भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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चतुर्थ उच्छ्वासः २४७ काम्बिकाविवाहाहूतैर्भूभृद्भिः परिवृताम्, सेकसुकुमारयवाङ्कुरदन्तुरैः पञ्चा- स्यैः कलशैः कोमलवर्णिकाविचित्रैरमित्रमुखैश्च मङ्गल्यफलहस्ताभिरञ्ज- लिकारिकाभिरुद्भासितपर्यन्ताम्, उपाध्यायोपधीयमानेन्धनधूमायमाना- मिसंधुक्षणाक्षणिकोपद्रष्टृद्विजाम्, उपकृशानुनिहितानुपहतहरितकुशाम्, संनिहितदृषदजिनाज्यस्रुक्समित्पूलिनिवहाम्, नूतनशूर्पोर्पितश्यामलशमी- पलाशमिश्रलाजहासिनीं वेदीम् । आरुरोह च तां दिवमिव सज्योत्स्नः शशी । समुत्ससर्प च वेल्लितारुणशिखापल्लवस्य शिखिनः कुसुमायुध इव रतिद्वितीयो रक्ताशोकस्य समीपम् । हुते च हुतभुजि प्रदक्षिणावर्तप्रवृत्ता- भिर्वधूवदनवलोकनकुतूहलिनीभिरिव ज्वालाभिरेव सह प्रदक्षिणं बभ्राम । पात्यमाने च लाजाञ्जलौ नखमयूर्खधवलिततनुरदृष्टपूर्ववधूवररूपविस्म- यस्मेर इवादृश्यत विभावसुः । भूभृन्नृपः, गिरिश्च । वर्णिका खटिका । अमित्रमुखै रूप्यमयैः, शत्रुमुखैश्च । अञ्ज- लिकारिकाभिर्मृन्मयप्रतिमाभिः, सालभञ्जिकाभिर्वा । क्षणिको व्यग्रः । उपद्रष्टा साक्षी उपदेश्य इति केचित् । स्रुग्धोमपात्रम् । वेल्लिता वलिताः । शिखा ज्वाला, शिखाग्राणि च । पल्लवाः प्रान्ताः, किसलयानि च । शिखिनो वृक्षस्यापि । उक्तं च—'अग्निः शिखीति च प्रोक्तः शिखी वृक्षो निगद्यते । बर्हिणश्च शिखी प्रोक्तः कृचि- त्स्यात्कुक्कुटः शिखी ॥' इति च । अनेकों पर्वतों से भरी हुई हिमालय की तराई हो । चारों ओर पास में चौड़े मुँह के कलसे रखे हुए थे, पानी की तरी से नये यवांकुर उनमें उग गए थे । उनपर हल्को बनी की खरिया पुती हुई थी और उन्होंने सूर्य का मुख नहीं देखा था । मंगलार्थ फल को हाथ में लिए मिट्टी की मूरतें खड़ी थीं। ईंधन देने से धुंवा उगलती हुई अग्नि को प्रज्वलित करने में साक्षी रूप बैठे हुए ब्राह्मण व्यग्र हो रहे थे। अग्नि के समीप ही हरे-हरे लम्बे कुश रखे हुए थे । अश्मारोहण के लिए सिल, कृष्ण मृगचर्म, घृत, स्रुवा और समिधाएं रखी हुई थीं। जैसे ज्योत्स्ना के साथ चन्द्र आकाश में चढ़ता है उसी प्रकार ग्रहवर्मा भी वधू राज्यश्री के साथ विवाहवेदी पर चढ़े और जैसे कामदेव रति को साथ लेकर रक्ताशोक के समीप पहुंचता है उसी प्रकार हिलती हुई लाल शिखा से युक्त अग्नि के पास आए । हवन करने के पश्चात् दक्षिण की ओर मुड़ती हुई मानों वधू का मुखड़ा देखने के कुतूहल वाली ज्वालाओं के साथ उन दोनों ने अग्नि के चारों ओर भांवरे लीं और लाजाञ्जलियाँ छोड़ीं । तब वर और वधू की नखकिरणों से और भी