भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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२४६ हर्षचरितम् नुसरणां रतिमिव पुनर्जाताम्, प्रभालावण्यमदसौरभमाधुर्यैः कौस्तुभश- शिमदिरापारिजातामृतप्रभवैः सर्वरत्नगुणैरपरामिव सुरासुररुषा रत्नाकरेण कल्पितां श्रियम्, स्निग्धेन बालिकालोकेन सितसिन्दुवारकुसुममञ्जरी- भिरिव मुक्तादीधितिभिः कल्पितकर्णावतंसाम्, कर्णाभरणमरकतप्रभाह- रितशाद्वलेन कपोलस्थलीतलेन विनोदयन्तीमिव हारिणीं लोचनच्छा- याम्, अधोमुखं वरकौतुकालोकनाकुलं मुहुर्मुहुः कृतमुखोन्नमनप्रयत्नं सखीजनं हृदयं च निर्भर्त्सयन्तीं वधूमपश्यत्। प्रविशन्तमेव तं हृदयचौरं वध्वा समर्पितं जग्राह कंदर्पः। परिहास- स्मेरमुखीभिश्च नारीभिः कौतुकगृहे यद्यत्कार्यते जामाता तत्तत्सर्वमति- पेशलं चकार। कृतपरिणयानुरूपवेशपरिग्रहां गृहीत्वा करे वधूं निर्जगाम। जगाम च नवसुधाधवलां निमन्त्रितागतैस्तुषारशैलोपत्यकामिव त्र्यम्ब- मृगलोचनच्छायां नीलशाद्वलेन स्थलीतले क्रीडति। कौतुकालोकनाकुलं द्वयमपि साधारणम्। वध्वा राज्यश्रिया। अथ वेदीं जगामेति संबन्धः। उपत्यकाद्रेः समासन्ना भूः। मलयमारुत से उत्पन्न हो। वह कामदेव का अनुसरण कर रही थी, मानों रति ने फिर जन्म लिया हो। वह अपनी प्रभा, लावण्य, मद, सौरभ, माधुर्य आदि गुणों से दूसरी लक्ष्मी के समान मालूम पड़ रही थी, मानों जिसे कौस्तुभमणि, चन्द्र, मदिरा, पारिजात और अमृत से उत्पन्न समस्त रत्न के उन गुणों के साथ समुद्र ने देवता और असुरों पर क्रोध करके फिर से उत्पन्न किया हो। उसके कानों में मोती की बालियों की किरणें उजले सिन्धुवार पुष्प की मंजरी की भांति अवतंस बन रहीं थीं। पन्ने के कर्णाभरण की हरी प्रभा उसके कपोलों पर पड़ रही थी, मानों वह आँखों की सुन्दर कान्ति को व्यक्त. कर रही थी। दिखाने के लिए प्रयत्न में लगी हुई सखियां उसके झुके हुए मुंह को बार-बार उठाने का प्रयत्न कर रही थीं, वह उन्हें और अपने हृदय को भी कोस रही थी। प्रवेश करते ही राज्यश्री के द्वारा दिए गए अपने हृदय के चोर उस ग्रहवर्मा को कामदेव ने पकड़ लिया। हँसी-मजाक करने वाली नवेलियों ने कोहबर में जो-जो करने के लिए कहा ग्रहवर्मा ने बिना जिद के सब किया। विवाह के अनुकूल वेषभूषा में सुसज्जित वधू का हाथ पकड़ कर वह निकला और वेदी के पास पहुंचा। वह (वेदी) चूने से ताजी पोती हुई थी, मानों शिव-पार्वती के विवाह में निमंत्रण पर आए हुए