भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

२४४ हर्षचरितम् प्रत्युज्जगाम । अवतीर्णं च तं कृतनमस्कारं मन्मथमिव माधवः प्रसारित- भुजो गाढमालिङ्गि । यथाक्रमं परिष्वक्तराज्यवर्धनहर्षं च हस्ते गृहीत्वा- भ्यन्तरं निन्ये । स्वनिर्विशेषासनदानादिना चैनमुपचारेणोपचचार । न चिराच्च गम्भीरनामा नृपतेः प्रणयी विद्वान्द्विजन्मा ग्रहवर्माणमु- वाच—'तात ! त्वां प्राप्य चिरात्खलु राज्यश्रिया घटितौ तेजोमयौ सकल- जगद्धीयमानबुधकर्णानन्दकारिगुणगणौ सोमसूर्यवंशाविव पुष्यभूतिमुखर- वंशौ । प्रथममेव कौस्तुभमणिरिव गुणैः स्थितोऽसि हृदये देवस्य । इदानीं तु शशीव शिरसा परमेश्वरेणासि वोढव्यो जातः' इति । एवं वदत्येव तस्मिन्नृपमुपसृत्य मौहूर्तिकाः 'देव ! समासीदति लग्न- वेला । व्रजतु जामाता कौतुकगृहम्' इत्युचुः । अथ नरेन्द्रेण 'उत्तिष्ठ, गच्छ' इति गदितो ग्रहवर्मा प्रविश्यान्तःपुरं जामातृदर्शनकुतूहलिनीनां राज्यश्रिया नृपतिलक्ष्म्यापि । घटितौ योजितौ, मुक्तौ च । बुधकर्णौ पण्डित- श्रोत्रे, सोमसूर्यसूनू च । गुणैरुत्कर्षैः, तन्तुभिश्च । हृदये चेतसि, वक्षसि च । देवस्य राज्ञः, विष्णोश्च । परमेश्वरेण राज्ञा, हरेण च । कौतुकगृहं विवाहमङ्गलवेश्म । उसका स्वागत किया। जैसे वसन्त कामदेव से मिलता है उसी प्रकार उन्होंने हाथ फैलाकर हथिती से उतार कर झुके हुए उसका आलिङ्गन किया। क्रम से राज्यवर्धन और हर्ष भी जब गले मिले तो राजा हाथ से पकड़ कर उसे भीतर ले गए। अपने समान आसन आदि उपचारों से उसका सम्मान किया। उसी समय गम्भीर नामक राजा के प्रिय विद्वान् ब्राह्मण ने ग्रहवर्मा से कहा— 'हे तात, राज्यश्री के साथ तुम्हें सम्बन्धित पाकर आज पुष्पभूति और मुखर दोनों के वंश तेजस्वी, सारे संसार के लोगों को आनन्दित करने वाले सोम और सूर्य वंश के समान धन्य हुए। पहले से ही देव प्रभाकरवर्धन ने कौस्तुभमणि के समान तुम्हें धारण किया है। इस समय जैसे शिवने चन्द्र को अपने मस्तकपर धारण किया है उसी प्रकार तुम भी उनक शिरोधार्य हो रहे हो। ब्राह्मण गम्भीर यह कह ही रहे थे कि ज्योतिषियों ने आकर कहा—'राजन्, लग्न का समय निकट है। जामाता कौतुकगृह में चलें।' राजा के 'उठो, जाभो' कहने पर ग्रहवर्मा ने अन्तःपुर में प्रवेश किया और वर को देखने के कुतूहल में स्त्रियों की खिले-