हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थितेन च कृतकुमुदशोभेन कुसुमायुधसाहायकायागतेन शशिनेव निद्राकलशेन राजतेन विराजमानं वासगृहम्। तत्र च ह्रीताया नववधूकायाः पराङ्मुखप्रसुप्ताया मणिभित्तिदर्पणेषु मुखप्रतिबिम्बानि प्रथमालापाकर्णनकौतुकागतगृहदेवताननानीव मणिग- वाक्षकेषु वीक्षमाणः क्षणदां निन्ये। स्थित्वा च श्वशुरकुले शीलेनामृत- मिव श्वश्रूहृदये वर्षन्नभिनवाभिनवोपचारैर्पुनरुक्तान्यानन्दमयानि दश दिनानि, दत्त्वा च राजदौवारिकमिव राजकुले रणरणकं यौतकनिवेदिता- नीव शम्बलान्यादाय हृदयानि सर्वलोकस्य कथंकथमपि विसर्जितो नृपेण वध्वा सह स्वदेशमगमदिति। इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते चक्रवर्तिजन्मवर्णनं नाम चतुर्थ उच्छ्वासः।
क्षणदां रात्रिम्। दश दिनानि स्थित्वेति संगतिः। यातकं सुदायः। इति श्रीशंकरविरचिते हर्षचरितसंकेते चतुर्थ उच्छ्वासः।
खड़ी थी। नीचे पलंग के सिरहाने कुमुदों से शोभित मानो कामदेव की सहायता के लिए पहुंचे हुए चन्द्रमा के समान चाँदी का निद्रा-कलश रखा हुआ था। वहाँ लज्जित होकर पराङ्मुख सोई हुई नववधू राज्यश्री के मुखड़े के प्रतिबिम्बों को मणिभित्ति में लगाए गए दर्पणों में देखने लगा, वे प्रतिबिम्ब मानों पहली मुलाकात की बातचीत सुनने के कुतूहल से मणिगवाक्षों में खड़े होकर ताक झांक करती हुई गृहदेवताओं के मुख हों। इस प्रकार उसने रात बिताई। इस प्रकार ग्रहवर्मा श्वशुरकुल में अपने शील से सास के हृदय में अमृत की वर्षा करता हुआ नित्य नये-नये उपचारों से दस दिनों तक आनन्द के साथ रहा और द्वारपाल के समान राजकुल में अपना विच्छेदजनित उद्वेग देकर दहेज में मिली हुई सामग्री के साथ सब लोगों के हृदय को भी लेते हुए किसी-किसी प्रकार राजा के द्वारा बिसर्जित हुआ वधू राज्यश्री को विदा करा अपने स्थान को लौट गया। हर्षचरित चतुर्थ उच्छ्वास समाप्त।