हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंलाञ्छनो नभ्राटकः। दुर्निमित्तैरनभिनन्द्यमानगमनश्च नितरामशङ्कत। हृदयेन पितृस्नेहाहितमृदिम्ना च तत्तदुपेक्षमाणस्तुरङ्गमस्कन्धबद्धलक्ष्यं चक्षुरविचलं दधानो दुःखमवसितहसितसंकथस्तूष्णींभूतेन भूपाललोके- नानुगम्यमानो बहुयोजनसंपिण्डितमध्वानमेकेनैवाह्ना समलङ्घयत्। उपलब्धनरेन्द्रमान्द्यवार्ताविषेण इव नष्टतेजस्यधोमुखीभवति भगवति भानुमति भण्डिप्रमुखेन प्रणयिना राजपुत्रलोकेन बहुशो विज्ञाप्यमानोऽपि नाहारमकरोत्। पुरःप्रवृत्तप्रतीहारगृह्यमाणग्रामीणपरम्पराप्रकटितप्रगुण- वर्त्मा च वहन्नेव निन्ये निशाम्। अन्यस्मिन्नहनि मध्यन्दिने विगतजयशब्दम्, अस्तमिततूर्यनादमुप- संहृतगीतम्, उत्सारितोत्सवम्, अप्रगीतचारणम्, अप्रसारितापणपण्यम्, स्थानस्थानेषु पवनबलकुटिलाभिः कोटिहोमधूमलेखाभिरुल्लसन्तीभिर्यम- महिषविषाणकोटिभिरिवोल्लिख्यमानम्, कृतान्तपाशवागुराभिरिव वेष्ट्य- सिंहस्य विनाशमभावं सूचयन्ति। नभ्राट्को नभ्रष्टपक्षकः। तुरङ्गमेति चक्षुर्विशे- षणम्। दुःखेन समवसिता निवृत्ता संकथा कथनं यस्य सः। संपिण्डितं संकलितम्। प्रगुणं स्पष्टम्। वहन्नविश्रान्तिं गच्छन्। अन्यस्मिन्नित्यादौ। स्कन्धावारं समाससादेति संबन्धः। आपणेषु हट्टेष्हु। पण्यं से उनका हृदय द्रवित था, अतः सब की उपेक्षा करते हुए केवल घोड़े के कन्धे पर ही दृष्टि गड़ाकर दुःख के कारण सारी हँसी और गपशप को भूलकर कई योजन के मार्ग को एक ही दिन में तय किया। उनके पीछे मौन होकर राजसमूह चल रहा था। भगवान् सूर्य मानों राजा की बीमारी का समाचार सुनने से दुखी होकर तेजरहित और अधोमुख होने लगे। भण्डि आदि मित्र राजकुमारों ने बहुत बार समझाया फिर भी हर्ष ने भोजन नहीं किया। केवल आगे चलते हुए दौवारिक द्वारा गाँव वालों को पकड़-पकड़ कर रास्ता पूछे जाने और उनके द्वारा दिखाए जाने पर रात में भी बराबर चलते रहे। अगले दिन दोपहर के समय स्कन्धावार पहुँचे। वहाँ जय-जयकार की आवाज बिलकुल बन्द थी। तूर्य बजाया नहीं जा रहा था, और गीत भी बन्द था। उत्सव उठा दिया गया था। चारण नहीं गा रहे थे। बेचने के लिए बाजार में वस्तुएँ फैलाई नहीं गई थीं। जगह-जगह पर करोड़ों यज्ञों की धूमलेखाएँ हवा से टेढ़ी-मेढ़ी निकल रही थीं, मानों यमराज के भैंसों के सींगों के अग्रभाग हों या यमराज की फाँस ही जैसे चारों