हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ हर्षचरितम्
युगपदाचचक्षे—'देव ! दाहज्वरो महान्' इति । तच्चाकर्ण्य सहसा सहस्रधेवास्य हृदयं पफाल । कृताचमनश्च जनयितुरायुष्कामोऽपरिमित- मणिकनकरजतजातमात्मपरिबर्हमशेषं ब्राह्मणसादकरोत् । अभुक्त एवो- त्पचाल । 'दापय वाजिनः पर्याणम्' इति च पुरःस्थितं शिरःकृपाणं बिभ्राणं बभाण युवानम् । वेपमानहृदयश्च ससंभ्रमप्रधावितपरिवर्धको- पनीतमारुह्य तुरङ्गमेकाक्येव प्रावर्तत । अकाण्डप्रयाणसंज्ञाशङ्खक्षुभितं तु संभ्रमात्सज्जीभूतमदुद्भूतमुखरखुर- रवभरितसकलभुवनविवरमागत्यागत्य सर्वाभ्यो दिग्भ्यो धावमानमश्वी ऽयमढौकत । प्रस्थितस्य चास्य प्रदक्षिणोतरं प्रयान्तो विनाशमुपस्थितं राज- सिंहस्य हरिणाः प्रकटयांबभूवुः । अशिशिररश्मिमण्डलाभिमुखश्च हृदय- मवदारयन्निव दावशुष्के दारुणि दारुण रराण वायसः । कज्जलमय इव बहुदिवसमुपचितबहलमलपटलमलिनिततनुरभिमुखमाजगाम शिखिपिच्छ-
पफाल पुस्फोट । जातेति शब्दः प्रकारे । परिबर्हो भोजनादिपरिच्छदः । ब्राह्म- णसादब्राह्मणाधीनम् । न भुक्तमस्येत्यभुक्तः । शिरोदेशे स्थापितः कृपाणः । परिव- र्धकोऽश्वपालः । प्रावर्ततेत्यर्थाद्गन्तुम् । अश्वीयमश्वसमूहः । सिंहशब्दः प्रशंसायाम् । हरिणा इति । मृगा हि स्वैरं चरन्तः
की आयु की कामना से आचमन करके बहुत से मणि, सुवर्ण और रजत एव अपने खाने- पहनने की सब चीजों को ब्राह्मणों को अर्पित कर दिया। स्वयं बिना भोजन किए ही उठ खड़े हुए। 'घोड़े पर जीन कसवाओ' यह अपने सामने खड़े हुए कृपाणधारी युवक को आज्ञा दी। आज्ञा पाते ही घबड़ाहट के साथ अश्वपाल के द्वारा लाए हुए घोड़े पर सवार हुए और अकेले ही चल पड़े। उनका हृदय कांप रहा था। उसकी टुकड़ी में अचानक कूच को सूचित करने वाला शंख बजा दिया गया। सुनते ही घबड़ा कर घोड़े कसे जाने लगे और थोड़ी ही देर में टापों की आवाज से संसार को भरते हुए चारों ओर से दौड़ते हुए आ-आकर भर गए। जब उन्होंने प्रस्थान किया तब बाईं ओर से हिरन निकल कर महाराज के होने वाले मरण की सूचना देने लगे। कौवा सूर्यमण्डल की ओर मुँह करके जङ्गल की आग से झुलस कर सूखे हुए पेड़ पर बैठ कर हृदय विदीर्ण करता हुआ काँव-काँव की रट लगाने लगा। बहुत दिन का मैला कुचैला शरीर वाला काला-कलूट कोई साधु हाथ में मोरछल लिए सामने आ गया। इन असगुनों के होने से यात्रा को विघ्नित जानकर वे बहुत शंकित हुए। पिता के प्रति स्नेह