हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंआकृष्यमाण इव मनोरथैः, परिष्वज्यमान इव वधूसखीहृदयैराजगाम विवाहदिवसः। प्रातरेव प्रतीहारैः समुत्सारितनिखिलानिबद्धलोकं विविक्त- मक्रियत राजकुलम्। अथ महाप्रतीहारः प्रविश्य नृपसमीपम् 'देव ! जामातुरन्तिकात्ता- म्बूलदायकः पारिजातकनामा संप्राप्तः' इत्यभिधाय स्वाकारं युवानमदर्श- यत्। राजा तु तं दूरादेव जामातृबहुमानाद्दर्शितादरः 'बालक ! कच्चित्कु- शली ग्रहवर्मा ?' इति पप्रच्छ। असौ तु समाकर्णितनराधिपध्वनिर्धाव- मानः कतिचित्पदान्युपसृत्य प्रसार्य च बाहू सेवाचतुरश्चिरं वसुंधरायां निधाय मूर्द्धानमुत्थाय 'देव ! कुशली यथाज्ञापयस्यर्चयति च देवं नम- स्कारेण' इति व्यज्ञापयत्। आगतजामातृनिवेदनागतं च तं ज्ञात्वा कृत- सत्कारं राजा 'यामिन्याः प्रथमे यामे विवाहकालात्ययकृतो यथा न भवति दोषः' इति संदिश्य प्रतीपं प्राहिणोत्। यथा न भवति दोष इत्यत्र तथा कार्यमित्यर्थलभ्यम्। मानो लक्ष्मीमय बन रहा था। वह अवसर मानों सुख का निधान, जन्म का फल, पुण्य का परिणाम, ऐश्वर्य का यौवन, प्रीति का यौवराज्य, मनोरथ का सिद्धिकाल था। विवाह के दिन को लोग उंगलियों पर गिनने लगे। उसे मार्ग के ध्वज मानों निहारने लगे। माङ्गलिक गाजे बाजे की ध्वनियां मानों उसकी अगवानी लेने पहुंचीं। ज्योतिषी लोग उसे गुहारने लगे। मनोरथ उसे खींचने लगे। वधू की सखियां मानों उसका आलिङ्गन करने लगीं। इस प्रकार विवाह का दिन आ पहुँचा। प्रातःकाल ही प्रतीहारों ने फालतू सब लोगों को हटा कर राजकुल को खाली कर दिया। महाप्रतीहार ने राजा के समीप आकर निवेदन किया-देव, जामाता के समीप से तम्बोली (ताम्बूलदायक) पारिजातक आया है।' यह कह कर अपने ही आकार के एक युवक को दिखाया। राजा ने दूर ही से दमाद के सम्मान के कारण उसके प्रति आदर व्यक्त करते हुए पूछा- 'बालक, ग्रहवर्मा तो कुशल से है।' सेवा में चतुर उसने राजा की आवाज सुनते ही जल्दी से कुछ डेग आगे बढ़, दोनों हाथ फैला, देर तक जमीन में सिर झुका और उठ कर निवेदन किया-'देव, कुशल से हैं और प्रणामपूर्वक आप की अर्चना करते हैं।' राजा ने यह जान कर कि जामाता विवाह के लिए आए हैं; उनका सत्कार करते हुए कहा-'रात्रि के पहले पहर में विवाह-लग्न साधनी चाहिए जिससे दोष न हो' और उसे वापिस भेजा। १६ ह० च०