भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

२५२ हर्षचरितम्

हृदयम्। अकारणादेव चाजायत गरीयसी दुःखासिका। किमिदमिति च समुत्पन्नविविधविकल्पविमथितमतिरपगतधृतिश्चिन्तावनमितवदनः स्तिमिततारकेण चक्षुषा समुद्भिद्यमानस्थलकमलिनीवनामिव चकार चकोरैक्षणः क्षणं क्षोणीम्। अह्रि च तस्मिञ्शून्येनैव च चेतसा चिक्रीड मृगयाम्। आरोहति च हरितहये मध्यमहो भवनमागत्योभयतो मन्द- मन्दं संवाह्यमानतनुतालवृन्तः क्षितितलवित्तामतिशिशिरमलयजरसल- वलुलितवपुष्मिन्दुधवलोपधानधारिणीं वेत्रपट्टिकामधिशयानः साशङ्क एव तस्थौ।

अथ दूरादेव लेखगर्भया नीलीरागमेचकरुचा चीरचीरिकया रचितमु- ण्डमालकम्, श्रमातपाभ्यामारोप्यमाणकायकालिमानम्, अन्तर्गतने शोकशिचिनाऽङ्गारतामिव नीयमानम्, अतित्वरागमनद्रुततरपदोद्धूय- मानधूलिराजिव्याजेन राजवार्ताश्रवणकुतूहलिन्या मेदिन्येवानुगम्यमानम्, अभिमुखपवनप्रेङ्खत्प्रविततोत्तरीयपटप्रान्तवीज्यमानोभयपाश्र्वमतित्वरया

अथेत्यादौ। दूरादेव कुरङ्गकनामानमध्वगमापतन्तमद्राक्षीदिति संबन्धः। नीली- नामौषधिः। बर्हिकण्ठसमानो मेचकः। आरोप्यमाणः क्रियमाणः।

उनके मस्तिष्क में अनेक विकल्पों का मंथन शुरू हुआ, उनका धैर्य जाता रहा, केवल चिन्ता से सिर झुकाए हुए पृथिवी की ओर चकोर के समान एकटक से देखने लगे, मानों जमीन से स्थल-कमलिनियों का समूह निकल रहा हो। उस दिन उदास मन से ही आखेट किया। जब दिन चढ़ गया तब लौट कर निवासस्थान पर आए और जमीन पर बिछी हुई बेंत की शीतलपाटी पर जो अत्यन्त ठंढे चन्दन रस के छिड़काव से भींगी हुई थी और जिसके सिरहाने धवल उपधान (तकिया) रखा था, चिन्तित होकर बैठ गए। उनके दोनों ओर ताड़ के पंखे मंद-मंद झले जा रहे थे।

तभी उन्होंने दूर से ही कुरंगक नाम के लेखहारक को आते हुए देखा। उसके सिर पर नील में रँगी हुई पट्टी माला के समान बँधी हुई थी जिसके भीतर लेख था। एक तो चलने की थकान और उस पर कड़ाके की धूप दोनों से उसकी देह स्याह हो गई थी। हृदय के भीतर जलती हुई शोक की अग्नि के कारण अंगार-सा बन रहा था। वह बड़ी तेजी से चल रहा था। उसके पैर से लग कर धूल उड़ रही थी, मानों राजा का समाचार सुनने के कुतूहल से पृथिवी उसके पीछे-पीछे चली आ रही थी। सामने की ओर से बहती हुई हवा से उसके उत्तरीय के छोर दोनों बगल में फहरा रहे थे, मानों वह पंख बाँध कर शीघ्र दौड़ता हुआ चला आ रहा था। मानों उसे स्वामी का आदेश पीछे से