हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
२४० हर्षचरितम् जामातरि, स्नेहेन दुहितरि, उपचारेण निमन्त्रितस्त्रीषु, आदेशेन परिजने, शरीरेण संचरणे, चक्षुषा कृताकृतप्रत्यवेक्षणेषु, आनन्देन महोत्सवे, एकापि बहुधा विभक्तेवाभवत् । भूपतिरप्युपर्य्युपरि विसर्जितोष्ट्रबामीजनि- तजामातृजोषः सत्यप्याज्ञासंपादनदक्षे मुखेक्षणपरे परिजने समं पुत्राभ्यां दुहितृस्नेहविक्लबः सर्वं स्वयमकरोत् । एवं च तस्मिन्नविधवामय इव भवति राजकुले, मङ्गलमय इव जाय- माने जीवलोके, चारणमयेष्विव लक्ष्यमाणेषु दिङ्मुखेषु, पटहरवमय इव कृतेऽन्तरिक्षे, भूषणमय इव भ्रमति परिजने, बान्धवमय इव दृश्य- माने सर्गे, निर्वृतिमय इवोपलक्ष्यमाणे काले, लक्ष्मीमय इव विजृम्भमाणे महोत्सवे, निधान इव सुखस्य, फल इव जन्मनः, परिणाम इव पुण्यस्य, यौवन इव विभूतेः, यौवराज्य इव प्रीतेः, सिद्धिकाल इव मनोरथस्य वर्तमाने, गण्यमान इव जनाङ्गुलीभिः, आलोक्यमान इव मार्गध्वजैः, प्रत्युद्गम्यमान इव मङ्गल्यवाद्यप्रतिशब्दकैः, आहूयमान इव मौहूर्तिकैः, उष्ट्रवाम्युष्ट्रभार्या । केचिद्वामीद्वयमन्ये वेसरीमन्ये गुर्वीमाहुः । जोषः सुखम् । एवमित्यादौ । अस्मिन्सत्याजगाम विवाहदिवस इति संबन्धः । निधान इव सुखस्येत्यादौ वर्तमान इत्यनेन संगतिः । मौहूर्तिकैर्गणकैः । अनिबद्धो बाह्यः । के लिए हृदय के रूप में, दामाद के लिए कुतूहल के रूप में, पुत्री के लिए स्नेह के रूप में, बुलावे पर आई हुई स्त्रियों के लिए भावभगत के रूप में, परिजन के लिए आदेश के रूप में, चलने-फिरने में शरीर के रूप में, किए या न किए कार्यों की देख ताक के लिए आँख के रूप में, महोत्सव के लिए आनन्द के रूप में, इस प्रकार मानों एक से अनेक रूप में हो गई । राजा ने भी जामाता की प्रसन्नता के लिए एक के ऊपर एक ऊँट और घोड़ियों की ढेर लगा दी । आज्ञा पालन करने में चतुर और मुँह ताकते हुए खड़े रहने वाले नौकर-चाकर के होने पर भी वे अपने दोनों पुत्र के साथ पुत्री के स्नेह में व्याकुल होकर सब काम स्वयं निपटाते थे । इस प्रकार राजकुल में चारों ओर सुहागिन स्त्रियां दिखाई देती थीं । सारा संसार मंगलमय लग रहा था । दिशायें चारणों से भरी हुई दीख पड़ने लगीं । आकाश में पटह की आवाज गूंजने लगी । गहनों से लदे हुए परिजन घूमते रहते थे । सारी सृष्टि ही बान्धवमय प्रतीत हो रही थी । सारा समय परम-आनन्दमय हो रहा था । महोत्सव १. तस्मिन्नविधवाधवे ।
आकृष्यमाण इव मनोरथैः, परिष्वज्यमान इव वधूसखीहृदयैराजगाम विवाहदिवसः। प्रातरेव प्रतीहारैः समुत्सारितनिखिलानिबद्धलोकं विविक्त- मक्रियत राजकुलम्। अथ महाप्रतीहारः प्रविश्य नृपसमीपम् 'देव ! जामातुरन्तिकात्ता- म्बूलदायकः पारिजातकनामा संप्राप्तः' इत्यभिधाय स्वाकारं युवानमदर्श- यत्। राजा तु तं दूरादेव जामातृबहुमानाद्दर्शितादरः 'बालक ! कच्चित्कु- शली ग्रहवर्मा ?' इति पप्रच्छ। असौ तु समाकर्णितनराधिपध्वनिर्धाव- मानः कतिचित्पदान्युपसृत्य प्रसार्य च बाहू सेवाचतुरश्चिरं वसुंधरायां निधाय मूर्द्धानमुत्थाय 'देव ! कुशली यथाज्ञापयस्यर्चयति च देवं नम- स्कारेण' इति व्यज्ञापयत्। आगतजामातृनिवेदनागतं च तं ज्ञात्वा कृत- सत्कारं राजा 'यामिन्याः प्रथमे यामे विवाहकालात्ययकृतो यथा न भवति दोषः' इति संदिश्य प्रतीपं प्राहिणोत्। यथा न भवति दोष इत्यत्र तथा कार्यमित्यर्थलभ्यम्। मानो लक्ष्मीमय बन रहा था। वह अवसर मानों सुख का निधान, जन्म का फल, पुण्य का परिणाम, ऐश्वर्य का यौवन, प्रीति का यौवराज्य, मनोरथ का सिद्धिकाल था। विवाह के दिन को लोग उंगलियों पर गिनने लगे। उसे मार्ग के ध्वज मानों निहारने लगे। माङ्गलिक गाजे बाजे की ध्वनियां मानों उसकी अगवानी लेने पहुंचीं। ज्योतिषी लोग उसे गुहारने लगे। मनोरथ उसे खींचने लगे। वधू की सखियां मानों उसका आलिङ्गन करने लगीं। इस प्रकार विवाह का दिन आ पहुँचा। प्रातःकाल ही प्रतीहारों ने फालतू सब लोगों को हटा कर राजकुल को खाली कर दिया। महाप्रतीहार ने राजा के समीप आकर निवेदन किया-देव, जामाता के समीप से तम्बोली (ताम्बूलदायक) पारिजातक आया है।' यह कह कर अपने ही आकार के एक युवक को दिखाया। राजा ने दूर ही से दमाद के सम्मान के कारण उसके प्रति आदर व्यक्त करते हुए पूछा- 'बालक, ग्रहवर्मा तो कुशल से है।' सेवा में चतुर उसने राजा की आवाज सुनते ही जल्दी से कुछ डेग आगे बढ़, दोनों हाथ फैला, देर तक जमीन में सिर झुका और उठ कर निवेदन किया-'देव, कुशल से हैं और प्रणामपूर्वक आप की अर्चना करते हैं।' राजा ने यह जान कर कि जामाता विवाह के लिए आए हैं; उनका सत्कार करते हुए कहा-'रात्रि के पहले पहर में विवाह-लग्न साधनी चाहिए जिससे दोष न हो' और उसे वापिस भेजा। १६ ह० च०
२४२ हर्षचरितम्
अथ सकलकमलवनलक्ष्मीं वधूमूख इव संचार्ये समवसिते वासरे, विवाहदिवसश्रियः पादपल्लव इव रज्यमाने सवितरि, वधूवरानुरागलघुकृ- तप्रेमलज्जितेष्विव विघटमानेषु चक्रवाकमिथुनेषु, सौभाग्यध्वज इव रक्तां- शुकसुकुमारवपुषि नभसि स्फुरति संध्यारागे, कपोतकण्ठकर्बुरे वरयात्रा- गमनरजसीव कलुषयति दिङ्मुखानि तिमिरे, लग्नसंपादनसज्ज इवो- ज्जिहाने ज्योतिर्गणे, विवाहमङ्गलकलश इवोदयशिखरिणा समुत्क्षिप्यमाणे वर्धमानधवलच्छाये ताराधिपमण्डले, वधूवदनलावण्यज्योत्स्नापरिपोत- तमसि प्रदोषे, वृथोदितमुपहसत्स्विव रजनिकरमुत्तानितमुखेषु कुमुद्वने- ष्वाजगाम मुहुर्मुहुरुल्लासितस्फारस्फुरितारुणचामरैर्मनोरथैरिवोत्थितरागा- ग्रपल्लवैः पुरोधावमानैः पादातैरूत्कर्णकटकहयप्रतिहेषितदीयमानस्वागतै-
अथेत्यादौ। एतस्मिन्नेतस्मिन्सत्याजगामेति संबन्धः। कपोतेत्यसाधारणम्। कर्बुर आपाण्डुरे। रजसीवेति। रजोऽपि मुखानि कलुषयति। लग्नेत्यादि साधा- रणम्। उज्जिहान उद्गच्छति। ज्योतिर्गणैस्तारानिकरैः, गणकैश्च। वर्धमानेत्यादि संध्यारागहितत्वात्। वर्धमानं शरावः तेन च धवलच्छायम्। तद्धि मकोल्लिसं विवाहे क्रियते इत्याचारः। स्फारः स्फोटकः। पुरोधावमानैरिति साधारणम्। पादातैः पदातिसमूहैः।
सारे कमलवन की लक्ष्मी को वधू राज्यश्री के मुख में मानों अर्पित करके दिन ढल गया। विवाह-दिवस की श्री के चरण-पल्लव से मानों सूर्यबिम्ब लाल हो गया। वधू और वर के अनुराग के सामने प्रेम भाव के हल्के होने के कारण लज्जित होकर चकवाक के जोड़े पृथक् होने लगे। रक्तांशुक की भाँति कोमल संध्याराग सौभाग्यध्वज के समान आकाश में स्फुरित होने लगा। कबूतर के कंठ के सदृश अन्धकार आकाश को कलुषित कर रहा था, मानो बरात की चढ़त से धूल उड़कर भरने लगी हो। शुभ लग्न को ठीक करने में तारे मानों निकल कर तैयार होने लगे। उदयाचल द्वारा सिर पर उठाए गए विवाह के मंगलकलश के समान चन्द्रमण्डल की उज्ज्वल कान्ति बढ़ने लगी। वधू राज्य- श्री के लावण्य की चाँदनी से प्रदोषकाल का अन्धकार जब दूर हो गया तो फिर व्यर्थ उदित हुए चन्द्रमा को देखकर मुँह ऊँचा किए कुमुद मानों हँसने लगे। तभी लग्न के समय बरात लेकर ग्रहवर्मा उपस्थित हुआ। पैदल चलने वाले बराती बार-बार अपनी लाल ध्वजा को फटकाते चले आ रहे थे, मानों राजा के पल्लव वाले आगे दौड़ते हुए उनके मनोरथ हों। कान खड़े किए छावनी के घोड़ों की हिनहिनाहट के साथ किए जाने वाले स्वागत को स्वीकार करते हुए बराती घोड़े भी उस दिग्भाग को भरने लगे। हिलते
चतुर्थ उच्छ्वासः २४३ रिव वाजिनां वृन्दैरापूरितदिग्विभागः, चलकर्णचामराणां चामीकरमय- सर्वोपकरणानां वर्णकलम्बिनां बलिनां घण्टाटाङ्कारिणां करिणां घटाभिः घटयन्निव पुनरिन्दूदयविलीनमन्धकारम् , नक्षत्रमालामण्डितमुखीं करिणीं निशाकर इव पौरंदरीं दिशमारूढः प्रकटितविविधविहगविरुतैस्तालावच- रचारणैः पुरःसरैर्बालो वसन्त इवोपवनैः क्रियमाणकोलाहलो गन्धतैला- वसेकसुगन्धिना दीपिकाचक्रवालालोकेन कुङ्कुमपटवासधूलिपटलेनेव पि- ञ्जरीकुर्वन्सकलं लोकम् , उत्फुल्लमल्लिकामण्डमाला मध्याध्यासितकुसुमशे- खरेण शिरसा हसन्निव सपरिवेषक्षपाकरं कौमुदीप्रदोषम्, आत्मरूपनि- र्जितमकरकेतुक.रापहृतेन कार्मुकेणेव कौसुमेन दाम्ना विरचितवैकक्षकवि- लासः कुसुम सौरभगर्वभ्रान्तभ्रमरकुलकलकलप्रलापसुभगः पारिजात इव जातः श्रिया सह पुनरवतारितो मेदिनीम्, नववधूवदनावलोकनकुतूहले- नेव कृष्यमाणहृदयः पतन्निव मुखेन प्रत्यासन्नलग्नो ग्रहवर्मा त्वरित- माजगाम। राजा तु तमुपद्वारमागतं चरणाभ्यामेव राजचक्रानुगम्यमानः ससुतः हुए कान पर चँवर लिए, सोने के समस्त उपकरणों से सजाए गए, भाँति-भाँति के बलवान् हाथी घंटा की टंकार करते चले आ रहे थे मानों चन्द्रमा के उदय होने से विलीन अन्ध- कार को फिर जुटाने लगे। ग्रहवर्मा नक्षत्रमाला नामक आभरण से सुसज्जित हथिनी पर चढ़ा हुआ उस प्रकार लग रहा था जैसे चन्द्रमा ताराओं से शोभित पूर्व दिशा में ऊपर की ओर चढ़ा हो । उसके आगे-आगे चारण लोग तालयुक्त गान करते चल रहे थे जिससे चिड़ियों के चहचहाने जैसा शब्द हो रहा था । गन्ध तैल पड़ने से सुगन्धित दीपक जल रहे थे, मानों कुंकुम और पटवास की धूलि सब ओर सब लोगों को पिञ्जरित कर रही थी । ग्रहवर्मा विकसित मालतीकुसुमशेखर की माला सिरपर धारण कर रहा था, मानों परि- वेष के साथ उदित हुए चन्द्रवाले चन्द्रिकायुक्त प्रदोषकाल पर हँस रहा था। अपने रूप के सामने हारे हुए कामदेव के हाथ से छीन कर लिए गए धनुष के समान उसका पुष्प- दाम का बना हुआ वैकक्षक शोभ रहा था। भौंरे उसके फूलों पर गुंजारते हुए जूझ रहे थे, मानो पारिजात ही श्री के साथ उतर आया हो । नई वधू राज्यश्री का मुखड़ा देखने के कुतूहल से खिंचे जाते हुए हृदय वाला वह मानों मुँह की ओर से दौड़ कर आया । राजाओं और दोनों राजकुमारों के साथ पैदल ही चल कर द्वार के समीप पहुँचे हुए
२४४ हर्षचरितम् प्रत्युज्जगाम । अवतीर्णं च तं कृतनमस्कारं मन्मथमिव माधवः प्रसारित- भुजो गाढमालिङ्गि । यथाक्रमं परिष्वक्तराज्यवर्धनहर्षं च हस्ते गृहीत्वा- भ्यन्तरं निन्ये । स्वनिर्विशेषासनदानादिना चैनमुपचारेणोपचचार । न चिराच्च गम्भीरनामा नृपतेः प्रणयी विद्वान्द्विजन्मा ग्रहवर्माणमु- वाच—'तात ! त्वां प्राप्य चिरात्खलु राज्यश्रिया घटितौ तेजोमयौ सकल- जगद्धीयमानबुधकर्णानन्दकारिगुणगणौ सोमसूर्यवंशाविव पुष्यभूतिमुखर- वंशौ । प्रथममेव कौस्तुभमणिरिव गुणैः स्थितोऽसि हृदये देवस्य । इदानीं तु शशीव शिरसा परमेश्वरेणासि वोढव्यो जातः' इति । एवं वदत्येव तस्मिन्नृपमुपसृत्य मौहूर्तिकाः 'देव ! समासीदति लग्न- वेला । व्रजतु जामाता कौतुकगृहम्' इत्युचुः । अथ नरेन्द्रेण 'उत्तिष्ठ, गच्छ' इति गदितो ग्रहवर्मा प्रविश्यान्तःपुरं जामातृदर्शनकुतूहलिनीनां राज्यश्रिया नृपतिलक्ष्म्यापि । घटितौ योजितौ, मुक्तौ च । बुधकर्णौ पण्डित- श्रोत्रे, सोमसूर्यसूनू च । गुणैरुत्कर्षैः, तन्तुभिश्च । हृदये चेतसि, वक्षसि च । देवस्य राज्ञः, विष्णोश्च । परमेश्वरेण राज्ञा, हरेण च । कौतुकगृहं विवाहमङ्गलवेश्म । उसका स्वागत किया। जैसे वसन्त कामदेव से मिलता है उसी प्रकार उन्होंने हाथ फैलाकर हथिती से उतार कर झुके हुए उसका आलिङ्गन किया। क्रम से राज्यवर्धन और हर्ष भी जब गले मिले तो राजा हाथ से पकड़ कर उसे भीतर ले गए। अपने समान आसन आदि उपचारों से उसका सम्मान किया। उसी समय गम्भीर नामक राजा के प्रिय विद्वान् ब्राह्मण ने ग्रहवर्मा से कहा— 'हे तात, राज्यश्री के साथ तुम्हें सम्बन्धित पाकर आज पुष्पभूति और मुखर दोनों के वंश तेजस्वी, सारे संसार के लोगों को आनन्दित करने वाले सोम और सूर्य वंश के समान धन्य हुए। पहले से ही देव प्रभाकरवर्धन ने कौस्तुभमणि के समान तुम्हें धारण किया है। इस समय जैसे शिवने चन्द्र को अपने मस्तकपर धारण किया है उसी प्रकार तुम भी उनक शिरोधार्य हो रहे हो। ब्राह्मण गम्भीर यह कह ही रहे थे कि ज्योतिषियों ने आकर कहा—'राजन्, लग्न का समय निकट है। जामाता कौतुकगृह में चलें।' राजा के 'उठो, जाभो' कहने पर ग्रहवर्मा ने अन्तःपुर में प्रवेश किया और वर को देखने के कुतूहल में स्त्रियों की खिले-
चतुर्थ उच्छ्वासः २४५ स्त्रीणां पतितानि लोचनसहस्राणि विकचनीलकुवलयवनानीव लङ्घयन्ना- ससाद कौतुकगृहद्वारम् । निवारितपरिजनश्च प्रविवेश । अथ तत्र कतिपयाप्तप्रियसखीस्वजनप्रमदाप्रायपरिवाराम् , अरुणांशु- कावगुण्ठितमुखीं प्रभातसंध्यामिव स्वप्रभया निष्प्रभान्प्रदीपकान्कुर्वाणाम् , अतिसौकुमार्यशङ्कितेनेव यौवनेन नातिनिर्भरमुपगूढाम् , साध्वसनिरुध्य- मानहृदयदेशदुःखमुक्तैर्निभृतार्यतैः श्वसितैरपयान्तं कुमारभावमिवानुशोच- न्तीम् , अत्युत्कम्पिनीं पतनभियेव त्रपया निष्पन्दं धार्यमाणाम् , हस्तं तामरसप्रतिपक्षमासन्नग्रहणं शशिनमिव रोहिणीं भयवेपमानमानसामव- लोकयन्तीम् , चन्दनधवलतनुताम् , ज्योत्स्नादानसंचितलावण्यात्कुमु- दिनोगर्भादिव प्रसूताम् , कुसुमामोदनिर्हारिणीं वसन्तहृदयादिव निर्गताम्, निःश्वासपरिमलाकृष्टमधुकरकुलां मलयमारुतादिवोत्पन्नाम् , कृतकंदर्पा- अथेत्यादौ । तत्र वधूमपश्यदिति संबन्धः । अरुणांशुकं लोहितं वस्त्रम् । अरु- णस्याल्पांशवोऽंशुकाः । निभृतैर्गुप्तैः । प्रतिपक्षस्तुल्यः, शत्रुश्च । ग्रहणं हस्तस्य स्वीकारः, शशिनश्च ग्रहणं समासङ्गं भवति । उद्गमनं सौरभमित्यन्ये । प्रभावीनां कौस्तुभादिभिर्यथासंख्यम् । बालिका ऊर्मिका, कौमारी च । विनोदयन्तीं प्रथय- न्तीम् । हारिणीं रम्याम्, मार्गा च । हुए कुवलय के समान गिरती हुई आँखों को लांघते हुए कौतुकगृह के द्वार पर पहुंचा। अन्य लोग द्वार पर ही रोक दिए गए और उसने भीतर प्रवेश किया । तब उसने वहाँ वधूवेश में राज्यश्री को देखा । वह कुछ मान्य और प्रियसखियों से और स्वजन स्त्रियों से घिरी हुई थी । प्रभात काल की संध्या के समान लाल अंशुक का घूंघट डाले अपनी प्रभा से दीपों को निष्प्रभ कर रही थी । मानों यौवन ने उसे अत्यन्त सुकुमार जान कर कस कर नहीं दबाया था । भय के कारण रुंधे हुए हृदयदेश से वह कठिनता से लम्बी सांस लेती थी, मानों अब छोड़ कर जाते हुए कुमारभाव के बारे में चिन्ता कर रही थी । वह कांप रही थी, फिर भी गिर जाने के भय से उसे लज्जा ने मानों पकड़ रखा था । भय से कांपते हुए मन वाली वह कमल के प्रतिपक्षी अपने हाथ को देख रही थी, मानों ग्रहणसमय निकट होने पर कातर होकर रोहिणी चन्द्रमा को देख रही हो । चन्दन के लगाने से उसकी देह और भी सफेद हो रही थी, मानों चन्द्र के द्वारा दी गई ज्योत्स्ना के लावण्य से भरे हुए कुमुदिनी के गर्भ से उत्पन्न हुई हो । फूल की गन्ध से वह और भी मनोहर लग रही थी, मानों वसन्त के हृदय से निकली हो । उसके निश्वास के परिमल में भौरे खिंचते जा रहे थे, मानों वह
२४६ हर्षचरितम् नुसरणां रतिमिव पुनर्जाताम्, प्रभालावण्यमदसौरभमाधुर्यैः कौस्तुभश- शिमदिरापारिजातामृतप्रभवैः सर्वरत्नगुणैरपरामिव सुरासुररुषा रत्नाकरेण कल्पितां श्रियम्, स्निग्धेन बालिकालोकेन सितसिन्दुवारकुसुममञ्जरी- भिरिव मुक्तादीधितिभिः कल्पितकर्णावतंसाम्, कर्णाभरणमरकतप्रभाह- रितशाद्वलेन कपोलस्थलीतलेन विनोदयन्तीमिव हारिणीं लोचनच्छा- याम्, अधोमुखं वरकौतुकालोकनाकुलं मुहुर्मुहुः कृतमुखोन्नमनप्रयत्नं सखीजनं हृदयं च निर्भर्त्सयन्तीं वधूमपश्यत्। प्रविशन्तमेव तं हृदयचौरं वध्वा समर्पितं जग्राह कंदर्पः। परिहास- स्मेरमुखीभिश्च नारीभिः कौतुकगृहे यद्यत्कार्यते जामाता तत्तत्सर्वमति- पेशलं चकार। कृतपरिणयानुरूपवेशपरिग्रहां गृहीत्वा करे वधूं निर्जगाम। जगाम च नवसुधाधवलां निमन्त्रितागतैस्तुषारशैलोपत्यकामिव त्र्यम्ब- मृगलोचनच्छायां नीलशाद्वलेन स्थलीतले क्रीडति। कौतुकालोकनाकुलं द्वयमपि साधारणम्। वध्वा राज्यश्रिया। अथ वेदीं जगामेति संबन्धः। उपत्यकाद्रेः समासन्ना भूः। मलयमारुत से उत्पन्न हो। वह कामदेव का अनुसरण कर रही थी, मानों रति ने फिर जन्म लिया हो। वह अपनी प्रभा, लावण्य, मद, सौरभ, माधुर्य आदि गुणों से दूसरी लक्ष्मी के समान मालूम पड़ रही थी, मानों जिसे कौस्तुभमणि, चन्द्र, मदिरा, पारिजात और अमृत से उत्पन्न समस्त रत्न के उन गुणों के साथ समुद्र ने देवता और असुरों पर क्रोध करके फिर से उत्पन्न किया हो। उसके कानों में मोती की बालियों की किरणें उजले सिन्धुवार पुष्प की मंजरी की भांति अवतंस बन रहीं थीं। पन्ने के कर्णाभरण की हरी प्रभा उसके कपोलों पर पड़ रही थी, मानों वह आँखों की सुन्दर कान्ति को व्यक्त. कर रही थी। दिखाने के लिए प्रयत्न में लगी हुई सखियां उसके झुके हुए मुंह को बार-बार उठाने का प्रयत्न कर रही थीं, वह उन्हें और अपने हृदय को भी कोस रही थी। प्रवेश करते ही राज्यश्री के द्वारा दिए गए अपने हृदय के चोर उस ग्रहवर्मा को कामदेव ने पकड़ लिया। हँसी-मजाक करने वाली नवेलियों ने कोहबर में जो-जो करने के लिए कहा ग्रहवर्मा ने बिना जिद के सब किया। विवाह के अनुकूल वेषभूषा में सुसज्जित वधू का हाथ पकड़ कर वह निकला और वेदी के पास पहुंचा। वह (वेदी) चूने से ताजी पोती हुई थी, मानों शिव-पार्वती के विवाह में निमंत्रण पर आए हुए
चतुर्थ उच्छ्वासः २४७ काम्बिकाविवाहाहूतैर्भूभृद्भिः परिवृताम्, सेकसुकुमारयवाङ्कुरदन्तुरैः पञ्चा- स्यैः कलशैः कोमलवर्णिकाविचित्रैरमित्रमुखैश्च मङ्गल्यफलहस्ताभिरञ्ज- लिकारिकाभिरुद्भासितपर्यन्ताम्, उपाध्यायोपधीयमानेन्धनधूमायमाना- मिसंधुक्षणाक्षणिकोपद्रष्टृद्विजाम्, उपकृशानुनिहितानुपहतहरितकुशाम्, संनिहितदृषदजिनाज्यस्रुक्समित्पूलिनिवहाम्, नूतनशूर्पोर्पितश्यामलशमी- पलाशमिश्रलाजहासिनीं वेदीम् । आरुरोह च तां दिवमिव सज्योत्स्नः शशी । समुत्ससर्प च वेल्लितारुणशिखापल्लवस्य शिखिनः कुसुमायुध इव रतिद्वितीयो रक्ताशोकस्य समीपम् । हुते च हुतभुजि प्रदक्षिणावर्तप्रवृत्ता- भिर्वधूवदनवलोकनकुतूहलिनीभिरिव ज्वालाभिरेव सह प्रदक्षिणं बभ्राम । पात्यमाने च लाजाञ्जलौ नखमयूर्खधवलिततनुरदृष्टपूर्ववधूवररूपविस्म- यस्मेर इवादृश्यत विभावसुः । भूभृन्नृपः, गिरिश्च । वर्णिका खटिका । अमित्रमुखै रूप्यमयैः, शत्रुमुखैश्च । अञ्ज- लिकारिकाभिर्मृन्मयप्रतिमाभिः, सालभञ्जिकाभिर्वा । क्षणिको व्यग्रः । उपद्रष्टा साक्षी उपदेश्य इति केचित् । स्रुग्धोमपात्रम् । वेल्लिता वलिताः । शिखा ज्वाला, शिखाग्राणि च । पल्लवाः प्रान्ताः, किसलयानि च । शिखिनो वृक्षस्यापि । उक्तं च—'अग्निः शिखीति च प्रोक्तः शिखी वृक्षो निगद्यते । बर्हिणश्च शिखी प्रोक्तः कृचि- त्स्यात्कुक्कुटः शिखी ॥' इति च । अनेकों पर्वतों से भरी हुई हिमालय की तराई हो । चारों ओर पास में चौड़े मुँह के कलसे रखे हुए थे, पानी की तरी से नये यवांकुर उनमें उग गए थे । उनपर हल्को बनी की खरिया पुती हुई थी और उन्होंने सूर्य का मुख नहीं देखा था । मंगलार्थ फल को हाथ में लिए मिट्टी की मूरतें खड़ी थीं। ईंधन देने से धुंवा उगलती हुई अग्नि को प्रज्वलित करने में साक्षी रूप बैठे हुए ब्राह्मण व्यग्र हो रहे थे। अग्नि के समीप ही हरे-हरे लम्बे कुश रखे हुए थे । अश्मारोहण के लिए सिल, कृष्ण मृगचर्म, घृत, स्रुवा और समिधाएं रखी हुई थीं। जैसे ज्योत्स्ना के साथ चन्द्र आकाश में चढ़ता है उसी प्रकार ग्रहवर्मा भी वधू राज्यश्री के साथ विवाहवेदी पर चढ़े और जैसे कामदेव रति को साथ लेकर रक्ताशोक के समीप पहुंचता है उसी प्रकार हिलती हुई लाल शिखा से युक्त अग्नि के पास आए । हवन करने के पश्चात् दक्षिण की ओर मुड़ती हुई मानों वधू का मुखड़ा देखने के कुतूहल वाली ज्वालाओं के साथ उन दोनों ने अग्नि के चारों ओर भांवरे लीं और लाजाञ्जलियाँ छोड़ीं । तब वर और वधू की नखकिरणों से और भी
२४८ हर्षचरितम् अत्रान्तरे स्वच्छकपलोदरसंक्रान्तमनलप्रतिबिम्बमिव निर्वाप्यन्ती स्थूलमुक्ताफलविमलबाष्पबिन्दुसंदोहदर्शितदुर्दिना निर्वदनविकारं रुरोद वधूः । उदश्रुविलोचनानां च बान्धववधूनामुदपादि महानाक्रन्दः । परि- समापितवैवाहिकक्रियाकलापस्तु जामाता वध्वा समं प्रणनाम श्वशुरौ । प्रविवेश च द्वारपक्षलिखितरतिप्रीतिदैवतं प्रणयिभिरिव प्रथमप्रविष्टैरलि- कुलैः कृतकोलाहलम् , अलिकुलपक्षपवनप्रेङ्खोलितैः कर्णोत्पलप्रहारभयप्र- कम्पितैरिव मङ्गलप्रदीपैः प्रकाशितम् , एकदेशलिखितस्तबकितरक्ताशोक- तरुतलभाजाधिज्यचापेन तिर्यक्कूणितनेत्रत्रिभागेन शरमृजूकुर्वता कामदे- वेनाधिष्ठितम् , एकपार्श्वन्यस्तेन काञ्चनाचामरुकेणेतरपार्श्ववर्तिन्या च दान्तशफरुकधारिण्या कनकपुत्रिकया साक्षालक्ष्म्येवोद्दण्डपुण्डरीकहस्तया सनाथेन सोपधानेन स्वास्तीर्णेन शयनेन शोभमानम् , शयनशिरोभाग-
निर्वापयन्ती गमयन्ती । प्रविशेत्यादौ । जामाता वासगृहमिति संबन्धः । पक्षः पार्श्वम् । कूणितः संकोचितः ।
प्रकाशमान अग्निदेव मानों पहले कभी नहीं देखे हुए इस प्रकार वर-वधू के रूप को देखकर आश्चर्य के साथ प्रसन्न दीख पड़े । इसी बीच वधू राज्यश्री मानों अपने स्वच्छ कपोलों में पड़ती हुई अग्नि की छाया को बुझाती हुई, और स्थूल मुक्ताफल जैसे निर्मल आँसुओं से दुर्दिन का दृश्य उपस्थित करती हुई मुख की विकृति के बिना ही रोने लगी । बान्धव-बन्धुओं की आँखें भी आँसू से छल-छला उठीं और तब एक प्रकार का शोरगुल मचा । इधर विवाह का विधि विधान समाप्त करके जामाता ने वधू के साथ सास-ससुर को प्रणाम किया और वासगृह में प्रविष्ट हुआ । उस वासगृह के दोनों पक्षों पर एक ओर रति और दूसरी ओर प्रीति ( कामदेव की दोनों स्त्रियों ) के चित्र बनाए गए थे। प्रेमी के समान पहले ही घुसकर भौरों ने कोलाहल शुरू किया । भौरों के पंख की हवा से हिलते हुए मानों कर्णोत्पल के प्रहार के भय से कांपते हुए मंगलदीप उस गृह को प्रकाशित कर रहे थे । एक ओर फूलों से लदे रक्ताशोक के नीचे धनुष पर बाण रखकर तिरछी ऐंची हुई मिचमिचाती आँख से निशाना साधते हुए कामदेव का चित्र बना था । अन्दर सफेद चादर से ढंका हुआ पलंग बिछा था जिसके सिरहाने तकिया रखा था । उसके एक पार्श्व में सोने की एक झारी रखी थी और दूसरी ओर हाथीदाँत का डिब्बा लिए हुए सोने की पुतली
स्थितेन च कृतकुमुदशोभेन कुसुमायुधसाहायकायागतेन शशिनेव निद्राकलशेन राजतेन विराजमानं वासगृहम्। तत्र च ह्रीताया नववधूकायाः पराङ्मुखप्रसुप्ताया मणिभित्तिदर्पणेषु मुखप्रतिबिम्बानि प्रथमालापाकर्णनकौतुकागतगृहदेवताननानीव मणिग- वाक्षकेषु वीक्षमाणः क्षणदां निन्ये। स्थित्वा च श्वशुरकुले शीलेनामृत- मिव श्वश्रूहृदये वर्षन्नभिनवाभिनवोपचारैर्पुनरुक्तान्यानन्दमयानि दश दिनानि, दत्त्वा च राजदौवारिकमिव राजकुले रणरणकं यौतकनिवेदिता- नीव शम्बलान्यादाय हृदयानि सर्वलोकस्य कथंकथमपि विसर्जितो नृपेण वध्वा सह स्वदेशमगमदिति। इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते चक्रवर्तिजन्मवर्णनं नाम चतुर्थ उच्छ्वासः।
क्षणदां रात्रिम्। दश दिनानि स्थित्वेति संगतिः। यातकं सुदायः। इति श्रीशंकरविरचिते हर्षचरितसंकेते चतुर्थ उच्छ्वासः।
खड़ी थी। नीचे पलंग के सिरहाने कुमुदों से शोभित मानो कामदेव की सहायता के लिए पहुंचे हुए चन्द्रमा के समान चाँदी का निद्रा-कलश रखा हुआ था। वहाँ लज्जित होकर पराङ्मुख सोई हुई नववधू राज्यश्री के मुखड़े के प्रतिबिम्बों को मणिभित्ति में लगाए गए दर्पणों में देखने लगा, वे प्रतिबिम्ब मानों पहली मुलाकात की बातचीत सुनने के कुतूहल से मणिगवाक्षों में खड़े होकर ताक झांक करती हुई गृहदेवताओं के मुख हों। इस प्रकार उसने रात बिताई। इस प्रकार ग्रहवर्मा श्वशुरकुल में अपने शील से सास के हृदय में अमृत की वर्षा करता हुआ नित्य नये-नये उपचारों से दस दिनों तक आनन्द के साथ रहा और द्वारपाल के समान राजकुल में अपना विच्छेदजनित उद्वेग देकर दहेज में मिली हुई सामग्री के साथ सब लोगों के हृदय को भी लेते हुए किसी-किसी प्रकार राजा के द्वारा बिसर्जित हुआ वधू राज्यश्री को विदा करा अपने स्थान को लौट गया। हर्षचरित चतुर्थ उच्छ्वास समाप्त।
पञ्चम उच्छ्वासः नियतिर्विधाय पुंसां प्रथमं सुखमुपरि दारुणं दुःखम् । कृत्वा लोकं तरला तडिदिव वज्रं निपातयति ॥ १ ॥ पातयति महापुरुषान्सममेव बहूननादरेणेव । परिवर्तमान एकः कालः शैलानिवानन्तः ॥ २ ॥ अथ कदाचिद्राजा राज्यवर्धनं कवचहरमाहूय हूणान्हन्तुं हरिणानिव हरिर्हरिणेशकिशोरमपरिमितबलानुयातं चिरंतनैरमात्यैरनुरक्तैश्च महासा- मन्तैः कृत्वा सामिसरमुत्तरापथं प्राहिणोत् । प्रयान्तं च तं देवो हर्षः कतिचित्प्रयाणकानि तुरङ्गमैरनुवव्राज । प्रविष्टे च कैलासप्रभाभासिनीं ककुभं भ्रातरि वर्त मानो नवे वयसि विक्र- नियतीत्यादि । नियतिर्दैवम् । लोकं जनम् । तडिद्विद्युत् । तडिदपि तरलाऽऽ- लोकं कृत्वा वज्रम् निपातयति ॥ १ ॥ अनन्तः पर्यन्तरहितः, शेषभट्टारकश्च ॥ २ ॥ आर्यायुगलेनानेन भाविनी राजविपत्तिः सूचिता । कवचहर इति वयसि नित्यम् । बलं सैन्यम्, सामर्थ्यं च । सामिसरं ससहायम् । जैसे चंचल बिजली क्षण भर अपनी चमक दिखाकर बार-बार वज्रपात करने लग जाती है उसी प्रकार नियति भी पहले-पहल लोगों पर सुख की चमक दिखाती है और फिर वज्र के समान भीषण दुःख ही दुःख गिराने लग जाती है ॥ १ ॥ करवट बदलता हुआ यह कालचक्र अनेक महापुरुषों को भी बिना किसी लगाव के एक साथ बिलट डालता है, जैसे प्रलय के समय में पृथिवी को सहस्र फणों पर धारण करने वाला शेषनाग सुस्ताने के लिए बोझा बदलता है तो बड़े-बड़े पहाड़ उलट-पुलट जाते हैं ॥२॥ किसी समय राजा प्रभाकरवर्धन ने कवच पहनने की आयु वाले अपने पुत्र राज्यवर्धन को बुलाकर हूणों से युद्ध करने के लिए उत्तरापथ की ओर भेजा, जैसे सिंह हरिणों को मारने के लिए अपने बाल सिंह को भेजता है । पुराने मन्त्रियों और अपने में मिले हुए महासामन्तों की देख-रेख में अपरिमित सेना को भी उसके साथ किया । युद्ध के लिए प्रयाण करते हुए राज्यवर्धन को देखकर देव हर्ष भी कुछ पड़ावों तक घोड़ों के साथ पीछे-पीछे गए । कैलास पर्वत की उज्ज्वल प्रभा से उद्भासित होने वाली
पञ्चम उच्छ्वासः २५१ मरसानुरोधिनि केसरिशरभशार्दूलवराहबहुलेषु तुषारशैलोपकण्ठेष्पूत्कण्ठ- मानवनदेवताकटाक्षांशुशारितशरीरकान्तिः क्रीडन्मृगयां मृगलोचनः कति- पयान्यहानि बहिरैव व्यलम्बत । चकार चाकर्णान्ताकृष्टकार्मुकनिर्गतभा- सुरभल्लवर्षी स्वल्पीयोभिरेव दिवसैर्निःश्वापदान्यरण्यानि । एकदा तु वासतेय्यास्तुरीये यामे प्रत्यूषस्येव स्वप्ने चटुलज्वालापु- ञ्जपिञ्जरीकृतसकलककुभा दुर्निवारेण दवहुतभुजा दह्यमानं केसरिणम- द्राक्षीत् । तस्मिन्नेव च दावदहने समुत्सृज्य शावकानुत्प्लुत्य चात्मानं पातयन्तीं सिंहीमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'लोके हि लोहेभ्यः कठिनतराः खलु स्नेहमया बन्धनपाशाः, यदाकृष्टास्तिर्यञ्चोऽप्येवमाच- रन्ति' इति । प्रबुद्धस्य चास्य मुहुर्मुहुर्दक्षिणेतरमक्षि पस्पन्दे । गात्रेषु चाकस्मादेव वेपथुर्विपप्रथे । निनिमित्तमेवान्तर्बन्धनस्थानाच्चचालेव केसरिणः सिंहाः । अष्टपादाः प्राणिविशेषाः शरभाः । शार्दूला व्याघ्राः । वराहाः सूकराः । क्रीडन्मृगयामिति । 'कालभावाध्वगन्तव्या कर्मसंज्ञा ह्यकर्मणाम्' इति भावार्थरूपाया मृगयायाः कर्मभावः । वासतेयी रात्रिः । तुरीये चतुर्थेऽहनि । संवाह्यमानं भ्राम्यमाणम् । लुलितं न्यस्तम् । उत्तर दिशा में जब बड़े भाई राज्यवर्धन ने प्रवेश किया तो पराक्रम के रस का अनुरोध करने वाली नई अवस्था को प्राप्त हुए, उत्कण्ठित वन-देवताओं के कटाक्षों से रंगीन कान्ति वाले, मृग सदृश नेत्र वाले हर्ष सिंह, शरभ, वराह आदि से भरी हुई हिमालय की तराईयों में आखेट करते हुए कुछ दिन तक बाहर ही रुक गए । उन्होंने धनुष की डोर को कान तक खींच कर तीखे बाणों की वर्षा करके थोड़े ही दिनों में तराई के जंगलों को खूंखार जानवरों से शून्य कर दिया । वहीं एक दिन रात के चौथे प्रहर में जब पौ फटने को हुई तो हर्ष ने स्वप्न में देखा कि दिशाओं को अपने ज्वालापुञ्ज से पिंजरित करती हुई अत्यन्त भीषण वनाग्नि में एक शेर जल रहा है और अपने बच्चों को छोड़ कर उसी अग्नि में शेरनी छलांग मार कर कूद रही है । उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ—'सचमुच संसार में स्नेह के बन्धन-पाश लोहे से भी बढ़ कर सख्त होते हैं, जिनसे आकृष्ट होकर तिर्यक् जीव भी इस प्रकार कर डालते हैं।' जब वे जगे तो उनकी बाईं आंख बार-बार फरकने लगी । एकाएक उनके अङ्गों में कंपकंपी होने लगी । बिना कारण ही हृदय बाहर निकला जा रहा था । दुःख का वेग बिना कारण ही बहुत बढ़ गया । यह क्या बात है ? इस प्रकार
२५२ हर्षचरितम्
हृदयम्। अकारणादेव चाजायत गरीयसी दुःखासिका। किमिदमिति च समुत्पन्नविविधविकल्पविमथितमतिरपगतधृतिश्चिन्तावनमितवदनः स्तिमिततारकेण चक्षुषा समुद्भिद्यमानस्थलकमलिनीवनामिव चकार चकोरैक्षणः क्षणं क्षोणीम्। अह्रि च तस्मिञ्शून्येनैव च चेतसा चिक्रीड मृगयाम्। आरोहति च हरितहये मध्यमहो भवनमागत्योभयतो मन्द- मन्दं संवाह्यमानतनुतालवृन्तः क्षितितलवित्तामतिशिशिरमलयजरसल- वलुलितवपुष्मिन्दुधवलोपधानधारिणीं वेत्रपट्टिकामधिशयानः साशङ्क एव तस्थौ।
अथ दूरादेव लेखगर्भया नीलीरागमेचकरुचा चीरचीरिकया रचितमु- ण्डमालकम्, श्रमातपाभ्यामारोप्यमाणकायकालिमानम्, अन्तर्गतने शोकशिचिनाऽङ्गारतामिव नीयमानम्, अतित्वरागमनद्रुततरपदोद्धूय- मानधूलिराजिव्याजेन राजवार्ताश्रवणकुतूहलिन्या मेदिन्येवानुगम्यमानम्, अभिमुखपवनप्रेङ्खत्प्रविततोत्तरीयपटप्रान्तवीज्यमानोभयपाश्र्वमतित्वरया
अथेत्यादौ। दूरादेव कुरङ्गकनामानमध्वगमापतन्तमद्राक्षीदिति संबन्धः। नीली- नामौषधिः। बर्हिकण्ठसमानो मेचकः। आरोप्यमाणः क्रियमाणः।
उनके मस्तिष्क में अनेक विकल्पों का मंथन शुरू हुआ, उनका धैर्य जाता रहा, केवल चिन्ता से सिर झुकाए हुए पृथिवी की ओर चकोर के समान एकटक से देखने लगे, मानों जमीन से स्थल-कमलिनियों का समूह निकल रहा हो। उस दिन उदास मन से ही आखेट किया। जब दिन चढ़ गया तब लौट कर निवासस्थान पर आए और जमीन पर बिछी हुई बेंत की शीतलपाटी पर जो अत्यन्त ठंढे चन्दन रस के छिड़काव से भींगी हुई थी और जिसके सिरहाने धवल उपधान (तकिया) रखा था, चिन्तित होकर बैठ गए। उनके दोनों ओर ताड़ के पंखे मंद-मंद झले जा रहे थे।
तभी उन्होंने दूर से ही कुरंगक नाम के लेखहारक को आते हुए देखा। उसके सिर पर नील में रँगी हुई पट्टी माला के समान बँधी हुई थी जिसके भीतर लेख था। एक तो चलने की थकान और उस पर कड़ाके की धूप दोनों से उसकी देह स्याह हो गई थी। हृदय के भीतर जलती हुई शोक की अग्नि के कारण अंगार-सा बन रहा था। वह बड़ी तेजी से चल रहा था। उसके पैर से लग कर धूल उड़ रही थी, मानों राजा का समाचार सुनने के कुतूहल से पृथिवी उसके पीछे-पीछे चली आ रही थी। सामने की ओर से बहती हुई हवा से उसके उत्तरीय के छोर दोनों बगल में फहरा रहे थे, मानों वह पंख बाँध कर शीघ्र दौड़ता हुआ चला आ रहा था। मानों उसे स्वामी का आदेश पीछे से
पञ्चम उच्छ्वासः २५३ कृतपक्षमिवाशु परापतन्तम्, प्रेर्यमाणमिव पृष्ठतः स्वाम्यादेशेनाकृष्यमा- णमिव पुरस्तादायतैः श्रमश्वासमोक्षैः स्विद्यल्ललाटतटघटमानप्रतिबिम्ब- केन कार्यकौतुकादपह्रियमाणलेखमिव भास्वता संभ्रमभ्रष्टैरिवेन्द्रियैः शून्यीकृतशरीरम्, लेखार्पितप्रयोजनगौरवादिव समेऽपि वर्त्मनि शून्य- हृदयतया स्खलन्तम्, कालमेघशकलमिव पतिष्यतो दुर्वातावज्रस्य, धूमपल्लवमिव ज्वलिष्यतः शोकज्वलनस्य, बीजमिव फलिष्यतो दुष्कृ- तशालेरनिमित्तभूतदीर्घाध्वगं कुरङ्गकनामानमायान्तमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा च पूर्वनिमित्तपरम्पराविर्भावितभीतिरभिद्यत हृदयेन । कुरङ्ग- कस्तु कृतप्रणामः समुपसृत्य प्रथममाननलग्नं विषादमुपनिन्ये, पश्चाल्ले- खम् । तं च देवो हर्षः स्वयमेवादायावाचयत् । लेखार्थेनैव च समं गृहीत्वा हृदयेन संतापमवग्रहरूपोऽभ्यधात्—'कुरङ्गक ! किं मान्द्यं तात- स्य ?' इति । स चक्षुषा बाष्पजलबिन्दुभिर्मुखेन च खञ्जाक्षरैः क्षरद्भि- इन्द्रियैरिति । शून्यत्वं तेषां जडत्वासेः । शकलं खण्डम् । प्रेरित कर रहा था । श्रम के कारण लम्बी सांस छोड़ने से वह मानों आगे की ओर खिंचता जा रहा था । पसीने से तर उसके ललाट पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ रहा था मानों 'किस कार्य से जा रहा है ?' यह जानने के कौतुक से सूर्य उसके माथे पर खोंसे हुए लेख को चुराने की कोशिश कर रहा था । कार्य की व्यग्रता के कारण इन्द्रियां मानों शरीर से पृथक् हो गई थीं । लेख की बात इतनी गम्भीर थी कि वह समतल मार्ग पर भी हृदयशून्य होकर गिरता-पड़ता आ रहा था । थोड़ी ही देर में अकुशल समाचार के गिरने वाले वज्र का वह मानों काला मेघखण्ड था । ज्वलित होने वाले शोकानल का वह मानों धुवां के समान था । फलने वाले दुःखरूपी धान का वह मानों बीज था । वह अनिमित्त की सूचना देने वाला दीर्घाध्वग ( दूरगामी ) था । स्वप्न की बात से उत्पन्न भय के कारण उसे देख कर हर्ष का हृदय जैसे फट गया । कुरंगक ने आकर प्रणाम किया और पास आकर पहले अपने मुख में लगे विषाद को अर्पित किया और फिर लेख को । हर्ष ने स्वयं ही उसे लेकर बाँचा । लेख की बात जानते ही सन्तप्त हृदय को किसी प्रकार थाम कर उन्होंने स्तब्ध होते हुए कहा— 'कुरंगक, पिताजी को कौन-सी बीमारी है ?' वह एक ही बार आँख से आँसू और मुख से टूटी हुई आवाज को निकालते हुए बोला—'देव, महान् दाहज्वर है ।' इस समाचार को सुनते ही उनका हृदय मानों हजारों टुकड़ों में विदीर्ण हो गया । फिर उन्होंने पिताजी
२४४ हर्षचरितम्
युगपदाचचक्षे—'देव ! दाहज्वरो महान्' इति । तच्चाकर्ण्य सहसा सहस्रधेवास्य हृदयं पफाल । कृताचमनश्च जनयितुरायुष्कामोऽपरिमित- मणिकनकरजतजातमात्मपरिबर्हमशेषं ब्राह्मणसादकरोत् । अभुक्त एवो- त्पचाल । 'दापय वाजिनः पर्याणम्' इति च पुरःस्थितं शिरःकृपाणं बिभ्राणं बभाण युवानम् । वेपमानहृदयश्च ससंभ्रमप्रधावितपरिवर्धको- पनीतमारुह्य तुरङ्गमेकाक्येव प्रावर्तत । अकाण्डप्रयाणसंज्ञाशङ्खक्षुभितं तु संभ्रमात्सज्जीभूतमदुद्भूतमुखरखुर- रवभरितसकलभुवनविवरमागत्यागत्य सर्वाभ्यो दिग्भ्यो धावमानमश्वी ऽयमढौकत । प्रस्थितस्य चास्य प्रदक्षिणोतरं प्रयान्तो विनाशमुपस्थितं राज- सिंहस्य हरिणाः प्रकटयांबभूवुः । अशिशिररश्मिमण्डलाभिमुखश्च हृदय- मवदारयन्निव दावशुष्के दारुणि दारुण रराण वायसः । कज्जलमय इव बहुदिवसमुपचितबहलमलपटलमलिनिततनुरभिमुखमाजगाम शिखिपिच्छ-
पफाल पुस्फोट । जातेति शब्दः प्रकारे । परिबर्हो भोजनादिपरिच्छदः । ब्राह्म- णसादब्राह्मणाधीनम् । न भुक्तमस्येत्यभुक्तः । शिरोदेशे स्थापितः कृपाणः । परिव- र्धकोऽश्वपालः । प्रावर्ततेत्यर्थाद्गन्तुम् । अश्वीयमश्वसमूहः । सिंहशब्दः प्रशंसायाम् । हरिणा इति । मृगा हि स्वैरं चरन्तः
की आयु की कामना से आचमन करके बहुत से मणि, सुवर्ण और रजत एव अपने खाने- पहनने की सब चीजों को ब्राह्मणों को अर्पित कर दिया। स्वयं बिना भोजन किए ही उठ खड़े हुए। 'घोड़े पर जीन कसवाओ' यह अपने सामने खड़े हुए कृपाणधारी युवक को आज्ञा दी। आज्ञा पाते ही घबड़ाहट के साथ अश्वपाल के द्वारा लाए हुए घोड़े पर सवार हुए और अकेले ही चल पड़े। उनका हृदय कांप रहा था। उसकी टुकड़ी में अचानक कूच को सूचित करने वाला शंख बजा दिया गया। सुनते ही घबड़ा कर घोड़े कसे जाने लगे और थोड़ी ही देर में टापों की आवाज से संसार को भरते हुए चारों ओर से दौड़ते हुए आ-आकर भर गए। जब उन्होंने प्रस्थान किया तब बाईं ओर से हिरन निकल कर महाराज के होने वाले मरण की सूचना देने लगे। कौवा सूर्यमण्डल की ओर मुँह करके जङ्गल की आग से झुलस कर सूखे हुए पेड़ पर बैठ कर हृदय विदीर्ण करता हुआ काँव-काँव की रट लगाने लगा। बहुत दिन का मैला कुचैला शरीर वाला काला-कलूट कोई साधु हाथ में मोरछल लिए सामने आ गया। इन असगुनों के होने से यात्रा को विघ्नित जानकर वे बहुत शंकित हुए। पिता के प्रति स्नेह
लाञ्छनो नभ्राटकः। दुर्निमित्तैरनभिनन्द्यमानगमनश्च नितरामशङ्कत। हृदयेन पितृस्नेहाहितमृदिम्ना च तत्तदुपेक्षमाणस्तुरङ्गमस्कन्धबद्धलक्ष्यं चक्षुरविचलं दधानो दुःखमवसितहसितसंकथस्तूष्णींभूतेन भूपाललोके- नानुगम्यमानो बहुयोजनसंपिण्डितमध्वानमेकेनैवाह्ना समलङ्घयत्। उपलब्धनरेन्द्रमान्द्यवार्ताविषेण इव नष्टतेजस्यधोमुखीभवति भगवति भानुमति भण्डिप्रमुखेन प्रणयिना राजपुत्रलोकेन बहुशो विज्ञाप्यमानोऽपि नाहारमकरोत्। पुरःप्रवृत्तप्रतीहारगृह्यमाणग्रामीणपरम्पराप्रकटितप्रगुण- वर्त्मा च वहन्नेव निन्ये निशाम्। अन्यस्मिन्नहनि मध्यन्दिने विगतजयशब्दम्, अस्तमिततूर्यनादमुप- संहृतगीतम्, उत्सारितोत्सवम्, अप्रगीतचारणम्, अप्रसारितापणपण्यम्, स्थानस्थानेषु पवनबलकुटिलाभिः कोटिहोमधूमलेखाभिरुल्लसन्तीभिर्यम- महिषविषाणकोटिभिरिवोल्लिख्यमानम्, कृतान्तपाशवागुराभिरिव वेष्ट्य- सिंहस्य विनाशमभावं सूचयन्ति। नभ्राट्को नभ्रष्टपक्षकः। तुरङ्गमेति चक्षुर्विशे- षणम्। दुःखेन समवसिता निवृत्ता संकथा कथनं यस्य सः। संपिण्डितं संकलितम्। प्रगुणं स्पष्टम्। वहन्नविश्रान्तिं गच्छन्। अन्यस्मिन्नित्यादौ। स्कन्धावारं समाससादेति संबन्धः। आपणेषु हट्टेष्हु। पण्यं से उनका हृदय द्रवित था, अतः सब की उपेक्षा करते हुए केवल घोड़े के कन्धे पर ही दृष्टि गड़ाकर दुःख के कारण सारी हँसी और गपशप को भूलकर कई योजन के मार्ग को एक ही दिन में तय किया। उनके पीछे मौन होकर राजसमूह चल रहा था। भगवान् सूर्य मानों राजा की बीमारी का समाचार सुनने से दुखी होकर तेजरहित और अधोमुख होने लगे। भण्डि आदि मित्र राजकुमारों ने बहुत बार समझाया फिर भी हर्ष ने भोजन नहीं किया। केवल आगे चलते हुए दौवारिक द्वारा गाँव वालों को पकड़-पकड़ कर रास्ता पूछे जाने और उनके द्वारा दिखाए जाने पर रात में भी बराबर चलते रहे। अगले दिन दोपहर के समय स्कन्धावार पहुँचे। वहाँ जय-जयकार की आवाज बिलकुल बन्द थी। तूर्य बजाया नहीं जा रहा था, और गीत भी बन्द था। उत्सव उठा दिया गया था। चारण नहीं गा रहे थे। बेचने के लिए बाजार में वस्तुएँ फैलाई नहीं गई थीं। जगह-जगह पर करोड़ों यज्ञों की धूमलेखाएँ हवा से टेढ़ी-मेढ़ी निकल रही थीं, मानों यमराज के भैंसों के सींगों के अग्रभाग हों या यमराज की फाँस ही जैसे चारों
२४६ हर्षचरितम् मानम्, उपरि कालमहिषालंकारकालायसकिङ्किणीभिरिव कटु क्वणन्ती- भिर्दिवसं वायसमण्डलीभिर्भ्रमन्तीभिरावेद्यमानप्रत्यासन्नाशुभम्, क्वचि- त्प्रतिशायितस्निग्धबान्धवाराध्यमानाहिर्बुध्नम्, क्वचिद्दीपिकादह्यमानकुल- पुत्रकप्रसाद्यमानमातृमण्डलम्, क्वचिन्मुण्डोपहारहरणोद्यतद्रविडप्रार्थ्यमा- नामर्दकम्, क्वचिदान्ध्रोद्ध्रियमाणबाहुवप्रोपयाच्यमानचण्डिकम्, अन्यत्र शिरोविधृतविलीयमानगलद्गुग्गुलुविकलनवसेवकानुनीयमानमहाकालम्, अपरत्र निशितशस्त्रीनिकृत्तात्ममांसहोमप्रसक्ताप्तवर्गम्, अपरत्र प्रकाशन- रपतिकुमारक्रियमाणमहामांसविक्रयप्रक्रमम्, उपहतमिव श्मशानपांशु- भिरमङ्गलैरिव परिगृहीतम्, यातुधानैरिव विध्वस्तम्, कलिकालेनेव कवलितम्, पापपटलैरिव संच्छादितम्, अधर्मविचेष्टितैरिव लुण्ठितम्, अनित्यताधिकारैरिवाक्रान्तम्, नियतिविलासैरिवात्मीकृतम्, शून्यमिव सुप्तमिव मुषितमिव विलक्षितमिव छलितमिव मूर्च्छितमिव स्कन्धावारं समाससाद ।
विक्रेयं वस्तु । कालो यमः । कालायसं लोहजातिभेदः । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टिकाः । प्रतिशायिता उपोषिताः । अहिर्बुध्नो हरः । मुण्डं शिरः । द्रविडा आन्ध्राश्च जनपद- भेदाः । आमर्दको वेतालः । रौद्रदेवताभेद इत्यन्ये ।
ओर घिर रही थी । होने वाले असगुन की सूचना देते हुए झुण्ड के झुण्ड कौवे काँव- काँव करते हुए ऊपर मंडरा रहे थे, मानों यमराज के भैंसे की गर्दन में लगी हुई लोहा के घुंघुरुओं की माला बज रही थी । कहीं राजा के स्नेही बान्धव लोग उपासे रहकर भगवान् शङ्कर की आराधना कर रहे थे । कहीं राजघरानों के कुलपुत्र दियाली जलाकर सप्त मातृकाओं को प्रसन्न कर रहे थे । कहीं पाशुपतमतानुयायी द्रविड़ मुण्डोपहार चढ़ाकर बेताल को प्रसन्न करने की तैयारी में था । कहीं आंध्र देश का पुजारी अपनी भुजा उठा- कर चण्डिका के लिए मनौती मान रहा था । एक ओर नए सेवक सिर पर गुग्गुल जला कर उसकी पीड़ा की विकलता में महाकाल को प्रसन्न कर रहे थे । एक ओर आप्त वर्ग के लोग तेज छुरी से अपना मांस काट-काट कर होम कर रहे थे । एक ओर राजकुमार लोग खुलेआम महामांस बेचने की तैयारी कर रहे थे । वह स्कन्धावार मानों श्मशान की धूल से दूषित हो गया हो, अमङ्गल चारों ओर घिर रहे हों, राक्षसों ने उसे विध्वंस कर दिया हो, कलिकाल उसे निगल गया हो, पापपटल उस पर छा गया हो, अधर्म के कार्यों ने उसे लूट लिया हो, अनित्यता के अधिकार उस पर आक्रान्त हों, नियति के
पञ्चम उच्छ्वासः २५७ प्रविशन्नेव च विपणिवर्त्मनि कुतूहलाकुलबहलबालकपरिवृतमूर्ध्व- यष्टिविष्कम्भवितते वामहस्तवर्तिनि भीषणमहिषाधिरूढप्रेतनाथसनाथे चित्रवति पटे परलोकव्यतिकरमितरकरकलितेन शरकाण्डेन कथयन्तं यमपट्टिकं ददर्श। तेनैव च गीयमानं श्लोकमशृणोत्- मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च। युगे युगे व्यतीतानि कस्य ते कस्य वा भवान् ॥ ३ ॥ इति। तेन चाधिकतरमवदीर्यमाणहृदयः क्रमेण राजद्वारं प्रतिषिद्धसकललोक- प्रवेशं ययौ। तुरगादवतीर्णश्चाभ्यन्तरान्निष्क्रामन्तमप्रसन्नमुखरागमन्मुक- मिवेन्द्रियैः सुषेणनामानं वैद्यकुमारकमद्राक्षीत् । कृतनमस्कारं च तम- प्राक्षीत्-‘सुषेण ! अस्ति तातस्य विशेषो न वा ?' इति। सोऽब्रवीत्- 'नास्तीदानीं यदि भवेत्कुमारं दृष्ट्वा' इति । मन्दं मन्दं द्वारपालैः प्रणम्य- विष्कम्भोऽवष्टम्भः । वितताः प्रसारिताः । व्यतिकरो वृत्तान्तः । यमपट्टेन जीवति यमपट्टिकः । मन्दं मन्दमित्यादौ राजकुलं विवेशेति संबन्धः । अमृतचरुः शान्त्यर्थं चरुः । 'प्रजापतये स्वाहा' इति षण्णां देवतानां नाम गृहीत्वा षण्णामेवाहुतीनां प्रक्षेपः षडाहुतिहोम उच्यते । दधिघृते एकीकृत्य पृषदाज्यम् । 'पृषदाज्यं विलासों ने अपने अधीन कर लिया हो। वह बिल्कुल सुनसान-सा, सुप्त-सा, लुटा हुआ- सा, लज्जित, ठगा-सा, मूर्च्छित सा हो रहा था । बाजार में घुसते ही उन्होंने यमपट्टिक को देखा । तमाशा देखने के कुतूहल से सड़क के बहुत से लड़कों ने उसे घेर रखा था। उसने बायें हाथ में ऊँची लाठी के ऊपरी सिरे पर चित्रपट फैला रखा था जिसमें भयङ्कर भैंसे पर सवार यमराज का चित्र लिखा था । वह दूसरे हाथ में सरकण्डा लिए हुए लोगों को चित्र दिखाता और परलोक में मिलने वाली नरकयातनाओं का बखान कर रहा था । उसी के द्वारा गाए गए श्लोक को सुना- 'हजारों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र कलत्र युग-युग में हुए और बीत गए । हमेशा के लिए वे किसके हुए और आप किसके हैं ?' उसे सुन कर उनका हृदय मानों विदीर्ण हो गया । क्रम से सब लोगों के प्रवेश को रोककर राजद्वार पर पहुँचे । जैसे ही घोड़े से उतरे, भीतर से निकलते हुए सुषेण नामक वैद्यकुमार को देखा, जिसका मुख अप्रसन्न था और इन्द्रियाँ बिलकुल काम न कर रही थीं । नमस्कार के बाद उससे पूछा—'सुषेण, पिताजी की हालत में सुधार है या नहीं ?' वह बोला—'अभी तो नहीं है, आपके मिलने से कदाचित् हो जाय ।' द्वारपाल उन्हें प्रणाम १७ ह० च०
२५८ हर्षचरितम् मानश्च दीयमानसर्वस्वम्, पूज्यमानकुलदैवतम्, प्रारब्धामृतचरुपचन- क्रियम्, क्रियमाणषडाहुतिहोमम्, हूयमानपृषदाज्यलवलिप्रप्रचलदूर्वापल्ल- वम्, पठ्यमानमहामायूरीप्रवर्त्यमानगृहशान्तिनिर्वर्त्यमानभूतरक्षाबलि- विधानम्, प्रयतविप्रप्रस्तुतसंहिताजपं जप्यमानरुद्रैकादशीशब्दयमानशि- वगृहम्, अतिशुचिशैवसंपाद्यमानविरूपाक्षक्षीरकलशसहस्रस्नपनम्, अजि- रोपविष्टैश्चानासादितस्वामिदर्शनदूयमानमान सैरभ्यन्तरनिष्पतितनिकटव- र्तिपरिजननिवेद्यमानवातैर्वार्तीभूतस्नान भोजनशयनैरुज्झितात्मसंस्कारम- लिनवेशैर्लिखितैरिव निश्चलैरनरपतिभिर्नीयमाननक्तंदिवं दुःखदीनवदनेन च प्रघणेषु बद्धमण्डलेनोपांशुव्याहृतैः केनचिच्चिकित्सकदोषानुद्भावयता, केनचिदसाध्यव्याधिलक्षणपदानि पठता, केनचिद्दुःस्वप्नानावेदयता, सदृघ्याज्ये' इति कोशः । महामायूरी बौद्धविद्या । शैवमन्त्र इति केचित् । संहिता संहिंतारूपो वेदपाठः । रुद्रैकादशी शिवमन्त्रः । वार्तांत आगतं वार्तीभू- तम् । प्रघणो बहिर्द्वारै कदेशः । कार्तान्तिको दैवज्ञः । उपलिङ्गान्यत्पाताः । अप- वदता निन्दता । करने लगे और धीरे धीरे उन्होंने राजकुल में प्रवेश किया । वहां सब कुछ दान में दिया जा रहा था । कुलदेवताओं की पूजा हो रही थी । शान्ति के लिए चरु पकाने का कार्य आरम्भ किया जा रहा था । छह आहुतियों वाला हवन किया जा रहा था । दही और घी का पृषदाज्य हवन किया जा रहा था जिसके छींट दूबों पर पड़ गए थे । महामायूरी नामक बौद्धों की विद्या का पाठ चल रहा था । गृहशान्ति का विधान हो रहा था और भूतों से रक्षा के लिए बलि दी जा रही थी। पवित्र ब्राह्मण संहिनामन्त्रों का जप करने में लगे थे । शिव के मन्दिर में रुद्र-एकादशी का जप बैठाया गया था। अत्यन्त पवित्र होकर शैव लोग भगवान् शङ्कर को दूध के हजार घड़ों से स्नान कराने में लगे थे । राजकुल के बाहर आँगन में राजा लोग दिन-रात चित्रलिखित की भाँति निश्चल होकर जमा रहते थे । महाराज के दर्शन न पाने से उनका मन खिन्न था । भीतर से निकलते हुए परिजनों द्वारा महाराज की खबर पाते थे । नहाना, सोना, खाना, सब कुछ भूल चुके थे। प्रसाधन के छूट जाने से उनका वेश मलिन हो गया था। दुःख से मुर्झाए हुए काम करने वाले नौकर द्वार से सटे हुए कोठों में एक जगह जुट कर कष्ट में पड़े हुए राजा की हालत के बारे में कानाफूसी कर रहे थे। कोई कहता, वैद्यों से ठीक-ठीक चिकित्सा न हो सकी; कोई व्याधि को असाध्य कह कर उसके लक्षण बताता; कोई अपने खराब-खराब स्वप्नों की चर्चा करता; कोई सुनाता कि पिशाच ने राजा को धरा है; कोई
पञ्चम उच्छ्वासः २४६ केनचित्पिशाचवार्ता विवृण्वता, केनचित्कार्तान्तिकादेशान्प्रकाशयता, केनचिदुपलिङ्गानि गायता, अन्येनानित्यतां भावयता, संसारं चापवदता, कलिकालविलसितानि च निन्दता, दैवं चोपालभमानेनापरेण धर्माय कुप्यता, राजकुलदेवताश्चाधिक्षिपता, अपरेण क्लिष्टकुलपुत्रकभाग्यानि गर्हयता, बाह्यपरिजनेन कथ्यमानकष्टपार्थिवावस्थं राजकुलं विवेश। अविरलबाष्पपयःपरिप्लुतलोचनेन पितृपरिजनेन वीक्ष्यमाणो विवि- धौषधिद्रव्यद्रवगन्धगर्भमुक्तकथां क्वाथानां सर्पिषां तैलानां च प्रपच्य- मानानां गन्धमाजिघ्रन्नवाप तृतीयं कक्ष्यान्तरम्। तत्र चातिनिःशब्दे गृहावग्रहणीप्रापिबहुवेत्रिणि, त्रिगुणतिरस्करिणी- तिरोहितसुवीथीपथे, पिहितपक्षद्वारके, परिहृतकवाटरटिते, घटितगवाक्ष- रक्षितमरुति, दूयमानपरिचारके, चरणताडनस्वनत्सोपानप्रकुपितप्रतीहारे, निभृतसंज्ञानिर्दिश्यमानसकलकर्मणि, नातिनिकटोपविष्टकङ्कटिनि, कोण- स्थिताह्वानचकिताचमनकग्राहिनि, चंद्रशालिकालीनमूकमौललोके, महा- द्रवो रसः। तत्रेत्यादौ। तत्र चैवंविधे धवलगृहे स्थितमीदृशं पितरमद्राक्षीदिति सम्बन्धः। गृहावग्रहणी देहलीद्वारारम्भदेशः। वेत्रिणो द्वाःस्थाः। तिरस्करिणी जवनिका। सुवीथी धवलगृहस्याभ्यन्तरीकृता। 'प्रच्छन्नमन्तर्द्वारं यत्पक्षद्वारं तदुच्यते'। घटितो रक्षितः। निभृतं गुप्तम्। आचमनवाही पानीयहारकः। चन्द्रशालिका धवलगृह- दैवज्ञों की कही हुई बात सुनाता; कोई उत्पातों की चर्चा करता; कोई कहता जीवन अनित्य है; कोई संसार को दुःखमय बताता; कोई कलिकाल के कार्यों की निन्दा करता; कोई दैव को दोषी ठहराता; कोई धर्म को ही उलाहना देता; कोई राजकुल के देवताओं की निन्दा करता; कोई कष्ट में पड़े हुए कुलपुत्रों के भाग्य की निन्दा करता। आँसू से भरे नेत्र वाले पिता के परिजनों द्वारा देखे गए, अनेक प्रकार की औषधि के द्रव की गन्ध से मिले हुए, औटाए जाते हुए काथों और पकाए जाते हुए तेल की गन्ध सूँघते हुए देव हर्ष तीसरी ड्योढ़ी में जा पहुँचे। वहाँ हर्ष ने पिताजी को धवलगृह में पड़े हुए देखा। धवलगृह की देहली पर अनेक वेत्रधारी पुरुष कड़ाई के साथ पहरा दे रहे थे। उसके भीतर की लम्बी-चौड़ी वीथियाँ तिहरे पर्दे से पीछे छिपी थीं। भीतर प्रवेश करने का पक्षद्वार बन्द था। सावधानी से किवाड़ लगाए-खोले जाते थे जिससे आवाज न हो। हवा से रक्षा के लिए खिड़कियाँ बन्द थीं। सेवा में लगे हुए परिचारक दुखी थे। सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने से किसी