हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ हर्षचरितम्
अथ सकलकमलवनलक्ष्मीं वधूमूख इव संचार्ये समवसिते वासरे, विवाहदिवसश्रियः पादपल्लव इव रज्यमाने सवितरि, वधूवरानुरागलघुकृ- तप्रेमलज्जितेष्विव विघटमानेषु चक्रवाकमिथुनेषु, सौभाग्यध्वज इव रक्तां- शुकसुकुमारवपुषि नभसि स्फुरति संध्यारागे, कपोतकण्ठकर्बुरे वरयात्रा- गमनरजसीव कलुषयति दिङ्मुखानि तिमिरे, लग्नसंपादनसज्ज इवो- ज्जिहाने ज्योतिर्गणे, विवाहमङ्गलकलश इवोदयशिखरिणा समुत्क्षिप्यमाणे वर्धमानधवलच्छाये ताराधिपमण्डले, वधूवदनलावण्यज्योत्स्नापरिपोत- तमसि प्रदोषे, वृथोदितमुपहसत्स्विव रजनिकरमुत्तानितमुखेषु कुमुद्वने- ष्वाजगाम मुहुर्मुहुरुल्लासितस्फारस्फुरितारुणचामरैर्मनोरथैरिवोत्थितरागा- ग्रपल्लवैः पुरोधावमानैः पादातैरूत्कर्णकटकहयप्रतिहेषितदीयमानस्वागतै-
अथेत्यादौ। एतस्मिन्नेतस्मिन्सत्याजगामेति संबन्धः। कपोतेत्यसाधारणम्। कर्बुर आपाण्डुरे। रजसीवेति। रजोऽपि मुखानि कलुषयति। लग्नेत्यादि साधा- रणम्। उज्जिहान उद्गच्छति। ज्योतिर्गणैस्तारानिकरैः, गणकैश्च। वर्धमानेत्यादि संध्यारागहितत्वात्। वर्धमानं शरावः तेन च धवलच्छायम्। तद्धि मकोल्लिसं विवाहे क्रियते इत्याचारः। स्फारः स्फोटकः। पुरोधावमानैरिति साधारणम्। पादातैः पदातिसमूहैः।
सारे कमलवन की लक्ष्मी को वधू राज्यश्री के मुख में मानों अर्पित करके दिन ढल गया। विवाह-दिवस की श्री के चरण-पल्लव से मानों सूर्यबिम्ब लाल हो गया। वधू और वर के अनुराग के सामने प्रेम भाव के हल्के होने के कारण लज्जित होकर चकवाक के जोड़े पृथक् होने लगे। रक्तांशुक की भाँति कोमल संध्याराग सौभाग्यध्वज के समान आकाश में स्फुरित होने लगा। कबूतर के कंठ के सदृश अन्धकार आकाश को कलुषित कर रहा था, मानो बरात की चढ़त से धूल उड़कर भरने लगी हो। शुभ लग्न को ठीक करने में तारे मानों निकल कर तैयार होने लगे। उदयाचल द्वारा सिर पर उठाए गए विवाह के मंगलकलश के समान चन्द्रमण्डल की उज्ज्वल कान्ति बढ़ने लगी। वधू राज्य- श्री के लावण्य की चाँदनी से प्रदोषकाल का अन्धकार जब दूर हो गया तो फिर व्यर्थ उदित हुए चन्द्रमा को देखकर मुँह ऊँचा किए कुमुद मानों हँसने लगे। तभी लग्न के समय बरात लेकर ग्रहवर्मा उपस्थित हुआ। पैदल चलने वाले बराती बार-बार अपनी लाल ध्वजा को फटकाते चले आ रहे थे, मानों राजा के पल्लव वाले आगे दौड़ते हुए उनके मनोरथ हों। कान खड़े किए छावनी के घोड़ों की हिनहिनाहट के साथ किए जाने वाले स्वागत को स्वीकार करते हुए बराती घोड़े भी उस दिग्भाग को भरने लगे। हिलते