भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

चतुर्थ उच्छ्वासः २४३ रिव वाजिनां वृन्दैरापूरितदिग्विभागः, चलकर्णचामराणां चामीकरमय- सर्वोपकरणानां वर्णकलम्बिनां बलिनां घण्टाटाङ्कारिणां करिणां घटाभिः घटयन्निव पुनरिन्दूदयविलीनमन्धकारम् , नक्षत्रमालामण्डितमुखीं करिणीं निशाकर इव पौरंदरीं दिशमारूढः प्रकटितविविधविहगविरुतैस्तालावच- रचारणैः पुरःसरैर्बालो वसन्त इवोपवनैः क्रियमाणकोलाहलो गन्धतैला- वसेकसुगन्धिना दीपिकाचक्रवालालोकेन कुङ्कुमपटवासधूलिपटलेनेव पि- ञ्जरीकुर्वन्सकलं लोकम् , उत्फुल्लमल्लिकामण्डमाला मध्याध्यासितकुसुमशे- खरेण शिरसा हसन्निव सपरिवेषक्षपाकरं कौमुदीप्रदोषम्, आत्मरूपनि- र्जितमकरकेतुक.रापहृतेन कार्मुकेणेव कौसुमेन दाम्ना विरचितवैकक्षकवि- लासः कुसुम सौरभगर्वभ्रान्तभ्रमरकुलकलकलप्रलापसुभगः पारिजात इव जातः श्रिया सह पुनरवतारितो मेदिनीम्, नववधूवदनावलोकनकुतूहले- नेव कृष्यमाणहृदयः पतन्निव मुखेन प्रत्यासन्नलग्नो ग्रहवर्मा त्वरित- माजगाम। राजा तु तमुपद्वारमागतं चरणाभ्यामेव राजचक्रानुगम्यमानः ससुतः हुए कान पर चँवर लिए, सोने के समस्त उपकरणों से सजाए गए, भाँति-भाँति के बलवान् हाथी घंटा की टंकार करते चले आ रहे थे मानों चन्द्रमा के उदय होने से विलीन अन्ध- कार को फिर जुटाने लगे। ग्रहवर्मा नक्षत्रमाला नामक आभरण से सुसज्जित हथिनी पर चढ़ा हुआ उस प्रकार लग रहा था जैसे चन्द्रमा ताराओं से शोभित पूर्व दिशा में ऊपर की ओर चढ़ा हो । उसके आगे-आगे चारण लोग तालयुक्त गान करते चल रहे थे जिससे चिड़ियों के चहचहाने जैसा शब्द हो रहा था । गन्ध तैल पड़ने से सुगन्धित दीपक जल रहे थे, मानों कुंकुम और पटवास की धूलि सब ओर सब लोगों को पिञ्जरित कर रही थी । ग्रहवर्मा विकसित मालतीकुसुमशेखर की माला सिरपर धारण कर रहा था, मानों परि- वेष के साथ उदित हुए चन्द्रवाले चन्द्रिकायुक्त प्रदोषकाल पर हँस रहा था। अपने रूप के सामने हारे हुए कामदेव के हाथ से छीन कर लिए गए धनुष के समान उसका पुष्प- दाम का बना हुआ वैकक्षक शोभ रहा था। भौंरे उसके फूलों पर गुंजारते हुए जूझ रहे थे, मानो पारिजात ही श्री के साथ उतर आया हो । नई वधू राज्यश्री का मुखड़ा देखने के कुतूहल से खिंचे जाते हुए हृदय वाला वह मानों मुँह की ओर से दौड़ कर आया । राजाओं और दोनों राजकुमारों के साथ पैदल ही चल कर द्वार के समीप पहुँचे हुए