भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

पञ्चम उच्छ्वासः नियतिर्विधाय पुंसां प्रथमं सुखमुपरि दारुणं दुःखम् । कृत्वा लोकं तरला तडिदिव वज्रं निपातयति ॥ १ ॥ पातयति महापुरुषान्सममेव बहूननादरेणेव । परिवर्तमान एकः कालः शैलानिवानन्तः ॥ २ ॥ अथ कदाचिद्राजा राज्यवर्धनं कवचहरमाहूय हूणान्हन्तुं हरिणानिव हरिर्हरिणेशकिशोरमपरिमितबलानुयातं चिरंतनैरमात्यैरनुरक्तैश्च महासा- मन्तैः कृत्वा सामिसरमुत्तरापथं प्राहिणोत् । प्रयान्तं च तं देवो हर्षः कतिचित्प्रयाणकानि तुरङ्गमैरनुवव्राज । प्रविष्टे च कैलासप्रभाभासिनीं ककुभं भ्रातरि वर्त मानो नवे वयसि विक्र- नियतीत्यादि । नियतिर्दैवम् । लोकं जनम् । तडिद्विद्युत् । तडिदपि तरलाऽऽ- लोकं कृत्वा वज्रम् निपातयति ॥ १ ॥ अनन्तः पर्यन्तरहितः, शेषभट्टारकश्च ॥ २ ॥ आर्यायुगलेनानेन भाविनी राजविपत्तिः सूचिता । कवचहर इति वयसि नित्यम् । बलं सैन्यम्, सामर्थ्यं च । सामिसरं ससहायम् । जैसे चंचल बिजली क्षण भर अपनी चमक दिखाकर बार-बार वज्रपात करने लग जाती है उसी प्रकार नियति भी पहले-पहल लोगों पर सुख की चमक दिखाती है और फिर वज्र के समान भीषण दुःख ही दुःख गिराने लग जाती है ॥ १ ॥ करवट बदलता हुआ यह कालचक्र अनेक महापुरुषों को भी बिना किसी लगाव के एक साथ बिलट डालता है, जैसे प्रलय के समय में पृथिवी को सहस्र फणों पर धारण करने वाला शेषनाग सुस्ताने के लिए बोझा बदलता है तो बड़े-बड़े पहाड़ उलट-पुलट जाते हैं ॥२॥ किसी समय राजा प्रभाकरवर्धन ने कवच पहनने की आयु वाले अपने पुत्र राज्यवर्धन को बुलाकर हूणों से युद्ध करने के लिए उत्तरापथ की ओर भेजा, जैसे सिंह हरिणों को मारने के लिए अपने बाल सिंह को भेजता है । पुराने मन्त्रियों और अपने में मिले हुए महासामन्तों की देख-रेख में अपरिमित सेना को भी उसके साथ किया । युद्ध के लिए प्रयाण करते हुए राज्यवर्धन को देखकर देव हर्ष भी कुछ पड़ावों तक घोड़ों के साथ पीछे-पीछे गए । कैलास पर्वत की उज्ज्वल प्रभा से उद्भासित होने वाली