति होने की धार्मिक मर्यादा मुझे अच्छी नहीं लगती क्योंकि असमय में आकर ही ऐसे अपरिचित लोग अपने अङ्ग से उत्पन्न, गोद में रख पाली-पोसी हुयी, न त्यागने के योग्य सन्तानों को उठाकर ले जाते हैं। सचमुच ये सब कुरीतियाँ इस युग के कलंक हैं। इसी कारण सबको अभिभूत कर देने वाली शोकाग्नि की जला डालने वाली शक्ति है जो कि सन्तान की दृष्टि से बराबर होने पर भी अच्छे लोग कन्या के उत्पन्न होने पर खुशी नहीं मनाते। इसी कारण सज्जन लोग जन्म लेते ही कन्याओं को अपने आँसू के जल ही समर्पित करते हैं। इसी डर से स्त्री का पाणिग्रहण किये बिना ही घर-द्वार
चतुर्थ उच्छ्वासः २३५ वराजां वराकी लज्जमानेव चिन्ता तथा तथा नितरां प्रविशति मे हृदयम्। किं क्रियते। तथापि गृहगतैरनुगन्तव्या एव लोकवृत्तयः। प्रायेण च सत्स्वप्यन्येषु वरगुणेष्वभिजनमेवानुरुध्यन्ते धीमन्तः। धरणीधराणां च मूर्ध्नि स्थितो माहेश्वरः पादन्यास इव सकलभुवननमस्कृतो मौखरो वंशः। तत्रापि तिलकभूतस्यावन्तिवर्मणः सूनुरग्रजो ग्रहवर्मा नाम ग्रहपतिरिव गां गतः पितुरन्यूनो गुणैरेनां प्रार्थयते। यदि भवत्या अपि मतिरनुमन्यते ततस्तस्मै दातुमिच्छामि' इत्युक्तवति भर्तरि दुहितृस्नेहकातरतरहृदया साश्रुलोचना महादेवी प्रत्युवाच—'आर्यपुत्र! संवर्धनमात्रोपयोगिन्यो धात्रीनिर्विशेषा भवन्ति खलु मातरः कन्याकानाम्। दाने तु प्रमाणमासां पितरः। केवलं कृपाकृतविशेषः सुदूरेण तनयस्नेहादतिरिच्यते दुहितृ- स्नेहः। यथा नेयं यावज्जीवमावयोरार्तितां प्रतिपद्यते तथार्यपुत्र एव जानाति' इति। राजा तु जातनिश्चयो दुहितृदानं प्रति समाहूय सुतावपि विदिताथौ-
आर्तिता मनःपीडात्वम्।
छोड़-छाड़कर मुनि लोग सुनसान जङ्गलों में शयन करते हैं। कौन ऐसा सचेतन प्राणी है जो अपनी सन्तानों के विरह सहे। जैसे-जैसे वरों के दूत पर दूत आते जा रहे हैं यह वराकी चिन्ता वैसे-वैसे ही लजाती हुयी की तरह मेरे हृदय में घर करती जा रही है। तो फिर क्या किया जाय ? तब भी गृहस्थ होने के कारण समाज के नियमों के पीछे चलना पड़ता है। बुद्धिमान् लोग वर के गुणों में प्रायः कुलीनता पसन्द करते हैं। शिवजी के चरणन्यास की भाँति सब राजाओं का सिरमौर और सब लोगों द्वारा नमस्कृत मौखरि क्षत्रियों का वंश है। उसमें भी सबसे बड़े अवन्तिवर्मा हैं जिनका प्रथम पुत्र ग्रहवर्मा सूर्य के समान है। वह अपने पिता से गुणों में कम नहीं। उसने राज्यश्री के लिये प्रार्थना की है। यदि तुम भी स्वीकार करो तो मैं उसे सौंपना चाहता हूँ।' पति के ऐसा कहने पर पुत्री के स्नेह से अधीर हृदय वाली महादेवी ने रोते हुए कहा—'आर्यपुत्र, मातायें केवल धाय की भाँति कन्याओं को बढ़ाने मात्र के उपयोग में आती हैं। कन्यादान में तो उनके पिता ही प्रमाण हैं। केवल बिछुड़ जाने की दया के कारण पुत्रस्नेह से कन्यास्नेह दूर बढ़ जाता है। जिस उपाय से यह हम दोनों के जीते जी मानसिक व्यथा नहीं बन रही है वह उपाय आर्यपुत्र ही जानते हैं।' राजा ने अपना निश्चय कर लिया और कन्यादान की बात अपने दोनों पुत्रों को भी बुलाकर सुना दी और तब शुभ मुहूर्त में ग्रहवर्मा के द्वारा कन्या की प्रार्थना के लिए भेजे
२३६ हर्षचरितम् चकार्षीत् । शोभने च दिवसे ग्रहवर्मणा कन्यां प्रार्थयितुं प्रेषितस्य पूर्वा- गतस्यैव प्रधानदूतपुरुषस्य करे सर्वराजकुलसमक्षं दुहितृदानजलमपातयत् । जातमुदि कृतार्थे गते च तस्मिन्नासन्नेषु च विवाहदिवसेष्वामदीय- मानताम्बूलपटवासकुसुमप्रसाधितसर्वलोकम् , सकलदेशादिश्यमान- शिल्पिसार्थगमनम् , अवनिपालपुरुषगृहीतसमग्रग्रामीणानीयमानोप- करणसंभारम् , राजदौवारिकोपनीयमानानेকনृपोपायनम् , उपनिम- न्त्रिागतबन्धुवर्गसंवर्गणव्यग्रराजवल्लभम् , लब्धमधुमदप्रचण्डचर्मकार- करपुटोल्लालितकोणपटुविघटनरणन्मङ्गलपटहम् , पिष्टपञ्चाङ्गुलमण्ड्यमा- नोलूखलमुसलशिलाद्युपकरणम् , अशोषाशामुखाविर्भूतचारणपरम्परापूर्य- माणप्रकोष्ठप्रतिष्ठाप्यमानेन्द्राणीदैवतम् , सितकुसुमविलेपनवसनसत्कृतैः सूत्रधारैरादीयमानविवाहवेदीसूत्रपातम् , उत्कूर्चककरैश्च सुधाकर्पूरस्कन्धै- रधिरोहिणीसमारूढैर्धवैर्धवलीक्रियमाणप्रासादप्रतोलीप्राकारशिखरम् , क्षु- जातमुदीत्यादौ । एवं राजकुलमासीदिति संबन्धः । ग्रामीणा ग्राम्याः । राजदौ- वारिका दूताः । संवर्गणमावर्तनम् । पिष्टमातर्पणम् । चारणाः कुशीलवाः । प्रकोष्ठं बहिर्द्वारम् । सूत्रधारैः स्थपतिभिः । अधिरोहिणी निःश्रेणिः । धवैः पुरुषैः । क्षुण्णश्वू- जाने पर पहले से ही आये हुए प्रधान दूत के हाथ पर समस्त राजकुल की उपस्थिति में कन्यादान का जल गिराया । वह दूत प्रसन्न और कृतकृत्य होकर लौट गया । विवाह के दिन भी निकट आए । राजकुल की ओर से आम तौर पर सब लोगों की खातिर के लिए पान के बीड़े, कपड़े की सुगन्धि और फूल बाँटे जाने लगे । दूसरे देशों से कारीगर बुलाइट पर आने लगे । राजा के नियुक्त सैनिक गाँव वालों को पकड़-पकड़कर उनसे सब सामग्री उठवाकर लाने लगे । राजा के दौवारिक अनेक राजाओं के दिए हुए तरह-तरह के उपहारों को लाकर रखने लगे । निमन्त्रित होकर आए हुए रिश्तेदारों को आदरपूर्वक राजा के प्रिय पात्र लोग ठहराने के काम में व्यस्त थे । शराब के नशे में धुत्त होकर ढोल बजाने वाला चमार डंका लिए हुए धमाधम ढोल पीट रहा था । ओखली, मूसर और सिल आदि पत्थर की सामग्री जुटाकर उन पर ऐपन के थापे दिए जाने लगे । अनेक दिशाओं से दूर दूर से आए हुए चारण लोग जिस कोठरी में जमा थे उसमें इन्द्राणी की मूर्ति के रूप में दई- देवता पधराए गए थे । सफेद फूल, चन्दन और वस्त्र पाकर आदर पाए हुए सूत्रधार ( मिस्त्री लोग ) विवाह की वेदी बनाने में सूत से नाप-तौल करने लगे । पोतने वाले
ण्प्रक्षाल्यमानकुसुम्भसंभाराम्भःप्लवपूरज्यमानजनपादपल्लवम् , निरू- प्यमाणयौतकयोग्यमातङ्गतुरङ्गतराङ्किताङ्गनम् , गणनाभियुक्तगणकगणगृह्य- माणलग्नगुणम् , गन्धोदकवाहिमकरमुखप्रणालीपूर्यमाणक्रीडावापीसमू- हम् , हेमकारचक्रप्रक्रान्तहाटकघटनटङ्कारवाचालितालिन्दकम् , उत्था- पिताभिनवभित्तिपात्यमानबहलवालुकाकण्ठकालेपाकुलालेपकलोकम् , च- तुरचित्रकरचक्रवाललिख्यमानमङ्गल्यालेख्यम् , लेप्यकारकदम्वकक्रियमाण- मृन्मयमोनकूर्ममकरनारिकेलकदलीपूगवृक्षकम् , क्षितिपालैश्च स्वयमाबद्ध- कक्ष्यैः स्वाम्यर्पितकर्मशोभासंपादनाकुलैः सिन्दूरकुट्टिमभूमीश्च मसृणय- द्भिर्विनिहितसरसातर्पणहस्तान्विन्यस्तालक्तकपाटलांश्च चूताशोकपल्लवला- ञ्छितशिखरामुद्वाहवितर्दिकास्तम्भानुत्तम्भयद्भिः प्रारब्धविविधव्यापारम् , आसूर्योदयाच्च प्रविष्टाभिः सतीभिः सुभगाभिः सुरूपाभिः सुवेशाभिरविध-
र्णितः । कुसुम्भकं पद्म कम् । प्लवः पूरः । यौतकं सुदायः । प्रणालं वाप्यादिपूर- णार्थं मकरमुखं कुर्वन्ति । लग्नो मेषादिः । अलिन्दो बहिर्द्वारप्रकोष्ठः । कण्ठकाः
मजदूरे हाथ में कूंची लिए, कन्धों से चूने की हंडी लटकाए, सीढ़ी पर चढ़कर राजमहल, पौरो, चहारदीवारी और शिखरों पर सफेदी कर रहे थे । पीसे जाते हुए कुंकुम के धोने से बहते हुए जल में आने जाने वाले के पैर रँग रहे थे । दहेज में देने योग्य हाथी-घोड़े आँगन में भरे हुए थे, उन्हें जाँचा जा रहा था । गणना में लगे हुए ज्योतिषी विवाह योग्य सुन्दर लग्न शोध रहे थे । मगर के मुँह की नली से गन्धजल बहकर क्रीड़ा की बौलियों में भर रहा था । राजद्वार की ड्योढ़ी के बाहर सोना गढ़ने में जुटे हुए सोनारों की ठक-ठक वहाँ भर रही थी । जो नई दीवारें वहाँ उठायी गयी थीं उन पर बालू मिले हुए मसाले का पलस्तर करने वाले मजदूरों के शरीर बालू के कण गिरने से सन गये थे । चित्रकारी में प्रवीण चित्रकार लोग मांगलिक चित्र बना रहे थे । खिलौने बनाने वाले कुम्हार मछली, कछुआ, मगर, नारियल, केला, सुपारी के वृक्ष आदि तरह तरह के मिट्टी के खिलौने बना रहे थे । कछ बाँधकर स्वयं राजा लोग मालिक के द्वारा मिले हुए काम को आकुलता के साथ कर रहे थे, जैसे कुछ सिंदूरी रंग के फर्श को माँजकर चमका रहे थे, कुछ ब्याह की बेदी के खम्भों को अपने हाथ से खड़ा कर रहे थे, कुछ ने उन्हें गीले ऐपन के थापों, आलता के रङ्ग में रंगे लाल कपड़ों और आम एवं अशोक के पल्लवों से सजाया था । इस प्रकार वे अनेक कामों में लग गए थे । सामन्तों की सती रूपवती स्त्रियाँ सुहावने वेश पहने और माथे पर सेन्दुर लगाय, सौभाग्य से अलंकृत होकर सूर्योदय से ही लेकर राजमहल के काम-काज में लग गयी थीं, कुछ वर-वधू के नाम ले-लेकर मङ्गलाचार के
२३८ हर्षचरितम् वाभिः सिन्दूररजोराजिराजितललाटाभिर्वधूबरगोत्रग्रहणगर्भाणि श्रुतिसुभ- गानि मङ्गलानि गायन्तीभिर्बहुविधवर्णकादिग्धाम्गुलीभिर्ग्रीवासूत्राणि च चित्रयन्तीभिश्चित्रतालेख्यकुशलाभिः कलशांश्च धवलिताञ्शीतलशारा- जिरश्रेणीञ्च मण्डयन्तीभिरभिञ्जपुटकपायतूलपल्लवांश्च वैवाहिककङ्कणोर्णा- सूत्रसंनाहांश्च रञ्जयन्तीभिर्बलाशनाघृतघनीकृतकुङ्कुमकल्कमिश्रितांश्चाङ्ग- रागांल्लावण्यविशेषकृन्ति च मुखालेपनानि कल्पयन्तीभिः ककोलमित्राः सजातीफलाः स्फुरत्स्फीतस्फाटिककर्पूरशकलखचितान्तराला लवङ्गमाला रचयन्तीभिः समन्तात्सामन्तसीमन्तिनीभिर्व्याप्तम्, बहुविधभक्तिनिर्मा- णनिपुणपुराणपौरपुरंध्रीबध्यमानैर्बद्धैश्चाचारचतुरान्तःपुरजरतीजनितपूजा- राजमानरजकरज्यमानै रक्तैश्चोभयपटान्तलग्नपरिजनप्रेङ्खोलितैश्छायासु कणाः । आबद्धकक्ष्यैः कृतोद्योगैः । मसृणयद्भिश्चिक्कणीकुर्वद्भिः । आतर्पणं पिष्टम् । उत्तम्भयद्भिरूर्ध्वीकुर्वद्भिः । गोत्रं नाम । दिग्धा उपलिप्ताः । शीतलपक्वम् । शाराजिरं शरावम् । अभिञ्जपुटो वंशादिमयश्चतुष्कोणः पाटलाकृतिर्जालकैः क्रियते । तच्छिद्रान्तरपूरणाय कर्पासतूलपल्लवा रच्यन्ते । कङ्कणः प्रतिसरः । बलाशना पुष्पा- ख्यौषधिः तत्पक्वं घृतं रक्षार्थं क्रियते । स्फाटिककर्पूराख्यः कर्पूरभेदः । भक्तिर्वि- च्छित्तिः । कुटिलः क्रमो येषां तैः । भुजिष्यैर्भृत्यैः । भज्यमानत्वं मुष्टिदानम् । गीत गा रही थीं, कुछ तरह-तरह के रंगों में उंगलियों बोर कर कण्ठियों के डोरों पर भाँति-भाँति की बिन्दियाँ लगा रही थीं, चित्र-विचित्र फूल-पत्तियों के काम करने में चतुर कुछ स्त्रियाँ सफेदी किए हुए कलसों पर और सरइयों पर चित्र लिख रही थीं, • कुछ बाँस की तीलियों या सरकण्डे के बने खारे को सजाने के लिये कपास के छोटे-छोटे गुच्छे और ब्याह के कंगनों के लिए ऊनी और सूती लच्छियाँ रँग रही थीं, कुछ बलाशना नामक औषधि घी में पकाकर और उसे पिसे हुए कुङ्कुम में मिलाकर उबटन एवं सुन्दरता • बढ़ाने वाले मुखालेपन तैयार कर रही थीं, कुछ कङ्कोल-जायफल और लौंग की मालायें बीच-बीच में स्फटिक जैसे श्वेतकपूर की चमकदार बड़ी डलियां पिरोकर बना रही थीं । बहुत प्रकार की भक्तियों के निर्माण में नगर की वृद्ध चतुर स्त्रियों या पुरखिनें बांधनू की रंगाई के लिए कपड़ों को बाँध रही थीं, कुछ कपड़े बाँधे जा चुके थे । अन्तःपुर की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के द्वारा रंगने वालों को जो नेग या पूजा-भेंट दी जा रही थी उससे प्रसन्न होकर वे लोग उन वस्त्रों को रँग रहे थे, एवं जो रँगे जा चुके थे उन्हें दोनों सिरों पर • पकड़कर परिजन लोग झकझोर कर छाया में सुखा रहे थे और कुछ सूख गए थे । एक
चतुर्थ उच्छ्वासः २३६ शोष्यमाणैः शुष्कैश्च कुटिलक्रमरूपक्रियमाणपल्लवपरभागैरपरैरारब्धकुङ्कु- मपङ्कस्थासकच्छुरणैरपरैरुद्भुजभुजिष्यभज्यमानभङ्गुरोत्तरीयैः क्षौमैश्च बाद- रैश्च दुकूलैश्च लालातन्तुजैश्चांशुकैश्च नेत्रैश्च निर्मोकनिभैरकठोररम्भागर्भ- कोमलैर्निःश्वासहार्यैः स्पर्शानुमेयैर्वासोभिः सर्वतः स्फुरद्भिरिन्द्रायुधस- हस्रैरिव संच्छादितम्, उज्ज्वलनिचोलकावगुण्ठ्यमानहंसकुलैश्च शयनीयै- स्तारामुक्ताफलोपचीयमानैश्च कञ्चुकैरनेकोपयोगपाट्यमानैश्चापरिमितैः प- ट्पटीसहस्रैरभिनवरागकोमलदुकूलराजमानैश्च पटवितानैः स्तवरकनिव- हनिरन्तरच्छाद्यमानसमस्तपटलैश्च मण्डपैरूचित्रनेत्रपटवेष्ट्यमानैश्च स्त- म्भैरुज्ज्वलं रमणीयं चौत्सुक्यदं च मङ्गल्यं चासीद्राजकुलम् । देवी तु यशोमती विवाहोत्सवपर्याकुलहृदया हृदयेन भर्तरि, कुतूहलेन क्षौमैः क्षुमाविकारैः । बादरैः कार्पासैः । लालातन्तुजैः कौशेयैः । नेत्रैः पुट्टैः (?) । निचोलकैर्वस्तुरूपकविशेषैः । स्तवरकं वस्त्रभेदः । वितानकं करकम् । पटलं छाद- नम् । उज्ज्वलं भ्राजिष्णु । कोने स दूसरे कोने तक टेढ़ी, ठप्पों से बनाई जाने वाला फूल-पत्तियों का रेखाकृतयाँ एक रङ्ग की पृष्ठभूमि पर दूसरे रंग में तैयार होने लगीं। कुछ वस्त्रों को गीले कुङ्कुम में रंगे हाथ से चित्तियाँ छोपकर मांगलिक बनाया जा रहा था। कुछ को सेवक लोग उठे हुए हाथों से चुटकी दबाकर उत्तरीय या ऊपरने की तरह प्रयुक्त वस्त्रों में चुन्नट डालकर उन्हें मरोड़ी देकर देख रहे थे। क्षौम, बादर (कपास के बने कपड़े), दुकूल, लाला- तंतुज (रेशमी) अंशुक और नेत्र आदि कई प्रकार के वस्त्र थे, जो साँप की केंचुली के समान हल्के केले के खम्भे की भीतरी पात के समान कोमल, साँस की हवा से भी उड़ जाने वाले एवं केवल छूकर ही अनुमान करने योग्य थे। हजारों इन्द्रायुष के समान ऐसे वस्त्रों से राजकुल ढंक रहा था। दान-दहेज के लिए बनाये गये पलंग पर सफेद चादरें बिछाई गयी थीं और हंसों की पंक्तियाँ लकड़ी में खोदकर बनायी गयीं थीं। पहनने के लिये जो कंचुक तैयार किये जा रहे थे, उन पर चमकीले मोतियों से कढ़ाई का काम किया गया था। अनेक प्रकार के उपयोग में आने वाली बहुत सी कपड़ों की पट्टियां चीर-चीर कर बनायी जा रही थीं। कपड़े के चन्दोवे में नये एकरङ्ग के दुकूल लगाये जा रहे थे। मढ़वे की छाजन फूल-पत्तियों से ढँक गयी थी। मण्डप के खम्भों में रंगीन नेत्र नामक वस्त्र लपेटकर बाँधे जा रहे थे। इस प्रकार राजकुल का यह दृश्य चकमक, रमणीय, भाँति-भाँति के कुतूहलों से भरा हुआ और मांगलिक हो गया था। रानी यशोवती को विवाह के बहुविध कामों में चैन नहीं मिलती थी। वह पति