भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 280

चतुर्थ उच्छ्वासः २३५ वराजां वराकी लज्जमानेव चिन्ता तथा तथा नितरां प्रविशति मे हृदयम्। किं क्रियते। तथापि गृहगतैरनुगन्तव्या एव लोकवृत्तयः। प्रायेण च सत्स्वप्यन्येषु वरगुणेष्वभिजनमेवानुरुध्यन्ते धीमन्तः। धरणीधराणां च मूर्ध्नि स्थितो माहेश्वरः पादन्यास इव सकलभुवननमस्कृतो मौखरो वंशः। तत्रापि तिलकभूतस्यावन्तिवर्मणः सूनुरग्रजो ग्रहवर्मा नाम ग्रहपतिरिव गां गतः पितुरन्यूनो गुणैरेनां प्रार्थयते। यदि भवत्या अपि मतिरनुमन्यते ततस्तस्मै दातुमिच्छामि' इत्युक्तवति भर्तरि दुहितृस्नेहकातरतरहृदया साश्रुलोचना महादेवी प्रत्युवाच—'आर्यपुत्र! संवर्धनमात्रोपयोगिन्यो धात्रीनिर्विशेषा भवन्ति खलु मातरः कन्याकानाम्। दाने तु प्रमाणमासां पितरः। केवलं कृपाकृतविशेषः सुदूरेण तनयस्नेहादतिरिच्यते दुहितृ- स्नेहः। यथा नेयं यावज्जीवमावयोरार्तितां प्रतिपद्यते तथार्यपुत्र एव जानाति' इति। राजा तु जातनिश्चयो दुहितृदानं प्रति समाहूय सुतावपि विदिताथौ-

आर्तिता मनःपीडात्वम्।

छोड़-छाड़कर मुनि लोग सुनसान जङ्गलों में शयन करते हैं। कौन ऐसा सचेतन प्राणी है जो अपनी सन्तानों के विरह सहे। जैसे-जैसे वरों के दूत पर दूत आते जा रहे हैं यह वराकी चिन्ता वैसे-वैसे ही लजाती हुयी की तरह मेरे हृदय में घर करती जा रही है। तो फिर क्या किया जाय ? तब भी गृहस्थ होने के कारण समाज के नियमों के पीछे चलना पड़ता है। बुद्धिमान् लोग वर के गुणों में प्रायः कुलीनता पसन्द करते हैं। शिवजी के चरणन्यास की भाँति सब राजाओं का सिरमौर और सब लोगों द्वारा नमस्कृत मौखरि क्षत्रियों का वंश है। उसमें भी सबसे बड़े अवन्तिवर्मा हैं जिनका प्रथम पुत्र ग्रहवर्मा सूर्य के समान है। वह अपने पिता से गुणों में कम नहीं। उसने राज्यश्री के लिये प्रार्थना की है। यदि तुम भी स्वीकार करो तो मैं उसे सौंपना चाहता हूँ।' पति के ऐसा कहने पर पुत्री के स्नेह से अधीर हृदय वाली महादेवी ने रोते हुए कहा—'आर्यपुत्र, मातायें केवल धाय की भाँति कन्याओं को बढ़ाने मात्र के उपयोग में आती हैं। कन्यादान में तो उनके पिता ही प्रमाण हैं। केवल बिछुड़ जाने की दया के कारण पुत्रस्नेह से कन्यास्नेह दूर बढ़ जाता है। जिस उपाय से यह हम दोनों के जीते जी मानसिक व्यथा नहीं बन रही है वह उपाय आर्यपुत्र ही जानते हैं।' राजा ने अपना निश्चय कर लिया और कन्यादान की बात अपने दोनों पुत्रों को भी बुलाकर सुना दी और तब शुभ मुहूर्त में ग्रहवर्मा के द्वारा कन्या की प्रार्थना के लिए भेजे