भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

२४० हर्षचरितम् जामातरि, स्नेहेन दुहितरि, उपचारेण निमन्त्रितस्त्रीषु, आदेशेन परिजने, शरीरेण संचरणे, चक्षुषा कृताकृतप्रत्यवेक्षणेषु, आनन्देन महोत्सवे, एकापि बहुधा विभक्तेवाभवत् । भूपतिरप्युपर्य्युपरि विसर्जितोष्ट्रबामीजनि- तजामातृजोषः सत्यप्याज्ञासंपादनदक्षे मुखेक्षणपरे परिजने समं पुत्राभ्यां दुहितृस्नेहविक्लबः सर्वं स्वयमकरोत् । एवं च तस्मिन्नविधवामय इव भवति राजकुले, मङ्गलमय इव जाय- माने जीवलोके, चारणमयेष्विव लक्ष्यमाणेषु दिङ्मुखेषु, पटहरवमय इव कृतेऽन्तरिक्षे, भूषणमय इव भ्रमति परिजने, बान्धवमय इव दृश्य- माने सर्गे, निर्वृतिमय इवोपलक्ष्यमाणे काले, लक्ष्मीमय इव विजृम्भमाणे महोत्सवे, निधान इव सुखस्य, फल इव जन्मनः, परिणाम इव पुण्यस्य, यौवन इव विभूतेः, यौवराज्य इव प्रीतेः, सिद्धिकाल इव मनोरथस्य वर्तमाने, गण्यमान इव जनाङ्गुलीभिः, आलोक्यमान इव मार्गध्वजैः, प्रत्युद्गम्यमान इव मङ्गल्यवाद्यप्रतिशब्दकैः, आहूयमान इव मौहूर्तिकैः, उष्ट्रवाम्युष्ट्रभार्या । केचिद्वामीद्वयमन्ये वेसरीमन्ये गुर्वीमाहुः । जोषः सुखम् । एवमित्यादौ । अस्मिन्सत्याजगाम विवाहदिवस इति संबन्धः । निधान इव सुखस्येत्यादौ वर्तमान इत्यनेन संगतिः । मौहूर्तिकैर्गणकैः । अनिबद्धो बाह्यः । के लिए हृदय के रूप में, दामाद के लिए कुतूहल के रूप में, पुत्री के लिए स्नेह के रूप में, बुलावे पर आई हुई स्त्रियों के लिए भावभगत के रूप में, परिजन के लिए आदेश के रूप में, चलने-फिरने में शरीर के रूप में, किए या न किए कार्यों की देख ताक के लिए आँख के रूप में, महोत्सव के लिए आनन्द के रूप में, इस प्रकार मानों एक से अनेक रूप में हो गई । राजा ने भी जामाता की प्रसन्नता के लिए एक के ऊपर एक ऊँट और घोड़ियों की ढेर लगा दी । आज्ञा पालन करने में चतुर और मुँह ताकते हुए खड़े रहने वाले नौकर-चाकर के होने पर भी वे अपने दोनों पुत्र के साथ पुत्री के स्नेह में व्याकुल होकर सब काम स्वयं निपटाते थे । इस प्रकार राजकुल में चारों ओर सुहागिन स्त्रियां दिखाई देती थीं । सारा संसार मंगलमय लग रहा था । दिशायें चारणों से भरी हुई दीख पड़ने लगीं । आकाश में पटह की आवाज गूंजने लगी । गहनों से लदे हुए परिजन घूमते रहते थे । सारी सृष्टि ही बान्धवमय प्रतीत हो रही थी । सारा समय परम-आनन्दमय हो रहा था । महोत्सव १. तस्मिन्नविधवाधवे ।