हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उच्छ्वासः २४५ स्त्रीणां पतितानि लोचनसहस्राणि विकचनीलकुवलयवनानीव लङ्घयन्ना- ससाद कौतुकगृहद्वारम् । निवारितपरिजनश्च प्रविवेश । अथ तत्र कतिपयाप्तप्रियसखीस्वजनप्रमदाप्रायपरिवाराम् , अरुणांशु- कावगुण्ठितमुखीं प्रभातसंध्यामिव स्वप्रभया निष्प्रभान्प्रदीपकान्कुर्वाणाम् , अतिसौकुमार्यशङ्कितेनेव यौवनेन नातिनिर्भरमुपगूढाम् , साध्वसनिरुध्य- मानहृदयदेशदुःखमुक्तैर्निभृतार्यतैः श्वसितैरपयान्तं कुमारभावमिवानुशोच- न्तीम् , अत्युत्कम्पिनीं पतनभियेव त्रपया निष्पन्दं धार्यमाणाम् , हस्तं तामरसप्रतिपक्षमासन्नग्रहणं शशिनमिव रोहिणीं भयवेपमानमानसामव- लोकयन्तीम् , चन्दनधवलतनुताम् , ज्योत्स्नादानसंचितलावण्यात्कुमु- दिनोगर्भादिव प्रसूताम् , कुसुमामोदनिर्हारिणीं वसन्तहृदयादिव निर्गताम्, निःश्वासपरिमलाकृष्टमधुकरकुलां मलयमारुतादिवोत्पन्नाम् , कृतकंदर्पा- अथेत्यादौ । तत्र वधूमपश्यदिति संबन्धः । अरुणांशुकं लोहितं वस्त्रम् । अरु- णस्याल्पांशवोऽंशुकाः । निभृतैर्गुप्तैः । प्रतिपक्षस्तुल्यः, शत्रुश्च । ग्रहणं हस्तस्य स्वीकारः, शशिनश्च ग्रहणं समासङ्गं भवति । उद्गमनं सौरभमित्यन्ये । प्रभावीनां कौस्तुभादिभिर्यथासंख्यम् । बालिका ऊर्मिका, कौमारी च । विनोदयन्तीं प्रथय- न्तीम् । हारिणीं रम्याम्, मार्गा च । हुए कुवलय के समान गिरती हुई आँखों को लांघते हुए कौतुकगृह के द्वार पर पहुंचा। अन्य लोग द्वार पर ही रोक दिए गए और उसने भीतर प्रवेश किया । तब उसने वहाँ वधूवेश में राज्यश्री को देखा । वह कुछ मान्य और प्रियसखियों से और स्वजन स्त्रियों से घिरी हुई थी । प्रभात काल की संध्या के समान लाल अंशुक का घूंघट डाले अपनी प्रभा से दीपों को निष्प्रभ कर रही थी । मानों यौवन ने उसे अत्यन्त सुकुमार जान कर कस कर नहीं दबाया था । भय के कारण रुंधे हुए हृदयदेश से वह कठिनता से लम्बी सांस लेती थी, मानों अब छोड़ कर जाते हुए कुमारभाव के बारे में चिन्ता कर रही थी । वह कांप रही थी, फिर भी गिर जाने के भय से उसे लज्जा ने मानों पकड़ रखा था । भय से कांपते हुए मन वाली वह कमल के प्रतिपक्षी अपने हाथ को देख रही थी, मानों ग्रहणसमय निकट होने पर कातर होकर रोहिणी चन्द्रमा को देख रही हो । चन्दन के लगाने से उसकी देह और भी सफेद हो रही थी, मानों चन्द्र के द्वारा दी गई ज्योत्स्ना के लावण्य से भरे हुए कुमुदिनी के गर्भ से उत्पन्न हुई हो । फूल की गन्ध से वह और भी मनोहर लग रही थी, मानों वसन्त के हृदय से निकली हो । उसके निश्वास के परिमल में भौरे खिंचते जा रहे थे, मानों वह