हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ हर्षचरितम् 'उद्वेगमहावर्ते पातयति पयोधरोन्नमनकाले । सरिदिव तटमनुवर्षं विवर्धमाना सुता पितरम् ॥ ५ ॥' तां च श्रुत्वा पार्श्वस्थितां महादेवीमुत्सारितपरिजनों जगाद—'देवि ! तरुणीभूता वत्सा राज्यश्रीः । एतदीया गुणवत्तेव क्षणमपि हृदयान्ना- पयाति मे चिन्ता । यौवनारम्भ एव च कन्यकानाम इन्धनीभवन्ति पितरः संतापानलस्य । हृदयमन्धकारयति मे दिवसमिव पयोधरोन्नतिरस्याः । केनापि कृता धर्म्या नाभिमता मे स्थितिरियं यदङ्गसंभूतान्यङ्कपालिता- न्यपरित्याज्यान्यपत्यकान्यकाण्ड एवागत्यासंस्तुतैर्नीयन्ते । एतानि तानि खल्वङ्कनस्थानानि संसारस्य । सेयं सर्वाभिभाविनी शोकाग्नेर्दाहशक्ति- र्यदपत्यत्वे समानेऽपि जातायां दुहितरि दूयन्ते सन्तः । एतदर्थं जन्म- काल एव कन्यकाभ्यः प्रयच्छन्ति सलिलमश्रुभिः साधवः । एतद्भयाद्- कृतदारपरिग्रहाः परिहृतगृहवसतयः शून्यान्यरण्यान्यधिशेरते मुनयः । को हि नाम सहेत सचेतनो विरहमपत्यानाम् । यथा यथा समापतन्ति दूता उद्वेगो मानसी पीडा तस्यावर्त्तनमावर्तो जलभ्रमणम् । तत्र पयोधरशब्दः स्तनमेघयोः । अनुवर्षं वर्षे, प्रावृषि च । असंस्तुतैरपरिचितैः । दौःशील्यं चिह्नम् । वराकी तपस्विनी । अभिजनं कुलम् । सकलेत्यादि साधारणम् । 'नदी जैसे वर्षाकाल में मेघों के झुकने पर अपने तट को गिरा देती है वैसे ही स्तनों के बढ़ने के अवसर में यौवन को प्राप्त हुई कन्या पिता को चिन्ता में ढकेल देती है।' उसे सुनकर राजा ने परिजनों को हटाकर बगल में बैठी हुयी महारानी से कहा— 'देवी, वत्सा राज्यश्री अब यौवन को प्राप्त हुयी। इसके गुणों के समान इसकी चिन्ता मेरे हृदय से नहीं जा रही है। यौवन के आरम्भ होते ही पिता कन्याओं के सन्ताप की अग्नि के ईन्धन बन जाते हैं। जैसे मेघ आकाश में उठकर दिन को अन्धकार से भर देते हैं वैसे ही इसके स्तनों की उन्नति मेरे हृदय को अन्धकार से भर रही है। जिस किसी द्वारा की हुयी इसके पति होने की धार्मिक मर्यादा मुझे अच्छी नहीं लगती क्योंकि असमय में आकर ही ऐसे अपरिचित लोग अपने अङ्ग से उत्पन्न, गोद में रख पाली-पोसी हुयी, न त्यागने के योग्य सन्तानों को उठाकर ले जाते हैं। सचमुच ये सब कुरीतियाँ इस युग के कलंक हैं। इसी कारण सबको अभिभूत कर देने वाली शोकाग्नि की जला डालने वाली शक्ति है जो कि सन्तान की दृष्टि से बराबर होने पर भी अच्छे लोग कन्या के उत्पन्न होने पर खुशी नहीं मनाते। इसी कारण सज्जन लोग जन्म लेते ही कन्याओं को अपने आँसू के जल ही समर्पित करते हैं। इसी डर से स्त्री का पाणिग्रहण किये बिना ही घर-द्वार