भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 506 में से

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पृष्ठ 298

पञ्चम उच्छ्वासः २५३ कृतपक्षमिवाशु परापतन्तम्, प्रेर्यमाणमिव पृष्ठतः स्वाम्यादेशेनाकृष्यमा- णमिव पुरस्तादायतैः श्रमश्वासमोक्षैः स्विद्यल्ललाटतटघटमानप्रतिबिम्ब- केन कार्यकौतुकादपह्रियमाणलेखमिव भास्वता संभ्रमभ्रष्टैरिवेन्द्रियैः शून्यीकृतशरीरम्, लेखार्पितप्रयोजनगौरवादिव समेऽपि वर्त्मनि शून्य- हृदयतया स्खलन्तम्, कालमेघशकलमिव पतिष्यतो दुर्वातावज्रस्य, धूमपल्लवमिव ज्वलिष्यतः शोकज्वलनस्य, बीजमिव फलिष्यतो दुष्कृ- तशालेरनिमित्तभूतदीर्घाध्वगं कुरङ्गकनामानमायान्तमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा च पूर्वनिमित्तपरम्पराविर्भावितभीतिरभिद्यत हृदयेन । कुरङ्ग- कस्तु कृतप्रणामः समुपसृत्य प्रथममाननलग्नं विषादमुपनिन्ये, पश्चाल्ले- खम् । तं च देवो हर्षः स्वयमेवादायावाचयत् । लेखार्थेनैव च समं गृहीत्वा हृदयेन संतापमवग्रहरूपोऽभ्यधात्—'कुरङ्गक ! किं मान्द्यं तात- स्य ?' इति । स चक्षुषा बाष्पजलबिन्दुभिर्मुखेन च खञ्जाक्षरैः क्षरद्भि- इन्द्रियैरिति । शून्यत्वं तेषां जडत्वासेः । शकलं खण्डम् । प्रेरित कर रहा था । श्रम के कारण लम्बी सांस छोड़ने से वह मानों आगे की ओर खिंचता जा रहा था । पसीने से तर उसके ललाट पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ रहा था मानों 'किस कार्य से जा रहा है ?' यह जानने के कौतुक से सूर्य उसके माथे पर खोंसे हुए लेख को चुराने की कोशिश कर रहा था । कार्य की व्यग्रता के कारण इन्द्रियां मानों शरीर से पृथक् हो गई थीं । लेख की बात इतनी गम्भीर थी कि वह समतल मार्ग पर भी हृदयशून्य होकर गिरता-पड़ता आ रहा था । थोड़ी ही देर में अकुशल समाचार के गिरने वाले वज्र का वह मानों काला मेघखण्ड था । ज्वलित होने वाले शोकानल का वह मानों धुवां के समान था । फलने वाले दुःखरूपी धान का वह मानों बीज था । वह अनिमित्त की सूचना देने वाला दीर्घाध्वग ( दूरगामी ) था । स्वप्न की बात से उत्पन्न भय के कारण उसे देख कर हर्ष का हृदय जैसे फट गया । कुरंगक ने आकर प्रणाम किया और पास आकर पहले अपने मुख में लगे विषाद को अर्पित किया और फिर लेख को । हर्ष ने स्वयं ही उसे लेकर बाँचा । लेख की बात जानते ही सन्तप्त हृदय को किसी प्रकार थाम कर उन्होंने स्तब्ध होते हुए कहा— 'कुरंगक, पिताजी को कौन-सी बीमारी है ?' वह एक ही बार आँख से आँसू और मुख से टूटी हुई आवाज को निकालते हुए बोला—'देव, महान् दाहज्वर है ।' इस समाचार को सुनते ही उनका हृदय मानों हजारों टुकड़ों में विदीर्ण हो गया । फिर उन्होंने पिताजी

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