भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

पञ्चम उच्छ्वासः २५१ मरसानुरोधिनि केसरिशरभशार्दूलवराहबहुलेषु तुषारशैलोपकण्ठेष्पूत्कण्ठ- मानवनदेवताकटाक्षांशुशारितशरीरकान्तिः क्रीडन्मृगयां मृगलोचनः कति- पयान्यहानि बहिरैव व्यलम्बत । चकार चाकर्णान्ताकृष्टकार्मुकनिर्गतभा- सुरभल्लवर्षी स्वल्पीयोभिरेव दिवसैर्निःश्वापदान्यरण्यानि । एकदा तु वासतेय्यास्तुरीये यामे प्रत्यूषस्येव स्वप्ने चटुलज्वालापु- ञ्जपिञ्जरीकृतसकलककुभा दुर्निवारेण दवहुतभुजा दह्यमानं केसरिणम- द्राक्षीत् । तस्मिन्नेव च दावदहने समुत्सृज्य शावकानुत्प्लुत्य चात्मानं पातयन्तीं सिंहीमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'लोके हि लोहेभ्यः कठिनतराः खलु स्नेहमया बन्धनपाशाः, यदाकृष्टास्तिर्यञ्चोऽप्येवमाच- रन्ति' इति । प्रबुद्धस्य चास्य मुहुर्मुहुर्दक्षिणेतरमक्षि पस्पन्दे । गात्रेषु चाकस्मादेव वेपथुर्विपप्रथे । निनिमित्तमेवान्तर्बन्धनस्थानाच्चचालेव केसरिणः सिंहाः । अष्टपादाः प्राणिविशेषाः शरभाः । शार्दूला व्याघ्राः । वराहाः सूकराः । क्रीडन्मृगयामिति । 'कालभावाध्वगन्तव्या कर्मसंज्ञा ह्यकर्मणाम्' इति भावार्थरूपाया मृगयायाः कर्मभावः । वासतेयी रात्रिः । तुरीये चतुर्थेऽहनि । संवाह्यमानं भ्राम्यमाणम् । लुलितं न्यस्तम् । उत्तर दिशा में जब बड़े भाई राज्यवर्धन ने प्रवेश किया तो पराक्रम के रस का अनुरोध करने वाली नई अवस्था को प्राप्त हुए, उत्कण्ठित वन-देवताओं के कटाक्षों से रंगीन कान्ति वाले, मृग सदृश नेत्र वाले हर्ष सिंह, शरभ, वराह आदि से भरी हुई हिमालय की तराईयों में आखेट करते हुए कुछ दिन तक बाहर ही रुक गए । उन्होंने धनुष की डोर को कान तक खींच कर तीखे बाणों की वर्षा करके थोड़े ही दिनों में तराई के जंगलों को खूंखार जानवरों से शून्य कर दिया । वहीं एक दिन रात के चौथे प्रहर में जब पौ फटने को हुई तो हर्ष ने स्वप्न में देखा कि दिशाओं को अपने ज्वालापुञ्ज से पिंजरित करती हुई अत्यन्त भीषण वनाग्नि में एक शेर जल रहा है और अपने बच्चों को छोड़ कर उसी अग्नि में शेरनी छलांग मार कर कूद रही है । उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ—'सचमुच संसार में स्नेह के बन्धन-पाश लोहे से भी बढ़ कर सख्त होते हैं, जिनसे आकृष्ट होकर तिर्यक् जीव भी इस प्रकार कर डालते हैं।' जब वे जगे तो उनकी बाईं आंख बार-बार फरकने लगी । एकाएक उनके अङ्गों में कंपकंपी होने लगी । बिना कारण ही हृदय बाहर निकला जा रहा था । दुःख का वेग बिना कारण ही बहुत बढ़ गया । यह क्या बात है ? इस प्रकार