भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

चतुर्थ उच्छ्वासः २३३ ऋतुः । स्निग्धनेरेन्द्रदृष्टिनिर्दिष्टामुचितां भूमिं भेजाते । मुहूर्तं च स्थित्वा भूपतिरादिदेश तौ—'अद्यप्रभृति भवद्भ्यां कुमारावनुवर्तनीयौ' इति । 'यथाज्ञापयति देवः' इति मेदिनीदोलायमानमौलिभ्यामुत्थाय राज्यवर्ध- नहर्षौ प्रणेमतुः । तौ च पितरम् । ततश्चारभ्य क्षणमपि निमेषोन्मेषा- विव चक्षुर्गोचरादनपयान्तावुच्छ्वासनिःश्वासाविव नक्तंदिवमभिमुखस्थितौ भुजाविव सततपार्श्ववर्तिनौ कुमारयोस्तौ बभूवतुः । अथ राज्यश्रीरपि नृत्तगीतादिषु विदग्धासु सखीषु सकलासु कलासु च प्रतिदिनमुपचीयमानपरिचया शनैः शनैरवर्धत । परिमितैरेव दिव- सैर्यौवनमारुरोह । निपेतुरेकस्यां तस्यां शरा इव लक्ष्यभुवि भूभुजां सर्वेषां दृष्टयः । दूतसंप्रेषणादिभिश्च तां ययाचिरे राजानः । कदाचित्तु राजान्तःपुरप्रासादस्थितो बाह्यकक्ष्यावस्थितेन पुरुषेण स्वप्रस्तावागतां गीयमानामार्यामशृणोत्— पितरमिति । तौ च राज्यवर्धनहर्षौ लब्धानुचरावभिवन्दनाय पितरं प्रणेमतुरित्यर्थः । विदग्धासु प्रवीणासु, ग्राम्यासु च । स्पर्श करते हुए पञ्चाङ्ग प्रणाम किया। तब राजा की स्नेह भरी दृष्टि से दिखाए गए उचित स्थान पर बैठे। क्षण भर ठहर कर राजा ने उनको आदेश दिया—'आज से आप दोनों राजकुमारों के अनुगामी हुए।' 'आपकी जो आज्ञा' यह कहकर पृथिवी की ओर सिर झुकाते हुए दोनों ने उठकर राज्यवर्धन और हर्ष को प्रणाम किया। इन दोनों ने भी अपने पिता को प्रणाम किया। उसी समय से लेकर पलक के निमेष-उन्मेष के समान क्षण भर भी वे दोनों राजकुमारों की आँखों से ओझल नहीं होते, उच्छ्वास और निःश्वास के समान रात दिन अभिमुख रहते और भुजाओं के समान हमेशा अगल बगल में निवास करते। इधर राज्यश्री भी नृत्य और गीत आदि कलाओं में निपुण अपनी सखियों के बीच समस्त कलाओं में प्रतिदिन अपना परिचय बढ़ाती हुई शनैः शनैः बढ़ने लगी और कुछ ही दिनों में यौवन को प्राप्त हुई। जैसे बाण एक ही लक्ष्य पर गिरते हैं उसी प्रकार उसके ऊपर समस्त राजाओं की आँखें पड़ गईं। अपने अपने दूत आदि पठाकर राजा लोग उसकी याचना करने लगे। एक दिन जब राजा प्रभाकरवर्धन अपने अन्तःपुर के कोठे पर विराजमान थे, तभी उन्होंने बाहरी ड्योढ़ी पर नियुक्त किसी पुरुष के द्वारा अपनी बातचीत के प्रसङ्ग में गायी गयी आर्या को सुना—