हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ हर्षचरितम् अत्रान्तरे स्वच्छकपलोदरसंक्रान्तमनलप्रतिबिम्बमिव निर्वाप्यन्ती स्थूलमुक्ताफलविमलबाष्पबिन्दुसंदोहदर्शितदुर्दिना निर्वदनविकारं रुरोद वधूः । उदश्रुविलोचनानां च बान्धववधूनामुदपादि महानाक्रन्दः । परि- समापितवैवाहिकक्रियाकलापस्तु जामाता वध्वा समं प्रणनाम श्वशुरौ । प्रविवेश च द्वारपक्षलिखितरतिप्रीतिदैवतं प्रणयिभिरिव प्रथमप्रविष्टैरलि- कुलैः कृतकोलाहलम् , अलिकुलपक्षपवनप्रेङ्खोलितैः कर्णोत्पलप्रहारभयप्र- कम्पितैरिव मङ्गलप्रदीपैः प्रकाशितम् , एकदेशलिखितस्तबकितरक्ताशोक- तरुतलभाजाधिज्यचापेन तिर्यक्कूणितनेत्रत्रिभागेन शरमृजूकुर्वता कामदे- वेनाधिष्ठितम् , एकपार्श्वन्यस्तेन काञ्चनाचामरुकेणेतरपार्श्ववर्तिन्या च दान्तशफरुकधारिण्या कनकपुत्रिकया साक्षालक्ष्म्येवोद्दण्डपुण्डरीकहस्तया सनाथेन सोपधानेन स्वास्तीर्णेन शयनेन शोभमानम् , शयनशिरोभाग-
निर्वापयन्ती गमयन्ती । प्रविशेत्यादौ । जामाता वासगृहमिति संबन्धः । पक्षः पार्श्वम् । कूणितः संकोचितः ।
प्रकाशमान अग्निदेव मानों पहले कभी नहीं देखे हुए इस प्रकार वर-वधू के रूप को देखकर आश्चर्य के साथ प्रसन्न दीख पड़े । इसी बीच वधू राज्यश्री मानों अपने स्वच्छ कपोलों में पड़ती हुई अग्नि की छाया को बुझाती हुई, और स्थूल मुक्ताफल जैसे निर्मल आँसुओं से दुर्दिन का दृश्य उपस्थित करती हुई मुख की विकृति के बिना ही रोने लगी । बान्धव-बन्धुओं की आँखें भी आँसू से छल-छला उठीं और तब एक प्रकार का शोरगुल मचा । इधर विवाह का विधि विधान समाप्त करके जामाता ने वधू के साथ सास-ससुर को प्रणाम किया और वासगृह में प्रविष्ट हुआ । उस वासगृह के दोनों पक्षों पर एक ओर रति और दूसरी ओर प्रीति ( कामदेव की दोनों स्त्रियों ) के चित्र बनाए गए थे। प्रेमी के समान पहले ही घुसकर भौरों ने कोलाहल शुरू किया । भौरों के पंख की हवा से हिलते हुए मानों कर्णोत्पल के प्रहार के भय से कांपते हुए मंगलदीप उस गृह को प्रकाशित कर रहे थे । एक ओर फूलों से लदे रक्ताशोक के नीचे धनुष पर बाण रखकर तिरछी ऐंची हुई मिचमिचाती आँख से निशाना साधते हुए कामदेव का चित्र बना था । अन्दर सफेद चादर से ढंका हुआ पलंग बिछा था जिसके सिरहाने तकिया रखा था । उसके एक पार्श्व में सोने की एक झारी रखी थी और दूसरी ओर हाथीदाँत का डिब्बा लिए हुए सोने की पुतली