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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

चतुर्थ उच्छ्वासः २३३ ऋतुः । स्निग्धनेरेन्द्रदृष्टिनिर्दिष्टामुचितां भूमिं भेजाते । मुहूर्तं च स्थित्वा भूपतिरादिदेश तौ—'अद्यप्रभृति भवद्भ्यां कुमारावनुवर्तनीयौ' इति । 'यथाज्ञापयति देवः' इति मेदिनीदोलायमानमौलिभ्यामुत्थाय राज्यवर्ध- नहर्षौ प्रणेमतुः । तौ च पितरम् । ततश्चारभ्य क्षणमपि निमेषोन्मेषा- विव चक्षुर्गोचरादनपयान्तावुच्छ्वासनिःश्वासाविव नक्तंदिवमभिमुखस्थितौ भुजाविव सततपार्श्ववर्तिनौ कुमारयोस्तौ बभूवतुः । अथ राज्यश्रीरपि नृत्तगीतादिषु विदग्धासु सखीषु सकलासु कलासु च प्रतिदिनमुपचीयमानपरिचया शनैः शनैरवर्धत । परिमितैरेव दिव- सैर्यौवनमारुरोह । निपेतुरेकस्यां तस्यां शरा इव लक्ष्यभुवि भूभुजां सर्वेषां दृष्टयः । दूतसंप्रेषणादिभिश्च तां ययाचिरे राजानः । कदाचित्तु राजान्तःपुरप्रासादस्थितो बाह्यकक्ष्यावस्थितेन पुरुषेण स्वप्रस्तावागतां गीयमानामार्यामशृणोत्— पितरमिति । तौ च राज्यवर्धनहर्षौ लब्धानुचरावभिवन्दनाय पितरं प्रणेमतुरित्यर्थः । विदग्धासु प्रवीणासु, ग्राम्यासु च । स्पर्श करते हुए पञ्चाङ्ग प्रणाम किया। तब राजा की स्नेह भरी दृष्टि से दिखाए गए उचित स्थान पर बैठे। क्षण भर ठहर कर राजा ने उनको आदेश दिया—'आज से आप दोनों राजकुमारों के अनुगामी हुए।' 'आपकी जो आज्ञा' यह कहकर पृथिवी की ओर सिर झुकाते हुए दोनों ने उठकर राज्यवर्धन और हर्ष को प्रणाम किया। इन दोनों ने भी अपने पिता को प्रणाम किया। उसी समय से लेकर पलक के निमेष-उन्मेष के समान क्षण भर भी वे दोनों राजकुमारों की आँखों से ओझल नहीं होते, उच्छ्वास और निःश्वास के समान रात दिन अभिमुख रहते और भुजाओं के समान हमेशा अगल बगल में निवास करते। इधर राज्यश्री भी नृत्य और गीत आदि कलाओं में निपुण अपनी सखियों के बीच समस्त कलाओं में प्रतिदिन अपना परिचय बढ़ाती हुई शनैः शनैः बढ़ने लगी और कुछ ही दिनों में यौवन को प्राप्त हुई। जैसे बाण एक ही लक्ष्य पर गिरते हैं उसी प्रकार उसके ऊपर समस्त राजाओं की आँखें पड़ गईं। अपने अपने दूत आदि पठाकर राजा लोग उसकी याचना करने लगे। एक दिन जब राजा प्रभाकरवर्धन अपने अन्तःपुर के कोठे पर विराजमान थे, तभी उन्होंने बाहरी ड्योढ़ी पर नियुक्त किसी पुरुष के द्वारा अपनी बातचीत के प्रसङ्ग में गायी गयी आर्या को सुना—

२३४ हर्षचरितम् 'उद्वेगमहावर्ते पातयति पयोधरोन्नमनकाले । सरिदिव तटमनुवर्षं विवर्धमाना सुता पितरम् ॥ ५ ॥' तां च श्रुत्वा पार्श्वस्थितां महादेवीमुत्सारितपरिजनों जगाद—'देवि ! तरुणीभूता वत्सा राज्यश्रीः । एतदीया गुणवत्तेव क्षणमपि हृदयान्ना- पयाति मे चिन्ता । यौवनारम्भ एव च कन्यकानाम इन्धनीभवन्ति पितरः संतापानलस्य । हृदयमन्धकारयति मे दिवसमिव पयोधरोन्नतिरस्याः । केनापि कृता धर्म्या नाभिमता मे स्थितिरियं यदङ्गसंभूतान्यङ्कपालिता- न्यपरित्याज्यान्यपत्यकान्यकाण्ड एवागत्यासंस्तुतैर्नीयन्ते । एतानि तानि खल्वङ्कनस्थानानि संसारस्य । सेयं सर्वाभिभाविनी शोकाग्नेर्दाहशक्ति- र्यदपत्यत्वे समानेऽपि जातायां दुहितरि दूयन्ते सन्तः । एतदर्थं जन्म- काल एव कन्यकाभ्यः प्रयच्छन्ति सलिलमश्रुभिः साधवः । एतद्भयाद्- कृतदारपरिग्रहाः परिहृतगृहवसतयः शून्यान्यरण्यान्यधिशेरते मुनयः । को हि नाम सहेत सचेतनो विरहमपत्यानाम् । यथा यथा समापतन्ति दूता उद्वेगो मानसी पीडा तस्यावर्त्तनमावर्तो जलभ्रमणम् । तत्र पयोधरशब्दः स्तनमेघयोः । अनुवर्षं वर्षे, प्रावृषि च । असंस्तुतैरपरिचितैः । दौःशील्यं चिह्नम् । वराकी तपस्विनी । अभिजनं कुलम् । सकलेत्यादि साधारणम् । 'नदी जैसे वर्षाकाल में मेघों के झुकने पर अपने तट को गिरा देती है वैसे ही स्तनों के बढ़ने के अवसर में यौवन को प्राप्त हुई कन्या पिता को चिन्ता में ढकेल देती है।' उसे सुनकर राजा ने परिजनों को हटाकर बगल में बैठी हुयी महारानी से कहा— 'देवी, वत्सा राज्यश्री अब यौवन को प्राप्त हुयी। इसके गुणों के समान इसकी चिन्ता मेरे हृदय से नहीं जा रही है। यौवन के आरम्भ होते ही पिता कन्याओं के सन्ताप की अग्नि के ईन्धन बन जाते हैं। जैसे मेघ आकाश में उठकर दिन को अन्धकार से भर देते हैं वैसे ही इसके स्तनों की उन्नति मेरे हृदय को अन्धकार से भर रही है। जिस किसी द्वारा की हुयी इसके पति होने की धार्मिक मर्यादा मुझे अच्छी नहीं लगती क्योंकि असमय में आकर ही ऐसे अपरिचित लोग अपने अङ्ग से उत्पन्न, गोद में रख पाली-पोसी हुयी, न त्यागने के योग्य सन्तानों को उठाकर ले जाते हैं। सचमुच ये सब कुरीतियाँ इस युग के कलंक हैं। इसी कारण सबको अभिभूत कर देने वाली शोकाग्नि की जला डालने वाली शक्ति है जो कि सन्तान की दृष्टि से बराबर होने पर भी अच्छे लोग कन्या के उत्पन्न होने पर खुशी नहीं मनाते। इसी कारण सज्जन लोग जन्म लेते ही कन्याओं को अपने आँसू के जल ही समर्पित करते हैं। इसी डर से स्त्री का पाणिग्रहण किये बिना ही घर-द्वार

चतुर्थ उच्छ्वासः २३५ वराजां वराकी लज्जमानेव चिन्ता तथा तथा नितरां प्रविशति मे हृदयम्। किं क्रियते। तथापि गृहगतैरनुगन्तव्या एव लोकवृत्तयः। प्रायेण च सत्स्वप्यन्येषु वरगुणेष्वभिजनमेवानुरुध्यन्ते धीमन्तः। धरणीधराणां च मूर्ध्नि स्थितो माहेश्वरः पादन्यास इव सकलभुवननमस्कृतो मौखरो वंशः। तत्रापि तिलकभूतस्यावन्तिवर्मणः सूनुरग्रजो ग्रहवर्मा नाम ग्रहपतिरिव गां गतः पितुरन्यूनो गुणैरेनां प्रार्थयते। यदि भवत्या अपि मतिरनुमन्यते ततस्तस्मै दातुमिच्छामि' इत्युक्तवति भर्तरि दुहितृस्नेहकातरतरहृदया साश्रुलोचना महादेवी प्रत्युवाच—'आर्यपुत्र! संवर्धनमात्रोपयोगिन्यो धात्रीनिर्विशेषा भवन्ति खलु मातरः कन्याकानाम्। दाने तु प्रमाणमासां पितरः। केवलं कृपाकृतविशेषः सुदूरेण तनयस्नेहादतिरिच्यते दुहितृ- स्नेहः। यथा नेयं यावज्जीवमावयोरार्तितां प्रतिपद्यते तथार्यपुत्र एव जानाति' इति। राजा तु जातनिश्चयो दुहितृदानं प्रति समाहूय सुतावपि विदिताथौ-

आर्तिता मनःपीडात्वम्।

छोड़-छाड़कर मुनि लोग सुनसान जङ्गलों में शयन करते हैं। कौन ऐसा सचेतन प्राणी है जो अपनी सन्तानों के विरह सहे। जैसे-जैसे वरों के दूत पर दूत आते जा रहे हैं यह वराकी चिन्ता वैसे-वैसे ही लजाती हुयी की तरह मेरे हृदय में घर करती जा रही है। तो फिर क्या किया जाय ? तब भी गृहस्थ होने के कारण समाज के नियमों के पीछे चलना पड़ता है। बुद्धिमान् लोग वर के गुणों में प्रायः कुलीनता पसन्द करते हैं। शिवजी के चरणन्यास की भाँति सब राजाओं का सिरमौर और सब लोगों द्वारा नमस्कृत मौखरि क्षत्रियों का वंश है। उसमें भी सबसे बड़े अवन्तिवर्मा हैं जिनका प्रथम पुत्र ग्रहवर्मा सूर्य के समान है। वह अपने पिता से गुणों में कम नहीं। उसने राज्यश्री के लिये प्रार्थना की है। यदि तुम भी स्वीकार करो तो मैं उसे सौंपना चाहता हूँ।' पति के ऐसा कहने पर पुत्री के स्नेह से अधीर हृदय वाली महादेवी ने रोते हुए कहा—'आर्यपुत्र, मातायें केवल धाय की भाँति कन्याओं को बढ़ाने मात्र के उपयोग में आती हैं। कन्यादान में तो उनके पिता ही प्रमाण हैं। केवल बिछुड़ जाने की दया के कारण पुत्रस्नेह से कन्यास्नेह दूर बढ़ जाता है। जिस उपाय से यह हम दोनों के जीते जी मानसिक व्यथा नहीं बन रही है वह उपाय आर्यपुत्र ही जानते हैं।' राजा ने अपना निश्चय कर लिया और कन्यादान की बात अपने दोनों पुत्रों को भी बुलाकर सुना दी और तब शुभ मुहूर्त में ग्रहवर्मा के द्वारा कन्या की प्रार्थना के लिए भेजे

२३६ हर्षचरितम् चकार्षीत् । शोभने च दिवसे ग्रहवर्मणा कन्यां प्रार्थयितुं प्रेषितस्य पूर्वा- गतस्यैव प्रधानदूतपुरुषस्य करे सर्वराजकुलसमक्षं दुहितृदानजलमपातयत् । जातमुदि कृतार्थे गते च तस्मिन्नासन्नेषु च विवाहदिवसेष्वामदीय- मानताम्बूलपटवासकुसुमप्रसाधितसर्वलोकम् , सकलदेशादिश्यमान- शिल्पिसार्थगमनम् , अवनिपालपुरुषगृहीतसमग्रग्रामीणानीयमानोप- करणसंभारम् , राजदौवारिकोपनीयमानानेকনृपोपायनम् , उपनिम- न्त्रिागतबन्धुवर्गसंवर्गणव्यग्रराजवल्लभम् , लब्धमधुमदप्रचण्डचर्मकार- करपुटोल्लालितकोणपटुविघटनरणन्मङ्गलपटहम् , पिष्टपञ्चाङ्गुलमण्ड्यमा- नोलूखलमुसलशिलाद्युपकरणम् , अशोषाशामुखाविर्भूतचारणपरम्परापूर्य- माणप्रकोष्ठप्रतिष्ठाप्यमानेन्द्राणीदैवतम् , सितकुसुमविलेपनवसनसत्कृतैः सूत्रधारैरादीयमानविवाहवेदीसूत्रपातम् , उत्कूर्चककरैश्च सुधाकर्पूरस्कन्धै- रधिरोहिणीसमारूढैर्धवैर्धवलीक्रियमाणप्रासादप्रतोलीप्राकारशिखरम् , क्षु- जातमुदीत्यादौ । एवं राजकुलमासीदिति संबन्धः । ग्रामीणा ग्राम्याः । राजदौ- वारिका दूताः । संवर्गणमावर्तनम् । पिष्टमातर्पणम् । चारणाः कुशीलवाः । प्रकोष्ठं बहिर्द्वारम् । सूत्रधारैः स्थपतिभिः । अधिरोहिणी निःश्रेणिः । धवैः पुरुषैः । क्षुण्णश्वू- जाने पर पहले से ही आये हुए प्रधान दूत के हाथ पर समस्त राजकुल की उपस्थिति में कन्यादान का जल गिराया । वह दूत प्रसन्न और कृतकृत्य होकर लौट गया । विवाह के दिन भी निकट आए । राजकुल की ओर से आम तौर पर सब लोगों की खातिर के लिए पान के बीड़े, कपड़े की सुगन्धि और फूल बाँटे जाने लगे । दूसरे देशों से कारीगर बुलाइट पर आने लगे । राजा के नियुक्त सैनिक गाँव वालों को पकड़-पकड़कर उनसे सब सामग्री उठवाकर लाने लगे । राजा के दौवारिक अनेक राजाओं के दिए हुए तरह-तरह के उपहारों को लाकर रखने लगे । निमन्त्रित होकर आए हुए रिश्तेदारों को आदरपूर्वक राजा के प्रिय पात्र लोग ठहराने के काम में व्यस्त थे । शराब के नशे में धुत्त होकर ढोल बजाने वाला चमार डंका लिए हुए धमाधम ढोल पीट रहा था । ओखली, मूसर और सिल आदि पत्थर की सामग्री जुटाकर उन पर ऐपन के थापे दिए जाने लगे । अनेक दिशाओं से दूर दूर से आए हुए चारण लोग जिस कोठरी में जमा थे उसमें इन्द्राणी की मूर्ति के रूप में दई- देवता पधराए गए थे । सफेद फूल, चन्दन और वस्त्र पाकर आदर पाए हुए सूत्रधार ( मिस्त्री लोग ) विवाह की वेदी बनाने में सूत से नाप-तौल करने लगे । पोतने वाले

ण्प्रक्षाल्यमानकुसुम्भसंभाराम्भःप्लवपूरज्यमानजनपादपल्लवम् , निरू- प्यमाणयौतकयोग्यमातङ्गतुरङ्गतराङ्किताङ्गनम् , गणनाभियुक्तगणकगणगृह्य- माणलग्नगुणम् , गन्धोदकवाहिमकरमुखप्रणालीपूर्यमाणक्रीडावापीसमू- हम् , हेमकारचक्रप्रक्रान्तहाटकघटनटङ्कारवाचालितालिन्दकम् , उत्था- पिताभिनवभित्तिपात्यमानबहलवालुकाकण्ठकालेपाकुलालेपकलोकम् , च- तुरचित्रकरचक्रवाललिख्यमानमङ्गल्यालेख्यम् , लेप्यकारकदम्वकक्रियमाण- मृन्मयमोनकूर्ममकरनारिकेलकदलीपूगवृक्षकम् , क्षितिपालैश्च स्वयमाबद्ध- कक्ष्यैः स्वाम्यर्पितकर्मशोभासंपादनाकुलैः सिन्दूरकुट्टिमभूमीश्च मसृणय- द्भिर्विनिहितसरसातर्पणहस्तान्विन्यस्तालक्तकपाटलांश्च चूताशोकपल्लवला- ञ्छितशिखरामुद्वाहवितर्दिकास्तम्भानुत्तम्भयद्भिः प्रारब्धविविधव्यापारम् , आसूर्योदयाच्च प्रविष्टाभिः सतीभिः सुभगाभिः सुरूपाभिः सुवेशाभिरविध-


र्णितः । कुसुम्भकं पद्म कम् । प्लवः पूरः । यौतकं सुदायः । प्रणालं वाप्यादिपूर- णार्थं मकरमुखं कुर्वन्ति । लग्नो मेषादिः । अलिन्दो बहिर्द्वारप्रकोष्ठः । कण्ठकाः


मजदूरे हाथ में कूंची लिए, कन्धों से चूने की हंडी लटकाए, सीढ़ी पर चढ़कर राजमहल, पौरो, चहारदीवारी और शिखरों पर सफेदी कर रहे थे । पीसे जाते हुए कुंकुम के धोने से बहते हुए जल में आने जाने वाले के पैर रँग रहे थे । दहेज में देने योग्य हाथी-घोड़े आँगन में भरे हुए थे, उन्हें जाँचा जा रहा था । गणना में लगे हुए ज्योतिषी विवाह योग्य सुन्दर लग्न शोध रहे थे । मगर के मुँह की नली से गन्धजल बहकर क्रीड़ा की बौलियों में भर रहा था । राजद्वार की ड्योढ़ी के बाहर सोना गढ़ने में जुटे हुए सोनारों की ठक-ठक वहाँ भर रही थी । जो नई दीवारें वहाँ उठायी गयी थीं उन पर बालू मिले हुए मसाले का पलस्तर करने वाले मजदूरों के शरीर बालू के कण गिरने से सन गये थे । चित्रकारी में प्रवीण चित्रकार लोग मांगलिक चित्र बना रहे थे । खिलौने बनाने वाले कुम्हार मछली, कछुआ, मगर, नारियल, केला, सुपारी के वृक्ष आदि तरह तरह के मिट्टी के खिलौने बना रहे थे । कछ बाँधकर स्वयं राजा लोग मालिक के द्वारा मिले हुए काम को आकुलता के साथ कर रहे थे, जैसे कुछ सिंदूरी रंग के फर्श को माँजकर चमका रहे थे, कुछ ब्याह की बेदी के खम्भों को अपने हाथ से खड़ा कर रहे थे, कुछ ने उन्हें गीले ऐपन के थापों, आलता के रङ्ग में रंगे लाल कपड़ों और आम एवं अशोक के पल्लवों से सजाया था । इस प्रकार वे अनेक कामों में लग गए थे । सामन्तों की सती रूपवती स्त्रियाँ सुहावने वेश पहने और माथे पर सेन्दुर लगाय, सौभाग्य से अलंकृत होकर सूर्योदय से ही लेकर राजमहल के काम-काज में लग गयी थीं, कुछ वर-वधू के नाम ले-लेकर मङ्गलाचार के

२३८ हर्षचरितम् वाभिः सिन्दूररजोराजिराजितललाटाभिर्वधूबरगोत्रग्रहणगर्भाणि श्रुतिसुभ- गानि मङ्गलानि गायन्तीभिर्बहुविधवर्णकादिग्धाम्‍गुलीभिर्ग्रीवासूत्राणि च चित्रयन्तीभिश्चित्रतालेख्यकुशलाभिः कलशांश्च धवलिताञ्शीतलशारा- जिरश्रेणीञ्च मण्डयन्तीभिरभिञ्जपुटकपायतूलपल्लवांश्च वैवाहिककङ्कणोर्णा- सूत्रसंनाहांश्च रञ्जयन्तीभिर्बलाशनाघृतघनीकृतकुङ्कुमकल्कमिश्रितांश्चाङ्ग- रागांल्लावण्यविशेषकृन्ति च मुखालेपनानि कल्पयन्तीभिः ककोलमित्राः सजातीफलाः स्फुरत्स्फीतस्फाटिककर्पूरशकलखचितान्तराला लवङ्गमाला रचयन्तीभिः समन्तात्सामन्तसीमन्तिनीभिर्व्याप्तम्, बहुविधभक्तिनिर्मा- णनिपुणपुराणपौरपुरंध्रीबध्यमानैर्बद्धैश्चाचारचतुरान्तःपुरजरतीजनितपूजा- राजमानरजकरज्यमानै रक्तैश्चोभयपटान्तलग्नपरिजनप्रेङ्खोलितैश्छायासु कणाः । आबद्धकक्ष्यैः कृतोद्योगैः । मसृणयद्भिश्चिक्कणीकुर्वद्भिः । आतर्पणं पिष्टम् । उत्तम्भयद्भिरूर्ध्वीकुर्वद्भिः । गोत्रं नाम । दिग्धा उपलिप्ताः । शीतलपक्वम् । शाराजिरं शरावम् । अभिञ्जपुटो वंशादिमयश्चतुष्कोणः पाटलाकृतिर्जालकैः क्रियते । तच्छिद्रान्तरपूरणाय कर्पासतूलपल्लवा रच्यन्ते । कङ्कणः प्रतिसरः । बलाशना पुष्पा- ख्यौषधिः तत्पक्वं घृतं रक्षार्थं क्रियते । स्फाटिककर्पूराख्यः कर्पूरभेदः । भक्तिर्वि- च्छित्तिः । कुटिलः क्रमो येषां तैः । भुजिष्यैर्भृत्यैः । भज्यमानत्वं मुष्टिदानम् । गीत गा रही थीं, कुछ तरह-तरह के रंगों में उंगलियों बोर कर कण्ठियों के डोरों पर भाँति-भाँति की बिन्दियाँ लगा रही थीं, चित्र-विचित्र फूल-पत्तियों के काम करने में चतुर कुछ स्त्रियाँ सफेदी किए हुए कलसों पर और सरइयों पर चित्र लिख रही थीं, • कुछ बाँस की तीलियों या सरकण्डे के बने खारे को सजाने के लिये कपास के छोटे-छोटे गुच्छे और ब्याह के कंगनों के लिए ऊनी और सूती लच्छियाँ रँग रही थीं, कुछ बलाशना नामक औषधि घी में पकाकर और उसे पिसे हुए कुङ्कुम में मिलाकर उबटन एवं सुन्दरता • बढ़ाने वाले मुखालेपन तैयार कर रही थीं, कुछ कङ्कोल-जायफल और लौंग की मालायें बीच-बीच में स्फटिक जैसे श्वेतकपूर की चमकदार बड़ी डलियां पिरोकर बना रही थीं । बहुत प्रकार की भक्तियों के निर्माण में नगर की वृद्ध चतुर स्त्रियों या पुरखिनें बांधनू की रंगाई के लिए कपड़ों को बाँध रही थीं, कुछ कपड़े बाँधे जा चुके थे । अन्तःपुर की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के द्वारा रंगने वालों को जो नेग या पूजा-भेंट दी जा रही थी उससे प्रसन्न होकर वे लोग उन वस्त्रों को रँग रहे थे, एवं जो रँगे जा चुके थे उन्हें दोनों सिरों पर • पकड़कर परिजन लोग झकझोर कर छाया में सुखा रहे थे और कुछ सूख गए थे । एक

चतुर्थ उच्छ्वासः २३६ शोष्यमाणैः शुष्कैश्च कुटिलक्रमरूपक्रियमाणपल्लवपरभागैरपरैरारब्धकुङ्कु- मपङ्कस्थासकच्छुरणैरपरैरुद्भुजभुजिष्यभज्यमानभङ्गुरोत्तरीयैः क्षौमैश्च बाद- रैश्च दुकूलैश्च लालातन्तुजैश्चांशुकैश्च नेत्रैश्च निर्मोकनिभैरकठोररम्भागर्भ- कोमलैर्निःश्वासहार्यैः स्पर्शानुमेयैर्वासोभिः सर्वतः स्फुरद्भिरिन्द्रायुधस- हस्रैरिव संच्छादितम्, उज्ज्वलनिचोलकावगुण्ठ्यमानहंसकुलैश्च शयनीयै- स्तारामुक्ताफलोपचीयमानैश्च कञ्चुकैरनेकोपयोगपाट्यमानैश्चापरिमितैः प- ट्पटीसहस्रैरभिनवरागकोमलदुकूलराजमानैश्च पटवितानैः स्तवरकनिव- हनिरन्तरच्छाद्यमानसमस्तपटलैश्च मण्डपैरूचित्रनेत्रपटवेष्ट्यमानैश्च स्त- म्भैरुज्ज्वलं रमणीयं चौत्सुक्यदं च मङ्गल्यं चासीद्राजकुलम् । देवी तु यशोमती विवाहोत्सवपर्याकुलहृदया हृदयेन भर्तरि, कुतूहलेन क्षौमैः क्षुमाविकारैः । बादरैः कार्पासैः । लालातन्तुजैः कौशेयैः । नेत्रैः पुट्टैः (?) । निचोलकैर्वस्तुरूपकविशेषैः । स्तवरकं वस्त्रभेदः । वितानकं करकम् । पटलं छाद- नम् । उज्ज्वलं भ्राजिष्णु । कोने स दूसरे कोने तक टेढ़ी, ठप्पों से बनाई जाने वाला फूल-पत्तियों का रेखाकृतयाँ एक रङ्ग की पृष्ठभूमि पर दूसरे रंग में तैयार होने लगीं। कुछ वस्त्रों को गीले कुङ्कुम में रंगे हाथ से चित्तियाँ छोपकर मांगलिक बनाया जा रहा था। कुछ को सेवक लोग उठे हुए हाथों से चुटकी दबाकर उत्तरीय या ऊपरने की तरह प्रयुक्त वस्त्रों में चुन्नट डालकर उन्हें मरोड़ी देकर देख रहे थे। क्षौम, बादर (कपास के बने कपड़े), दुकूल, लाला- तंतुज (रेशमी) अंशुक और नेत्र आदि कई प्रकार के वस्त्र थे, जो साँप की केंचुली के समान हल्के केले के खम्भे की भीतरी पात के समान कोमल, साँस की हवा से भी उड़ जाने वाले एवं केवल छूकर ही अनुमान करने योग्य थे। हजारों इन्द्रायुष के समान ऐसे वस्त्रों से राजकुल ढंक रहा था। दान-दहेज के लिए बनाये गये पलंग पर सफेद चादरें बिछाई गयी थीं और हंसों की पंक्तियाँ लकड़ी में खोदकर बनायी गयीं थीं। पहनने के लिये जो कंचुक तैयार किये जा रहे थे, उन पर चमकीले मोतियों से कढ़ाई का काम किया गया था। अनेक प्रकार के उपयोग में आने वाली बहुत सी कपड़ों की पट्टियां चीर-चीर कर बनायी जा रही थीं। कपड़े के चन्दोवे में नये एकरङ्ग के दुकूल लगाये जा रहे थे। मढ़वे की छाजन फूल-पत्तियों से ढँक गयी थी। मण्डप के खम्भों में रंगीन नेत्र नामक वस्त्र लपेटकर बाँधे जा रहे थे। इस प्रकार राजकुल का यह दृश्य चकमक, रमणीय, भाँति-भाँति के कुतूहलों से भरा हुआ और मांगलिक हो गया था। रानी यशोवती को विवाह के बहुविध कामों में चैन नहीं मिलती थी। वह पति

२४० हर्षचरितम् जामातरि, स्नेहेन दुहितरि, उपचारेण निमन्त्रितस्त्रीषु, आदेशेन परिजने, शरीरेण संचरणे, चक्षुषा कृताकृतप्रत्यवेक्षणेषु, आनन्देन महोत्सवे, एकापि बहुधा विभक्तेवाभवत् । भूपतिरप्युपर्य्युपरि विसर्जितोष्ट्रबामीजनि- तजामातृजोषः सत्यप्याज्ञासंपादनदक्षे मुखेक्षणपरे परिजने समं पुत्राभ्यां दुहितृस्नेहविक्लबः सर्वं स्वयमकरोत् । एवं च तस्मिन्नविधवामय इव भवति राजकुले, मङ्गलमय इव जाय- माने जीवलोके, चारणमयेष्विव लक्ष्यमाणेषु दिङ्मुखेषु, पटहरवमय इव कृतेऽन्तरिक्षे, भूषणमय इव भ्रमति परिजने, बान्धवमय इव दृश्य- माने सर्गे, निर्वृतिमय इवोपलक्ष्यमाणे काले, लक्ष्मीमय इव विजृम्भमाणे महोत्सवे, निधान इव सुखस्य, फल इव जन्मनः, परिणाम इव पुण्यस्य, यौवन इव विभूतेः, यौवराज्य इव प्रीतेः, सिद्धिकाल इव मनोरथस्य वर्तमाने, गण्यमान इव जनाङ्गुलीभिः, आलोक्यमान इव मार्गध्वजैः, प्रत्युद्गम्यमान इव मङ्गल्यवाद्यप्रतिशब्दकैः, आहूयमान इव मौहूर्तिकैः, उष्ट्रवाम्युष्ट्रभार्या । केचिद्वामीद्वयमन्ये वेसरीमन्ये गुर्वीमाहुः । जोषः सुखम् । एवमित्यादौ । अस्मिन्सत्याजगाम विवाहदिवस इति संबन्धः । निधान इव सुखस्येत्यादौ वर्तमान इत्यनेन संगतिः । मौहूर्तिकैर्गणकैः । अनिबद्धो बाह्यः । के लिए हृदय के रूप में, दामाद के लिए कुतूहल के रूप में, पुत्री के लिए स्नेह के रूप में, बुलावे पर आई हुई स्त्रियों के लिए भावभगत के रूप में, परिजन के लिए आदेश के रूप में, चलने-फिरने में शरीर के रूप में, किए या न किए कार्यों की देख ताक के लिए आँख के रूप में, महोत्सव के लिए आनन्द के रूप में, इस प्रकार मानों एक से अनेक रूप में हो गई । राजा ने भी जामाता की प्रसन्नता के लिए एक के ऊपर एक ऊँट और घोड़ियों की ढेर लगा दी । आज्ञा पालन करने में चतुर और मुँह ताकते हुए खड़े रहने वाले नौकर-चाकर के होने पर भी वे अपने दोनों पुत्र के साथ पुत्री के स्नेह में व्याकुल होकर सब काम स्वयं निपटाते थे । इस प्रकार राजकुल में चारों ओर सुहागिन स्त्रियां दिखाई देती थीं । सारा संसार मंगलमय लग रहा था । दिशायें चारणों से भरी हुई दीख पड़ने लगीं । आकाश में पटह की आवाज गूंजने लगी । गहनों से लदे हुए परिजन घूमते रहते थे । सारी सृष्टि ही बान्धवमय प्रतीत हो रही थी । सारा समय परम-आनन्दमय हो रहा था । महोत्सव १. तस्मिन्नविधवाधवे ।

आकृष्यमाण इव मनोरथैः, परिष्वज्यमान इव वधूसखीहृदयैराजगाम विवाहदिवसः। प्रातरेव प्रतीहारैः समुत्सारितनिखिलानिबद्धलोकं विविक्त- मक्रियत राजकुलम्। अथ महाप्रतीहारः प्रविश्य नृपसमीपम् 'देव ! जामातुरन्तिकात्ता- म्बूलदायकः पारिजातकनामा संप्राप्तः' इत्यभिधाय स्वाकारं युवानमदर्श- यत्। राजा तु तं दूरादेव जामातृबहुमानाद्दर्शितादरः 'बालक ! कच्चित्कु- शली ग्रहवर्मा ?' इति पप्रच्छ। असौ तु समाकर्णितनराधिपध्वनिर्धाव- मानः कतिचित्पदान्युपसृत्य प्रसार्य च बाहू सेवाचतुरश्चिरं वसुंधरायां निधाय मूर्द्धानमुत्थाय 'देव ! कुशली यथाज्ञापयस्यर्चयति च देवं नम- स्कारेण' इति व्यज्ञापयत्। आगतजामातृनिवेदनागतं च तं ज्ञात्वा कृत- सत्कारं राजा 'यामिन्याः प्रथमे यामे विवाहकालात्ययकृतो यथा न भवति दोषः' इति संदिश्य प्रतीपं प्राहिणोत्। यथा न भवति दोष इत्यत्र तथा कार्यमित्यर्थलभ्यम्। मानो लक्ष्मीमय बन रहा था। वह अवसर मानों सुख का निधान, जन्म का फल, पुण्य का परिणाम, ऐश्वर्य का यौवन, प्रीति का यौवराज्य, मनोरथ का सिद्धिकाल था। विवाह के दिन को लोग उंगलियों पर गिनने लगे। उसे मार्ग के ध्वज मानों निहारने लगे। माङ्गलिक गाजे बाजे की ध्वनियां मानों उसकी अगवानी लेने पहुंचीं। ज्योतिषी लोग उसे गुहारने लगे। मनोरथ उसे खींचने लगे। वधू की सखियां मानों उसका आलिङ्गन करने लगीं। इस प्रकार विवाह का दिन आ पहुँचा। प्रातःकाल ही प्रतीहारों ने फालतू सब लोगों को हटा कर राजकुल को खाली कर दिया। महाप्रतीहार ने राजा के समीप आकर निवेदन किया-देव, जामाता के समीप से तम्बोली (ताम्बूलदायक) पारिजातक आया है।' यह कह कर अपने ही आकार के एक युवक को दिखाया। राजा ने दूर ही से दमाद के सम्मान के कारण उसके प्रति आदर व्यक्त करते हुए पूछा- 'बालक, ग्रहवर्मा तो कुशल से है।' सेवा में चतुर उसने राजा की आवाज सुनते ही जल्दी से कुछ डेग आगे बढ़, दोनों हाथ फैला, देर तक जमीन में सिर झुका और उठ कर निवेदन किया-'देव, कुशल से हैं और प्रणामपूर्वक आप की अर्चना करते हैं।' राजा ने यह जान कर कि जामाता विवाह के लिए आए हैं; उनका सत्कार करते हुए कहा-'रात्रि के पहले पहर में विवाह-लग्न साधनी चाहिए जिससे दोष न हो' और उसे वापिस भेजा। १६ ह० च०

२४२ हर्षचरितम्

अथ सकलकमलवनलक्ष्मीं वधूमूख इव संचार्ये समवसिते वासरे, विवाहदिवसश्रियः पादपल्लव इव रज्यमाने सवितरि, वधूवरानुरागलघुकृ- तप्रेमलज्जितेष्विव विघटमानेषु चक्रवाकमिथुनेषु, सौभाग्यध्वज इव रक्तां- शुकसुकुमारवपुषि नभसि स्फुरति संध्यारागे, कपोतकण्ठकर्बुरे वरयात्रा- गमनरजसीव कलुषयति दिङ्मुखानि तिमिरे, लग्नसंपादनसज्ज इवो- ज्जिहाने ज्योतिर्गणे, विवाहमङ्गलकलश इवोदयशिखरिणा समुत्क्षिप्यमाणे वर्धमानधवलच्छाये ताराधिपमण्डले, वधूवदनलावण्यज्योत्स्नापरिपोत- तमसि प्रदोषे, वृथोदितमुपहसत्स्विव रजनिकरमुत्तानितमुखेषु कुमुद्वने- ष्वाजगाम मुहुर्मुहुरुल्लासितस्फारस्फुरितारुणचामरैर्मनोरथैरिवोत्थितरागा- ग्रपल्लवैः पुरोधावमानैः पादातैरूत्कर्णकटकहयप्रतिहेषितदीयमानस्वागतै-

अथेत्यादौ। एतस्मिन्नेतस्मिन्सत्याजगामेति संबन्धः। कपोतेत्यसाधारणम्। कर्बुर आपाण्डुरे। रजसीवेति। रजोऽपि मुखानि कलुषयति। लग्नेत्यादि साधा- रणम्। उज्जिहान उद्गच्छति। ज्योतिर्गणैस्तारानिकरैः, गणकैश्च। वर्धमानेत्यादि संध्यारागहितत्वात्। वर्धमानं शरावः तेन च धवलच्छायम्। तद्धि मकोल्लिसं विवाहे क्रियते इत्याचारः। स्फारः स्फोटकः। पुरोधावमानैरिति साधारणम्। पादातैः पदातिसमूहैः।

सारे कमलवन की लक्ष्मी को वधू राज्यश्री के मुख में मानों अर्पित करके दिन ढल गया। विवाह-दिवस की श्री के चरण-पल्लव से मानों सूर्यबिम्ब लाल हो गया। वधू और वर के अनुराग के सामने प्रेम भाव के हल्के होने के कारण लज्जित होकर चकवाक के जोड़े पृथक् होने लगे। रक्तांशुक की भाँति कोमल संध्याराग सौभाग्यध्वज के समान आकाश में स्फुरित होने लगा। कबूतर के कंठ के सदृश अन्धकार आकाश को कलुषित कर रहा था, मानो बरात की चढ़त से धूल उड़कर भरने लगी हो। शुभ लग्न को ठीक करने में तारे मानों निकल कर तैयार होने लगे। उदयाचल द्वारा सिर पर उठाए गए विवाह के मंगलकलश के समान चन्द्रमण्डल की उज्ज्वल कान्ति बढ़ने लगी। वधू राज्य- श्री के लावण्य की चाँदनी से प्रदोषकाल का अन्धकार जब दूर हो गया तो फिर व्यर्थ उदित हुए चन्द्रमा को देखकर मुँह ऊँचा किए कुमुद मानों हँसने लगे। तभी लग्न के समय बरात लेकर ग्रहवर्मा उपस्थित हुआ। पैदल चलने वाले बराती बार-बार अपनी लाल ध्वजा को फटकाते चले आ रहे थे, मानों राजा के पल्लव वाले आगे दौड़ते हुए उनके मनोरथ हों। कान खड़े किए छावनी के घोड़ों की हिनहिनाहट के साथ किए जाने वाले स्वागत को स्वीकार करते हुए बराती घोड़े भी उस दिग्भाग को भरने लगे। हिलते

चतुर्थ उच्छ्वासः २४३ रिव वाजिनां वृन्दैरापूरितदिग्विभागः, चलकर्णचामराणां चामीकरमय- सर्वोपकरणानां वर्णकलम्बिनां बलिनां घण्टाटाङ्कारिणां करिणां घटाभिः घटयन्निव पुनरिन्दूदयविलीनमन्धकारम् , नक्षत्रमालामण्डितमुखीं करिणीं निशाकर इव पौरंदरीं दिशमारूढः प्रकटितविविधविहगविरुतैस्तालावच- रचारणैः पुरःसरैर्बालो वसन्त इवोपवनैः क्रियमाणकोलाहलो गन्धतैला- वसेकसुगन्धिना दीपिकाचक्रवालालोकेन कुङ्कुमपटवासधूलिपटलेनेव पि- ञ्जरीकुर्वन्सकलं लोकम् , उत्फुल्लमल्लिकामण्डमाला मध्याध्यासितकुसुमशे- खरेण शिरसा हसन्निव सपरिवेषक्षपाकरं कौमुदीप्रदोषम्, आत्मरूपनि- र्जितमकरकेतुक.रापहृतेन कार्मुकेणेव कौसुमेन दाम्ना विरचितवैकक्षकवि- लासः कुसुम सौरभगर्वभ्रान्तभ्रमरकुलकलकलप्रलापसुभगः पारिजात इव जातः श्रिया सह पुनरवतारितो मेदिनीम्, नववधूवदनावलोकनकुतूहले- नेव कृष्यमाणहृदयः पतन्निव मुखेन प्रत्यासन्नलग्नो ग्रहवर्मा त्वरित- माजगाम। राजा तु तमुपद्वारमागतं चरणाभ्यामेव राजचक्रानुगम्यमानः ससुतः हुए कान पर चँवर लिए, सोने के समस्त उपकरणों से सजाए गए, भाँति-भाँति के बलवान् हाथी घंटा की टंकार करते चले आ रहे थे मानों चन्द्रमा के उदय होने से विलीन अन्ध- कार को फिर जुटाने लगे। ग्रहवर्मा नक्षत्रमाला नामक आभरण से सुसज्जित हथिनी पर चढ़ा हुआ उस प्रकार लग रहा था जैसे चन्द्रमा ताराओं से शोभित पूर्व दिशा में ऊपर की ओर चढ़ा हो । उसके आगे-आगे चारण लोग तालयुक्त गान करते चल रहे थे जिससे चिड़ियों के चहचहाने जैसा शब्द हो रहा था । गन्ध तैल पड़ने से सुगन्धित दीपक जल रहे थे, मानों कुंकुम और पटवास की धूलि सब ओर सब लोगों को पिञ्जरित कर रही थी । ग्रहवर्मा विकसित मालतीकुसुमशेखर की माला सिरपर धारण कर रहा था, मानों परि- वेष के साथ उदित हुए चन्द्रवाले चन्द्रिकायुक्त प्रदोषकाल पर हँस रहा था। अपने रूप के सामने हारे हुए कामदेव के हाथ से छीन कर लिए गए धनुष के समान उसका पुष्प- दाम का बना हुआ वैकक्षक शोभ रहा था। भौंरे उसके फूलों पर गुंजारते हुए जूझ रहे थे, मानो पारिजात ही श्री के साथ उतर आया हो । नई वधू राज्यश्री का मुखड़ा देखने के कुतूहल से खिंचे जाते हुए हृदय वाला वह मानों मुँह की ओर से दौड़ कर आया । राजाओं और दोनों राजकुमारों के साथ पैदल ही चल कर द्वार के समीप पहुँचे हुए

२४४ हर्षचरितम् प्रत्युज्जगाम । अवतीर्णं च तं कृतनमस्कारं मन्मथमिव माधवः प्रसारित- भुजो गाढमालिङ्गि । यथाक्रमं परिष्वक्तराज्यवर्धनहर्षं च हस्ते गृहीत्वा- भ्यन्तरं निन्ये । स्वनिर्विशेषासनदानादिना चैनमुपचारेणोपचचार । न चिराच्च गम्भीरनामा नृपतेः प्रणयी विद्वान्द्विजन्मा ग्रहवर्माणमु- वाच—'तात ! त्वां प्राप्य चिरात्खलु राज्यश्रिया घटितौ तेजोमयौ सकल- जगद्धीयमानबुधकर्णानन्दकारिगुणगणौ सोमसूर्यवंशाविव पुष्यभूतिमुखर- वंशौ । प्रथममेव कौस्तुभमणिरिव गुणैः स्थितोऽसि हृदये देवस्य । इदानीं तु शशीव शिरसा परमेश्वरेणासि वोढव्यो जातः' इति । एवं वदत्येव तस्मिन्नृपमुपसृत्य मौहूर्तिकाः 'देव ! समासीदति लग्न- वेला । व्रजतु जामाता कौतुकगृहम्' इत्युचुः । अथ नरेन्द्रेण 'उत्तिष्ठ, गच्छ' इति गदितो ग्रहवर्मा प्रविश्यान्तःपुरं जामातृदर्शनकुतूहलिनीनां राज्यश्रिया नृपतिलक्ष्म्यापि । घटितौ योजितौ, मुक्तौ च । बुधकर्णौ पण्डित- श्रोत्रे, सोमसूर्यसूनू च । गुणैरुत्कर्षैः, तन्तुभिश्च । हृदये चेतसि, वक्षसि च । देवस्य राज्ञः, विष्णोश्च । परमेश्वरेण राज्ञा, हरेण च । कौतुकगृहं विवाहमङ्गलवेश्म । उसका स्वागत किया। जैसे वसन्त कामदेव से मिलता है उसी प्रकार उन्होंने हाथ फैलाकर हथिती से उतार कर झुके हुए उसका आलिङ्गन किया। क्रम से राज्यवर्धन और हर्ष भी जब गले मिले तो राजा हाथ से पकड़ कर उसे भीतर ले गए। अपने समान आसन आदि उपचारों से उसका सम्मान किया। उसी समय गम्भीर नामक राजा के प्रिय विद्वान् ब्राह्मण ने ग्रहवर्मा से कहा— 'हे तात, राज्यश्री के साथ तुम्हें सम्बन्धित पाकर आज पुष्पभूति और मुखर दोनों के वंश तेजस्वी, सारे संसार के लोगों को आनन्दित करने वाले सोम और सूर्य वंश के समान धन्य हुए। पहले से ही देव प्रभाकरवर्धन ने कौस्तुभमणि के समान तुम्हें धारण किया है। इस समय जैसे शिवने चन्द्र को अपने मस्तकपर धारण किया है उसी प्रकार तुम भी उनक शिरोधार्य हो रहे हो। ब्राह्मण गम्भीर यह कह ही रहे थे कि ज्योतिषियों ने आकर कहा—'राजन्, लग्न का समय निकट है। जामाता कौतुकगृह में चलें।' राजा के 'उठो, जाभो' कहने पर ग्रहवर्मा ने अन्तःपुर में प्रवेश किया और वर को देखने के कुतूहल में स्त्रियों की खिले-

चतुर्थ उच्छ्वासः २४५ स्त्रीणां पतितानि लोचनसहस्राणि विकचनीलकुवलयवनानीव लङ्घयन्ना- ससाद कौतुकगृहद्वारम् । निवारितपरिजनश्च प्रविवेश । अथ तत्र कतिपयाप्तप्रियसखीस्वजनप्रमदाप्रायपरिवाराम् , अरुणांशु- कावगुण्ठितमुखीं प्रभातसंध्यामिव स्वप्रभया निष्प्रभान्प्रदीपकान्कुर्वाणाम् , अतिसौकुमार्यशङ्कितेनेव यौवनेन नातिनिर्भरमुपगूढाम् , साध्वसनिरुध्य- मानहृदयदेशदुःखमुक्तैर्निभृतार्यतैः श्वसितैरपयान्तं कुमारभावमिवानुशोच- न्तीम् , अत्युत्कम्पिनीं पतनभियेव त्रपया निष्पन्दं धार्यमाणाम् , हस्तं तामरसप्रतिपक्षमासन्नग्रहणं शशिनमिव रोहिणीं भयवेपमानमानसामव- लोकयन्तीम् , चन्दनधवलतनुताम् , ज्योत्स्नादानसंचितलावण्यात्कुमु- दिनोगर्भादिव प्रसूताम् , कुसुमामोदनिर्हारिणीं वसन्तहृदयादिव निर्गताम्, निःश्वासपरिमलाकृष्टमधुकरकुलां मलयमारुतादिवोत्पन्नाम् , कृतकंदर्पा- अथेत्यादौ । तत्र वधूमपश्यदिति संबन्धः । अरुणांशुकं लोहितं वस्त्रम् । अरु- णस्याल्पांशवोऽंशुकाः । निभृतैर्गुप्तैः । प्रतिपक्षस्तुल्यः, शत्रुश्च । ग्रहणं हस्तस्य स्वीकारः, शशिनश्च ग्रहणं समासङ्गं भवति । उद्गमनं सौरभमित्यन्ये । प्रभावीनां कौस्तुभादिभिर्यथासंख्यम् । बालिका ऊर्मिका, कौमारी च । विनोदयन्तीं प्रथय- न्तीम् । हारिणीं रम्याम्, मार्गा च । हुए कुवलय के समान गिरती हुई आँखों को लांघते हुए कौतुकगृह के द्वार पर पहुंचा। अन्य लोग द्वार पर ही रोक दिए गए और उसने भीतर प्रवेश किया । तब उसने वहाँ वधूवेश में राज्यश्री को देखा । वह कुछ मान्य और प्रियसखियों से और स्वजन स्त्रियों से घिरी हुई थी । प्रभात काल की संध्या के समान लाल अंशुक का घूंघट डाले अपनी प्रभा से दीपों को निष्प्रभ कर रही थी । मानों यौवन ने उसे अत्यन्त सुकुमार जान कर कस कर नहीं दबाया था । भय के कारण रुंधे हुए हृदयदेश से वह कठिनता से लम्बी सांस लेती थी, मानों अब छोड़ कर जाते हुए कुमारभाव के बारे में चिन्ता कर रही थी । वह कांप रही थी, फिर भी गिर जाने के भय से उसे लज्जा ने मानों पकड़ रखा था । भय से कांपते हुए मन वाली वह कमल के प्रतिपक्षी अपने हाथ को देख रही थी, मानों ग्रहणसमय निकट होने पर कातर होकर रोहिणी चन्द्रमा को देख रही हो । चन्दन के लगाने से उसकी देह और भी सफेद हो रही थी, मानों चन्द्र के द्वारा दी गई ज्योत्स्ना के लावण्य से भरे हुए कुमुदिनी के गर्भ से उत्पन्न हुई हो । फूल की गन्ध से वह और भी मनोहर लग रही थी, मानों वसन्त के हृदय से निकली हो । उसके निश्वास के परिमल में भौरे खिंचते जा रहे थे, मानों वह

२४६ हर्षचरितम् नुसरणां रतिमिव पुनर्जाताम्, प्रभालावण्यमदसौरभमाधुर्यैः कौस्तुभश- शिमदिरापारिजातामृतप्रभवैः सर्वरत्नगुणैरपरामिव सुरासुररुषा रत्नाकरेण कल्पितां श्रियम्, स्निग्धेन बालिकालोकेन सितसिन्दुवारकुसुममञ्जरी- भिरिव मुक्तादीधितिभिः कल्पितकर्णावतंसाम्, कर्णाभरणमरकतप्रभाह- रितशाद्वलेन कपोलस्थलीतलेन विनोदयन्तीमिव हारिणीं लोचनच्छा- याम्, अधोमुखं वरकौतुकालोकनाकुलं मुहुर्मुहुः कृतमुखोन्नमनप्रयत्नं सखीजनं हृदयं च निर्भर्त्सयन्तीं वधूमपश्यत्। प्रविशन्तमेव तं हृदयचौरं वध्वा समर्पितं जग्राह कंदर्पः। परिहास- स्मेरमुखीभिश्च नारीभिः कौतुकगृहे यद्यत्कार्यते जामाता तत्तत्सर्वमति- पेशलं चकार। कृतपरिणयानुरूपवेशपरिग्रहां गृहीत्वा करे वधूं निर्जगाम। जगाम च नवसुधाधवलां निमन्त्रितागतैस्तुषारशैलोपत्यकामिव त्र्यम्ब- मृगलोचनच्छायां नीलशाद्वलेन स्थलीतले क्रीडति। कौतुकालोकनाकुलं द्वयमपि साधारणम्। वध्वा राज्यश्रिया। अथ वेदीं जगामेति संबन्धः। उपत्यकाद्रेः समासन्ना भूः। मलयमारुत से उत्पन्न हो। वह कामदेव का अनुसरण कर रही थी, मानों रति ने फिर जन्म लिया हो। वह अपनी प्रभा, लावण्य, मद, सौरभ, माधुर्य आदि गुणों से दूसरी लक्ष्मी के समान मालूम पड़ रही थी, मानों जिसे कौस्तुभमणि, चन्द्र, मदिरा, पारिजात और अमृत से उत्पन्न समस्त रत्न के उन गुणों के साथ समुद्र ने देवता और असुरों पर क्रोध करके फिर से उत्पन्न किया हो। उसके कानों में मोती की बालियों की किरणें उजले सिन्धुवार पुष्प की मंजरी की भांति अवतंस बन रहीं थीं। पन्ने के कर्णाभरण की हरी प्रभा उसके कपोलों पर पड़ रही थी, मानों वह आँखों की सुन्दर कान्ति को व्यक्त. कर रही थी। दिखाने के लिए प्रयत्न में लगी हुई सखियां उसके झुके हुए मुंह को बार-बार उठाने का प्रयत्न कर रही थीं, वह उन्हें और अपने हृदय को भी कोस रही थी। प्रवेश करते ही राज्यश्री के द्वारा दिए गए अपने हृदय के चोर उस ग्रहवर्मा को कामदेव ने पकड़ लिया। हँसी-मजाक करने वाली नवेलियों ने कोहबर में जो-जो करने के लिए कहा ग्रहवर्मा ने बिना जिद के सब किया। विवाह के अनुकूल वेषभूषा में सुसज्जित वधू का हाथ पकड़ कर वह निकला और वेदी के पास पहुंचा। वह (वेदी) चूने से ताजी पोती हुई थी, मानों शिव-पार्वती के विवाह में निमंत्रण पर आए हुए

चतुर्थ उच्छ्वासः २४७ काम्बिकाविवाहाहूतैर्भूभृद्भिः परिवृताम्, सेकसुकुमारयवाङ्कुरदन्तुरैः पञ्चा- स्यैः कलशैः कोमलवर्णिकाविचित्रैरमित्रमुखैश्च मङ्गल्यफलहस्ताभिरञ्ज- लिकारिकाभिरुद्भासितपर्यन्ताम्, उपाध्यायोपधीयमानेन्धनधूमायमाना- मिसंधुक्षणाक्षणिकोपद्रष्टृद्विजाम्, उपकृशानुनिहितानुपहतहरितकुशाम्, संनिहितदृषदजिनाज्यस्रुक्समित्पूलिनिवहाम्, नूतनशूर्पोर्पितश्यामलशमी- पलाशमिश्रलाजहासिनीं वेदीम् । आरुरोह च तां दिवमिव सज्योत्स्नः शशी । समुत्ससर्प च वेल्लितारुणशिखापल्लवस्य शिखिनः कुसुमायुध इव रतिद्वितीयो रक्ताशोकस्य समीपम् । हुते च हुतभुजि प्रदक्षिणावर्तप्रवृत्ता- भिर्वधूवदनवलोकनकुतूहलिनीभिरिव ज्वालाभिरेव सह प्रदक्षिणं बभ्राम । पात्यमाने च लाजाञ्जलौ नखमयूर्खधवलिततनुरदृष्टपूर्ववधूवररूपविस्म- यस्मेर इवादृश्यत विभावसुः । भूभृन्नृपः, गिरिश्च । वर्णिका खटिका । अमित्रमुखै रूप्यमयैः, शत्रुमुखैश्च । अञ्ज- लिकारिकाभिर्मृन्मयप्रतिमाभिः, सालभञ्जिकाभिर्वा । क्षणिको व्यग्रः । उपद्रष्टा साक्षी उपदेश्य इति केचित् । स्रुग्धोमपात्रम् । वेल्लिता वलिताः । शिखा ज्वाला, शिखाग्राणि च । पल्लवाः प्रान्ताः, किसलयानि च । शिखिनो वृक्षस्यापि । उक्तं च—'अग्निः शिखीति च प्रोक्तः शिखी वृक्षो निगद्यते । बर्हिणश्च शिखी प्रोक्तः कृचि- त्स्यात्कुक्कुटः शिखी ॥' इति च । अनेकों पर्वतों से भरी हुई हिमालय की तराई हो । चारों ओर पास में चौड़े मुँह के कलसे रखे हुए थे, पानी की तरी से नये यवांकुर उनमें उग गए थे । उनपर हल्को बनी की खरिया पुती हुई थी और उन्होंने सूर्य का मुख नहीं देखा था । मंगलार्थ फल को हाथ में लिए मिट्टी की मूरतें खड़ी थीं। ईंधन देने से धुंवा उगलती हुई अग्नि को प्रज्वलित करने में साक्षी रूप बैठे हुए ब्राह्मण व्यग्र हो रहे थे। अग्नि के समीप ही हरे-हरे लम्बे कुश रखे हुए थे । अश्मारोहण के लिए सिल, कृष्ण मृगचर्म, घृत, स्रुवा और समिधाएं रखी हुई थीं। जैसे ज्योत्स्ना के साथ चन्द्र आकाश में चढ़ता है उसी प्रकार ग्रहवर्मा भी वधू राज्यश्री के साथ विवाहवेदी पर चढ़े और जैसे कामदेव रति को साथ लेकर रक्ताशोक के समीप पहुंचता है उसी प्रकार हिलती हुई लाल शिखा से युक्त अग्नि के पास आए । हवन करने के पश्चात् दक्षिण की ओर मुड़ती हुई मानों वधू का मुखड़ा देखने के कुतूहल वाली ज्वालाओं के साथ उन दोनों ने अग्नि के चारों ओर भांवरे लीं और लाजाञ्जलियाँ छोड़ीं । तब वर और वधू की नखकिरणों से और भी

२४८ हर्षचरितम् अत्रान्तरे स्वच्छकपलोदरसंक्रान्तमनलप्रतिबिम्बमिव निर्वाप्यन्ती स्थूलमुक्ताफलविमलबाष्पबिन्दुसंदोहदर्शितदुर्दिना निर्वदनविकारं रुरोद वधूः । उदश्रुविलोचनानां च बान्धववधूनामुदपादि महानाक्रन्दः । परि- समापितवैवाहिकक्रियाकलापस्तु जामाता वध्वा समं प्रणनाम श्वशुरौ । प्रविवेश च द्वारपक्षलिखितरतिप्रीतिदैवतं प्रणयिभिरिव प्रथमप्रविष्टैरलि- कुलैः कृतकोलाहलम् , अलिकुलपक्षपवनप्रेङ्खोलितैः कर्णोत्पलप्रहारभयप्र- कम्पितैरिव मङ्गलप्रदीपैः प्रकाशितम् , एकदेशलिखितस्तबकितरक्ताशोक- तरुतलभाजाधिज्यचापेन तिर्यक्कूणितनेत्रत्रिभागेन शरमृजूकुर्वता कामदे- वेनाधिष्ठितम् , एकपार्श्वन्यस्तेन काञ्चनाचामरुकेणेतरपार्श्ववर्तिन्या च दान्तशफरुकधारिण्या कनकपुत्रिकया साक्षालक्ष्म्येवोद्दण्डपुण्डरीकहस्तया सनाथेन सोपधानेन स्वास्तीर्णेन शयनेन शोभमानम् , शयनशिरोभाग-

निर्वापयन्ती गमयन्ती । प्रविशेत्यादौ । जामाता वासगृहमिति संबन्धः । पक्षः पार्श्वम् । कूणितः संकोचितः ।

प्रकाशमान अग्निदेव मानों पहले कभी नहीं देखे हुए इस प्रकार वर-वधू के रूप को देखकर आश्चर्य के साथ प्रसन्न दीख पड़े । इसी बीच वधू राज्यश्री मानों अपने स्वच्छ कपोलों में पड़ती हुई अग्नि की छाया को बुझाती हुई, और स्थूल मुक्ताफल जैसे निर्मल आँसुओं से दुर्दिन का दृश्य उपस्थित करती हुई मुख की विकृति के बिना ही रोने लगी । बान्धव-बन्धुओं की आँखें भी आँसू से छल-छला उठीं और तब एक प्रकार का शोरगुल मचा । इधर विवाह का विधि विधान समाप्त करके जामाता ने वधू के साथ सास-ससुर को प्रणाम किया और वासगृह में प्रविष्ट हुआ । उस वासगृह के दोनों पक्षों पर एक ओर रति और दूसरी ओर प्रीति ( कामदेव की दोनों स्त्रियों ) के चित्र बनाए गए थे। प्रेमी के समान पहले ही घुसकर भौरों ने कोलाहल शुरू किया । भौरों के पंख की हवा से हिलते हुए मानों कर्णोत्पल के प्रहार के भय से कांपते हुए मंगलदीप उस गृह को प्रकाशित कर रहे थे । एक ओर फूलों से लदे रक्ताशोक के नीचे धनुष पर बाण रखकर तिरछी ऐंची हुई मिचमिचाती आँख से निशाना साधते हुए कामदेव का चित्र बना था । अन्दर सफेद चादर से ढंका हुआ पलंग बिछा था जिसके सिरहाने तकिया रखा था । उसके एक पार्श्व में सोने की एक झारी रखी थी और दूसरी ओर हाथीदाँत का डिब्बा लिए हुए सोने की पुतली

स्थितेन च कृतकुमुदशोभेन कुसुमायुधसाहायकायागतेन शशिनेव निद्राकलशेन राजतेन विराजमानं वासगृहम्। तत्र च ह्रीताया नववधूकायाः पराङ्मुखप्रसुप्ताया मणिभित्तिदर्पणेषु मुखप्रतिबिम्बानि प्रथमालापाकर्णनकौतुकागतगृहदेवताननानीव मणिग- वाक्षकेषु वीक्षमाणः क्षणदां निन्ये। स्थित्वा च श्वशुरकुले शीलेनामृत- मिव श्वश्रूहृदये वर्षन्नभिनवाभिनवोपचारैर्पुनरुक्तान्यानन्दमयानि दश दिनानि, दत्त्वा च राजदौवारिकमिव राजकुले रणरणकं यौतकनिवेदिता- नीव शम्बलान्यादाय हृदयानि सर्वलोकस्य कथंकथमपि विसर्जितो नृपेण वध्वा सह स्वदेशमगमदिति। इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते चक्रवर्तिजन्मवर्णनं नाम चतुर्थ उच्छ्वासः।


क्षणदां रात्रिम्। दश दिनानि स्थित्वेति संगतिः। यातकं सुदायः। इति श्रीशंकरविरचिते हर्षचरितसंकेते चतुर्थ उच्छ्वासः।


खड़ी थी। नीचे पलंग के सिरहाने कुमुदों से शोभित मानो कामदेव की सहायता के लिए पहुंचे हुए चन्द्रमा के समान चाँदी का निद्रा-कलश रखा हुआ था। वहाँ लज्जित होकर पराङ्मुख सोई हुई नववधू राज्यश्री के मुखड़े के प्रतिबिम्बों को मणिभित्ति में लगाए गए दर्पणों में देखने लगा, वे प्रतिबिम्ब मानों पहली मुलाकात की बातचीत सुनने के कुतूहल से मणिगवाक्षों में खड़े होकर ताक झांक करती हुई गृहदेवताओं के मुख हों। इस प्रकार उसने रात बिताई। इस प्रकार ग्रहवर्मा श्वशुरकुल में अपने शील से सास के हृदय में अमृत की वर्षा करता हुआ नित्य नये-नये उपचारों से दस दिनों तक आनन्द के साथ रहा और द्वारपाल के समान राजकुल में अपना विच्छेदजनित उद्वेग देकर दहेज में मिली हुई सामग्री के साथ सब लोगों के हृदय को भी लेते हुए किसी-किसी प्रकार राजा के द्वारा बिसर्जित हुआ वधू राज्यश्री को विदा करा अपने स्थान को लौट गया। हर्षचरित चतुर्थ उच्छ्वास समाप्त।

पञ्चम उच्छ्वासः नियतिर्विधाय पुंसां प्रथमं सुखमुपरि दारुणं दुःखम् । कृत्वा लोकं तरला तडिदिव वज्रं निपातयति ॥ १ ॥ पातयति महापुरुषान्सममेव बहूननादरेणेव । परिवर्तमान एकः कालः शैलानिवानन्तः ॥ २ ॥ अथ कदाचिद्राजा राज्यवर्धनं कवचहरमाहूय हूणान्हन्तुं हरिणानिव हरिर्हरिणेशकिशोरमपरिमितबलानुयातं चिरंतनैरमात्यैरनुरक्तैश्च महासा- मन्तैः कृत्वा सामिसरमुत्तरापथं प्राहिणोत् । प्रयान्तं च तं देवो हर्षः कतिचित्प्रयाणकानि तुरङ्गमैरनुवव्राज । प्रविष्टे च कैलासप्रभाभासिनीं ककुभं भ्रातरि वर्त मानो नवे वयसि विक्र- नियतीत्यादि । नियतिर्दैवम् । लोकं जनम् । तडिद्विद्युत् । तडिदपि तरलाऽऽ- लोकं कृत्वा वज्रम् निपातयति ॥ १ ॥ अनन्तः पर्यन्तरहितः, शेषभट्टारकश्च ॥ २ ॥ आर्यायुगलेनानेन भाविनी राजविपत्तिः सूचिता । कवचहर इति वयसि नित्यम् । बलं सैन्यम्, सामर्थ्यं च । सामिसरं ससहायम् । जैसे चंचल बिजली क्षण भर अपनी चमक दिखाकर बार-बार वज्रपात करने लग जाती है उसी प्रकार नियति भी पहले-पहल लोगों पर सुख की चमक दिखाती है और फिर वज्र के समान भीषण दुःख ही दुःख गिराने लग जाती है ॥ १ ॥ करवट बदलता हुआ यह कालचक्र अनेक महापुरुषों को भी बिना किसी लगाव के एक साथ बिलट डालता है, जैसे प्रलय के समय में पृथिवी को सहस्र फणों पर धारण करने वाला शेषनाग सुस्ताने के लिए बोझा बदलता है तो बड़े-बड़े पहाड़ उलट-पुलट जाते हैं ॥२॥ किसी समय राजा प्रभाकरवर्धन ने कवच पहनने की आयु वाले अपने पुत्र राज्यवर्धन को बुलाकर हूणों से युद्ध करने के लिए उत्तरापथ की ओर भेजा, जैसे सिंह हरिणों को मारने के लिए अपने बाल सिंह को भेजता है । पुराने मन्त्रियों और अपने में मिले हुए महासामन्तों की देख-रेख में अपरिमित सेना को भी उसके साथ किया । युद्ध के लिए प्रयाण करते हुए राज्यवर्धन को देखकर देव हर्ष भी कुछ पड़ावों तक घोड़ों के साथ पीछे-पीछे गए । कैलास पर्वत की उज्ज्वल प्रभा से उद्भासित होने वाली

पञ्चम उच्छ्वासः २५१ मरसानुरोधिनि केसरिशरभशार्दूलवराहबहुलेषु तुषारशैलोपकण्ठेष्पूत्कण्ठ- मानवनदेवताकटाक्षांशुशारितशरीरकान्तिः क्रीडन्मृगयां मृगलोचनः कति- पयान्यहानि बहिरैव व्यलम्बत । चकार चाकर्णान्ताकृष्टकार्मुकनिर्गतभा- सुरभल्लवर्षी स्वल्पीयोभिरेव दिवसैर्निःश्वापदान्यरण्यानि । एकदा तु वासतेय्यास्तुरीये यामे प्रत्यूषस्येव स्वप्ने चटुलज्वालापु- ञ्जपिञ्जरीकृतसकलककुभा दुर्निवारेण दवहुतभुजा दह्यमानं केसरिणम- द्राक्षीत् । तस्मिन्नेव च दावदहने समुत्सृज्य शावकानुत्प्लुत्य चात्मानं पातयन्तीं सिंहीमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'लोके हि लोहेभ्यः कठिनतराः खलु स्नेहमया बन्धनपाशाः, यदाकृष्टास्तिर्यञ्चोऽप्येवमाच- रन्ति' इति । प्रबुद्धस्य चास्य मुहुर्मुहुर्दक्षिणेतरमक्षि पस्पन्दे । गात्रेषु चाकस्मादेव वेपथुर्विपप्रथे । निनिमित्तमेवान्तर्बन्धनस्थानाच्चचालेव केसरिणः सिंहाः । अष्टपादाः प्राणिविशेषाः शरभाः । शार्दूला व्याघ्राः । वराहाः सूकराः । क्रीडन्मृगयामिति । 'कालभावाध्वगन्तव्या कर्मसंज्ञा ह्यकर्मणाम्' इति भावार्थरूपाया मृगयायाः कर्मभावः । वासतेयी रात्रिः । तुरीये चतुर्थेऽहनि । संवाह्यमानं भ्राम्यमाणम् । लुलितं न्यस्तम् । उत्तर दिशा में जब बड़े भाई राज्यवर्धन ने प्रवेश किया तो पराक्रम के रस का अनुरोध करने वाली नई अवस्था को प्राप्त हुए, उत्कण्ठित वन-देवताओं के कटाक्षों से रंगीन कान्ति वाले, मृग सदृश नेत्र वाले हर्ष सिंह, शरभ, वराह आदि से भरी हुई हिमालय की तराईयों में आखेट करते हुए कुछ दिन तक बाहर ही रुक गए । उन्होंने धनुष की डोर को कान तक खींच कर तीखे बाणों की वर्षा करके थोड़े ही दिनों में तराई के जंगलों को खूंखार जानवरों से शून्य कर दिया । वहीं एक दिन रात के चौथे प्रहर में जब पौ फटने को हुई तो हर्ष ने स्वप्न में देखा कि दिशाओं को अपने ज्वालापुञ्ज से पिंजरित करती हुई अत्यन्त भीषण वनाग्नि में एक शेर जल रहा है और अपने बच्चों को छोड़ कर उसी अग्नि में शेरनी छलांग मार कर कूद रही है । उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ—'सचमुच संसार में स्नेह के बन्धन-पाश लोहे से भी बढ़ कर सख्त होते हैं, जिनसे आकृष्ट होकर तिर्यक् जीव भी इस प्रकार कर डालते हैं।' जब वे जगे तो उनकी बाईं आंख बार-बार फरकने लगी । एकाएक उनके अङ्गों में कंपकंपी होने लगी । बिना कारण ही हृदय बाहर निकला जा रहा था । दुःख का वेग बिना कारण ही बहुत बढ़ गया । यह क्या बात है ? इस प्रकार

२५२ हर्षचरितम्

हृदयम्। अकारणादेव चाजायत गरीयसी दुःखासिका। किमिदमिति च समुत्पन्नविविधविकल्पविमथितमतिरपगतधृतिश्चिन्तावनमितवदनः स्तिमिततारकेण चक्षुषा समुद्भिद्यमानस्थलकमलिनीवनामिव चकार चकोरैक्षणः क्षणं क्षोणीम्। अह्रि च तस्मिञ्शून्येनैव च चेतसा चिक्रीड मृगयाम्। आरोहति च हरितहये मध्यमहो भवनमागत्योभयतो मन्द- मन्दं संवाह्यमानतनुतालवृन्तः क्षितितलवित्तामतिशिशिरमलयजरसल- वलुलितवपुष्मिन्दुधवलोपधानधारिणीं वेत्रपट्टिकामधिशयानः साशङ्क एव तस्थौ।

अथ दूरादेव लेखगर्भया नीलीरागमेचकरुचा चीरचीरिकया रचितमु- ण्डमालकम्, श्रमातपाभ्यामारोप्यमाणकायकालिमानम्, अन्तर्गतने शोकशिचिनाऽङ्गारतामिव नीयमानम्, अतित्वरागमनद्रुततरपदोद्धूय- मानधूलिराजिव्याजेन राजवार्ताश्रवणकुतूहलिन्या मेदिन्येवानुगम्यमानम्, अभिमुखपवनप्रेङ्खत्प्रविततोत्तरीयपटप्रान्तवीज्यमानोभयपाश्र्वमतित्वरया

अथेत्यादौ। दूरादेव कुरङ्गकनामानमध्वगमापतन्तमद्राक्षीदिति संबन्धः। नीली- नामौषधिः। बर्हिकण्ठसमानो मेचकः। आरोप्यमाणः क्रियमाणः।

उनके मस्तिष्क में अनेक विकल्पों का मंथन शुरू हुआ, उनका धैर्य जाता रहा, केवल चिन्ता से सिर झुकाए हुए पृथिवी की ओर चकोर के समान एकटक से देखने लगे, मानों जमीन से स्थल-कमलिनियों का समूह निकल रहा हो। उस दिन उदास मन से ही आखेट किया। जब दिन चढ़ गया तब लौट कर निवासस्थान पर आए और जमीन पर बिछी हुई बेंत की शीतलपाटी पर जो अत्यन्त ठंढे चन्दन रस के छिड़काव से भींगी हुई थी और जिसके सिरहाने धवल उपधान (तकिया) रखा था, चिन्तित होकर बैठ गए। उनके दोनों ओर ताड़ के पंखे मंद-मंद झले जा रहे थे।

तभी उन्होंने दूर से ही कुरंगक नाम के लेखहारक को आते हुए देखा। उसके सिर पर नील में रँगी हुई पट्टी माला के समान बँधी हुई थी जिसके भीतर लेख था। एक तो चलने की थकान और उस पर कड़ाके की धूप दोनों से उसकी देह स्याह हो गई थी। हृदय के भीतर जलती हुई शोक की अग्नि के कारण अंगार-सा बन रहा था। वह बड़ी तेजी से चल रहा था। उसके पैर से लग कर धूल उड़ रही थी, मानों राजा का समाचार सुनने के कुतूहल से पृथिवी उसके पीछे-पीछे चली आ रही थी। सामने की ओर से बहती हुई हवा से उसके उत्तरीय के छोर दोनों बगल में फहरा रहे थे, मानों वह पंख बाँध कर शीघ्र दौड़ता हुआ चला आ रहा था। मानों उसे स्वामी का आदेश पीछे से